यूपी पुलिस अथवा संघी बचाव फोर्स, नये ‘‘शहरी भगवा आतंकवाद‘‘ को बचा रही पुलिस

आईएनएन भारत डेस्क
बुलंदशहर की घटना पर मीड़िया के सभी माध्यम चीख चीखकर कह रहे थे कि इस घटना के पीछे हिंदूवादी संगठनों का हाथ है। उसके बावजूद भी यूपी पुलिस कह रही है कि इसमें किस संगठन का हाथ है अभी तक साफ नही हैं। बावजूद इसके कि यूपी पुलिस के एक कर्मठ अधिकारी को इस पूरी घटना में अपनी जान गंवानी पडी है। इलाके का बच्चा बच्चा जानता है कि इस घटना के पीछे किसका हाथ है। यदि कोई इस तथ्य से अंजान है तो वह केवल यूपी पुलिस ही है। इतनी मासूम पुलिस जिस राज्य की हो उस राज्य की कानून व्यवस्था के क्या ही कहने। ध्यान रहे कि यह वही यूपी पुलिस है जो फर्जी मुठभेडों की मास्टर मानी जाती रही है। अब अपने एक इंस्पेक्टर के मारे जाने पर भी यूपी पुलिस जिस प्रकार सब कुछ जानते हुए भी अंजान बनी हुई है वह ना केवल कमाल है बल्कि इस तथ्य को दर्शाता है कि यूपी पुलिस किस कदर अपने राजनीतिक मास्टरों की गुलाम है।

बुलंदशहर की पूरी घटना को अंजाम देने वाली व्यक्ति को बचाने में यूपी पुलिस की तत्परता और चपलता का पता मेरठ जोन के एडीजी आनंद कुमार के बयान से चल जाता है। पूरे सूबे में चर्चा है और मीड़िया में लगातार आरोपी का नाम और उसके संगठन की चर्चा है परंतु मेरठ जोन के एडीजी और यूपी पुलिस से ज्यादा अनभिज्ञ शायद ही पूरे उत्तर प्रदेश में कोई दूसरा हो। इस घटना और इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या के प्रमुख आरोपी के संगठन का अभी तक यूपी पुलिस को पता ही नही है। मेरठ जोन के एडीजी आनंद कुमार ने कहा है कि योगेश राज के संगठन के बारे में नहीं पता चला है। उन्होंने अभी तक इस मामले में किसी भी संगठन का नाम आने से इनकार किया है। जबकि यूपी पुलिस और आनंद कुमार के अलावा पूरा मीड़िया और पूरा जिला जानता है कि योगेश राज बजरंग दल का जिला संयोजक है। जाहिर है कि यूपी पुलिस को अपने अधिकारी की मौत के गुनाहगार को पकड़ने से अधिक चिंता गुनाहगार के संगठन को बचाने की है।

यदि यह गुनाहगार संघ और उसके एक जन संगठन बजरंग दल से नही जुड़ा होता अथवा इसका जुड़ाव किसी पिछडे, दलित अथवा अल्पसंख्यक संगठन से होता तो अभी तक उन संगठनों के सारे पदाधिकारियों के घरों को यूपी पुलिस ने खोद डाला होता और आतंक से लेकर संगठित अपराध तक की सारी थ्योरियां यूपी पुलिस पेश कर चुकी होती। यही नही हरेक अखबार और टीवी चैनल पर बजरंग दल और योगेश राज की तस्वीरें घूम रही होती। परंतु यह पूरा मामला संघी आतंकी गिरोह से जुड़ा है इसीलिए पुलिस अपराधी को पकड़ने से कहीं अधिक आरोपी के संगठन के बचाव में मुस्तैद है।

बहरहाल, इस पूरे मामले से एक बात तो साफ हो रही है कि भीड़ तंत्र के नाम पर जिस प्रकार निशाना बनाकर हत्यायें हो रही हैं। वह एक प्रकार का नया ‘‘शहरी भगवा आतंकवाद‘‘ है। जिसके पीछे संघी आतंक की प्रयोगशाला का प्रशिक्षण और उसके विभिन्न संसाधन काम करते हैं। इस नये ‘‘शहरी भगवा आतंकवाद‘‘ के गतिविधि केन्द्र अक्सर छोटे कस्बे और मझौले शहर बन रहे हैं। यह नया ‘‘शहरी आतंकवाद‘‘ असल में एक नये किस्म का कस्बाई आतंकवाद है। जिसके पीछे कस्बा बनते गांवों का बदलता सामाजिक और सांस्कृतिक ताना बाना है। इसी कस्बाई अथवा शहरी आतंकवाद का पोषण और इस्तेमाल संघी गिरोह और उनके विभिन्न संगठन करते हैं। यूपी में इसी नये ‘‘शहरी भगवा आतंकवाद‘‘ को बचाने में यूपी पूलिस को भी एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। चंूकि संघी सत्ता में हैं तो वह सत्ता का दुरूपयोग करके इस आतंक को बचाये रखने की पूरजोर कोशिश कर रहे हैं।