क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के खेल का कारोबार

By महेश राठी

अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग कंपनी मूडीज द्वारा भारत की क्रेडिट रेटिंग में सुधार सत्ताधारी भाजपा के लिए एक राहत की खबर थी। इस खबर के बाद मूडीज की रेटिंग पर एक नई तरह की बहस भी देश में देखने को मिल रही है। सोशल मीड़िया पर ना केवल वित्त मामलों और अर्थशास्त्र के जानकार बल्कि साधारण लोग भी पहली बार इस प्रकार की रेटिंग पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए नजर आये। हालांकि इन प्रतिक्रियाओं में अधिकतर नाकारात्मक प्रतिक्रियाएं ही थी। भारत जैसे विकासशील देश में इस प्रकार की रेटिंग देने के कारोबार पर इतनी व्यापक बहस पहली बार देखने को मिल रही है।

वास्तव में इन रेटिंग कंपनियों का कारोबार की जन्मस्थली अमेरिका और उसकी ऋण आधारित अर्थव्यवस्था रही है। दुनिया भर में इस प्रकार की कम से कम 150 क्रेडिट रेटिंग कंपनियों कार्यरत हैं। परंतु इसमें भी मूडीज, एस एण्ड पी (स्टैण्डर्ड एंड पूअर्स) और फिच शीर्ष क्रेडिट रेटिंग कंपनियां मानी जाती हैं। जिसमें मूडीज और एस एण्ड पी का दुनिया के 40 प्रतिशत क्रेडिट रेटिंग के कारोबार पर कब्जा है। असल में, यह क्रेडिट रेटिंग कंपनियां 20वीं सदी में ही दुनिया के वित्तीय इतिहास में दिखाई देती हैं और उससे पहले इन कंपनियों का कोई चर्चा अथवा जिक्र दुनिया के वित्तीय इतिहास में दिखाई नही पड़ता है। 1900 में 32 वर्षीय जाॅन मूडी ने अमेरिका में सबसे पहले इस प्रकार की कंपनी की नींव रखी थी और उसके बाद 1916 में एस एण्ड़ पी अस्तित्व में आई और उसके बाद फिच का आगमन हुआ। हालांकि 80 के दशक तक यह कंपनियां केवल उत्तर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और या कहें कि उत्तर अमेरिकी दुनिया का ही हिस्सा थी। परंतु 80 के दशक में रोनाल्ड रेगन और मार्गरेट थेचर के उदय और उनकी परिकल्पना की अर्थप्रणाली के दुनिया भर में स्वीकार्य होने की शुरूआत के साथ ही इन कंपनियों का दुनियाभर में प्रसार होना शुरू हुआ। अब विकास की नई भूमंडलीय अवधारणा के साथ ही यह कंपनियां भी दुनिया के तथाकथित विकास और कथित विकास कहानियों का एक जरूरी हिस्सा बन चुकी हैं। फिलहाल दुनिया के १०० से भी अधिक देशों में इनके दफ्तर और कारोबार हैं l

जितने विषमताओं से परिपूर्ण मौजूदा विकास के किस्से हैं उतनी ही रोचक इन कंपनियों की रेटिंग के कारोबार की कहानियां भी हैं। 80 के दशक से दुनिया भर में विस्तार पाने वाला इन कंपनियों का कारोबार भी पूँजीवाद के सफर के अनुरूप उत्पादक पूँजीवाद से क्रोनी पूँजीवाद और सट्टा पूँजीवाद की तरह ही रेटिंग से मोलभाव और सट्टा बाजार के बिचौलियों की तरह बदल चुका है। इन कंपनियों की रेटिंग में साख के आंकलन से अधिक मोल भाव करके साख बनाने और गिराने का कारोबार अधिक बचा है। मूडीज, एस एण्ड़ पी और फिच जैसी बड़ी क्रेडिट रेटिंग कंपनियों की रेटिंग विफलताओं और देश एवं कंपनियों को डूबो देने की अनगिनत कहानियां है।

