जब लालू यादव ने एक पत्थर तोड़ने वाली भगवतीया देवी को सड़क से संसद तक पहुँचाया?

भगवतिया देवी ने महिला आरक्षण बिल पर बहस के दौरान अपने बेहतरीन सम्बोधन में कही थी, “मैं जाति से मुसहर हूँ, मैं और हमारे लोग सुबह से लेकर शाम तक पत्थर तोड़ते है। उसके बाद, जब पैसे माँगते तो सामंत ज़मींदार हमें और हमारे लोगों को मारते-पिटते है। क्या आप विश्वास करते है कि ऐसे लोग हमें न्याय देंगे?

ऐयर कंडिशन घरों में रहने वाले शहरवासी मुझे जातिवादी कहते है। जब तक आप व्यक्तिगत रूप से अनुभव नही करते कि हम कैसे रहे है। आप हमारे दर्द को नही समझ सकते। हम तो भूख और ग़रीबी में बड़े हुए है। लेकिन जिन लोगों को भोजन को पचाने के लिए डाइजीन की ज़रूरत पड़ती है, उन्हें हमारी समस्याओं के बारे में क्या पता है ?लेकिन आज वो लोग अचानक ग़रीबों के चैम्पीयन बन गए है।”

वर्ष 1997, यूनाइटेड फ़्रंट की सरकार महिला आरक्षण बिल को लेकर विभाजित हो गयी थी, अभिजात्य वर्गीय महिलायें चाहे वो दक्षिणपंथी हो या वामपंथी सबो के स्वर एक थे। जनता दल और सामाजिक न्याय की पार्टियाँ इसमें जाति के आधार पर आरक्षण की माँग कर रहे थे। लोहिया जी के कथन, “जब वोट का राज होगा तब छोट का राज होगा” यानी की छोटे लोगों का राज को चरितार्थ करते हुए, लालू जी ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी पत्थर तोड़ने वाली बहन भगवतिया देवी को संसद तक पहुँचाया। भगवतिया देवी की बेबाक़ी में दबे कुचले महिलाओं का दर्द छिपा था। आज के नारिवादी बहस में फूलन देवी और भगवतिया देवी जैसी सैकड़ों हासिये के समाज की योद्धाओं की कोई जगह नही है। लेकिन हमें ख़ुद अपने इतिहास लिखने होंगे।
-अमित कुमार, शोधार्थी,जेएनयू