जब देश में आम आदमी मंहगाई, बेकारी और अर्थव्यवस्था में डूब के खतरों से साक्षात हो रहा है तो ऐसे समय में भारत की रेटिंग में सुधार दिखाने वाली इसी मूडीज ने 2009 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि ग्रीस के निवेशकों को सरकार की लिक्विडिटी को लेकर डरने का खतरा नही है अर्थात वह अपने निवेश को लेकर निश्चिन्त हो सकते हैं और उसके छह महीने बार ही ग्रीस दिवालिया होने के कागार पर पहुंच गया था और उसे एक बैलआउट पैकेज की जरूरत पड़ गयी थी। इसी प्रकार अमेरिका की 2008 की मंदी में भी इसी मूडीज का हाथ है, जब उसने अमेरिकी लोगों द्वारा घर गिरवी रखकर लिये गये कर्ज को सुरक्षित मानते हुए उसे तीन ए अर्थात एएए की रेटिंग दे डाली और अमेरिकी वित्त कंपनियों और बैंकों ने उस कर्ज में निवेश कर डाला। इस रेटिंग के फौरन बाद जब गृहस्वामियों ने कर्ज की किस्ते देना बंद कर दिया तो अमेरिका की वित्त कंपनियों और बैंकों के दिवालिया होने की नौबत आ गयी और उन्होंने सरकार से बैलआउट पैकेज की मांग की।

यह केवल मूडीज का ही मामला नही है बल्कि दुनिया की लगभग सभी कंपनियां इस प्रकार के खेल का हिस्सा हैं। यह अपने ग्राहकों की सुविधा के अनुसार रेटिंग का खेल चलाती हैं। यह उस आवारा कारपोरेट पूँजी के तमाम खेलों का हिस्सा है जो बगैर उत्पादन के मुनाफा लूटने के लिए पूरी दुनिया में इस प्रकार के खेल करती है। इन कंपनियों की रेटिंग का खेल केवल इतना भर नही है। दुनिया की सबसे नामी तीनों कंपनियों मूडीज, एस एण्ड़ पी और फिच ने एनराॅन, लेहमाॅन ब्रदर्स और एआईजी में निवेश को उस समय सुरक्षित बताया जब वह डूबने वाली थीं। इसके अलावा इन कंपनियों की ऐसी अनेकों अविश्वसनीय कहानियां हैं कि इन्होंने किसी कंपनी को एएए की रेटिंग दी और कुछ समय के बाद ही उनकी रेटिंग को गिरा दिया। ना केवल डूबती कंपनी को शानदार रेटिंग देकर निवेशकों को डुबाने का इन कंपनियों का रिकाॅर्ड है बल्कि अच्छा प्रदर्शन कर रही कंपनी को खराब रेटिंग देकर डूबाने के किस्से भी इन कंपनियों के हैं। यह पूरा खेल अपने ग्राहकों को रेटिंग की सुविधा देने और यदा कदा अपने ग्राहक के इशारे पर प्रतिस्पर्धी की रेटिंग गिराकर प्रतिस्पर्धी को नुकसान पहुंचाने का भी है। ऐसा ही कंपनी को डुबाने का मूडीज का एक किस्सा जर्मन इंश्योरेंस कंपनी हैनोवेर का है। 1998 में मूडीज ने इस कंपनी को अपनी सेवाओं के लिए लिखा। परंतु कंपनी ने एस एण्ड़ पी और एक तुलनात्मक रूप से छोटी कंपनी एएम की सेवाओं को प्राथमिकता दी। 2003 में मूडीज ने इस कंपनी की रेटिंग को गिराया तो निवेशकों द्वारा कंपनी में से पैसा निकालने की अफरा तफरी जैसी मच गई और एक दिन में ही उक्त कंपनी को 111 मिलियन पौन्ड का घाटा उठाना पड़ा।

दरअसल, यह रेटिंग कंपनियों का खेल और इसकी तिलस्मी कहानियां इस दौर के मौजूदा सट्टा पूँजीवाद की देन हैं। जिसमें कंपनियां अपनी विश्वसनीयता बढ़ाकर निवेश पाने के लिए इन रेटिंग कंपनियों का इस्तेमाल करती हैं। अब यह खेल इस रूप में और अधिक रोचक होता दिखाई पड़ रहा है कि इसमें अब कंपनियों और किसी अर्थव्यवस्था के आर्थिक हितों के अलावा विकासशील देशों के कुछ राजनीतिक दलों के हित भी जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। बहरहाल, विकास की राजनीति के कभी फायदे हैं तो कभी उसके कुछ खतरे भी हैं।