रक्षामंत्री के फ्रांस दौरे से राफेल पर और गहराये शक के बादल

महेश राठी
जिस प्रकार से भारत की रक्षामंत्री ने आनन फानन में फ्रांस की दो दिवसीय यात्रा की है उससे राफेल डील पर शक के बादल और गहरा गये हैं। निर्मला सीतारमण की दो दिवसीय यात्रा को जिस प्रकार की सतही तवज्जो फ्रांस सरकार ने दी है उससे साफ जाहिर है कि यह यात्रा पहले से तय नही थी। फ्रांस के रक्षामंत्री से बेशक भारतीय रक्षामंत्री की मुलाकात हुई और उन्होंने कुछ नये समझौते और करार दोनों देशों के बीच होने का दावा किया हो परंतु इस यात्रा का सबसे प्रमुख मसला राफेल डील के बचाव की रणनीति ही है।

निर्मला सीतारमण की फ्रांस यात्रा का एजेंडा राफेल डील से हो रही फजीहत पर पर्दा डालने से अधिक कुछ नही है। एक तरफ भारत सरकार दावा कर रही है कि उसका दो प्राइवेट कंपनियों दासाॅ और रिलायंस की डील से कुछ लेना देना नही है और दूसरी तरफ भारत की रक्षामंत्री पेरिस में स्वयं इनमें से एक प्राइवेट कंपनी दासाॅ का दौरा करती हैं और उसके बाद ही दासाॅ के सीईओ रिलायंस और अपनी भागीदारी पर मोदी सरकार के पक्ष में बयान देते हैं। कहते हैं कि इसमें भारत सरकार का कोई दखल नही है। इस हरकत और सीतारमण के प्रयासों के इस नतीजे को देखकर कोई भी कह सकता है कि सीतारमण की यह अनायास फ्रांस यात्रा केवल राफेल पर मोदी और उनकी सरकार के बचाव का एक प्रयास भर है और कुछ नही।

जहां मोदी सरकार राफेल डील पर अपने बचाव के लिए हरेक तरह की तिकडम में लगी है तो वहीं इस डील में रोजाना होने वाले खुलासे अब पूरी तरह से यह साफ कर रहे हैं कि केवल दाल में कुछ काला ही नही है बल्कि यह पूरी की पूरी दाल ही काली है। मोदी सरकार ने रक्षा डील के नाम पर एक ऐसी काली दाल पकायी है जिसमें मोदी सीधे तौर पर नख से सिख तक डूबे नजर आ रहे हैं। हाल ही में फ्रांस की समाचार वेबसाईट ने फिर से एक धमाका करते हुए दासाॅ के वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से खुलासा किया कि रिलायंस के साथ भागीदारी इस समझौते के होने की अनिवार्य शर्त थी जिसे किसी सूरत में भी नजरअंदाज नही किया जा सकता था। जाहिर है कि मीड़ियापार्ट की वेबसाईट पर इस सूचना के आ जाने के बाद सरकार के लिए जरूरी था कि वह अब दासाॅ के सीईओ से ऐसा बयान दिलवाये जिससे कि मोदी और मोदी सरकार को बचाव का एक औजार मिल सके। और मोदी और मोदी सरकार ने ठीक वही किया भी।

Dassault document adds to corruption claims over Rafale sale to India

 BY  AND 

The 8 billion-euro sale to India by France of 36 Dassault Rafale jet fighters has become the centre of corruption allegations levelled against Indian Prime Minister Narendra Modi and his close friend, Indian businessman Anil Ambani, chairman of the Reliance Group which was handed the role of local industrial partner of Dassault to build parts for the jets despite no aeronautical expertise. The claim that Ambani was given the joint venture contract as a favour by Modi to save his struggling business is the subject of a complaint lodged this month with India’s Central Bureau of Investigation. Now Mediapart has obtained a Dassault company document in which a senior executive is quoted as saying the group accepted to work with Reliance as an “imperative and obligatory” condition for securing the fighter contract. Karl Laske and Antton Rouget report.

राफेल पर मोदी सरकार जितने बचाव के तर्क गढ़ती है उतना ही डील में उसके होने का विश्वास देश की जनता के मन में गहरायी तक बैठता जाता है। मोदी सरकार इस मामले को सबसे अधिक उठाने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लगातार निशाने पर लेकर उन पर हमला तो बोल रही है परंतु मोदी और उनकी सरकार की नीयत इस पूरे मामले में साफ जाहिर हो जाती है कि मोदी सरकार ने राफेल की कीमत को छोड़कर इस डील के बारे में सारी जानकारी देश के सामने परोस दी है और राफेल की कीमत ही डील का वह पहलू है जिसे मोदी सरकार हर सूरत में छुपाना चाहती है। वितमंत्री जेटली सामने आकर हमेशा की तरह एक नई थ्योरी देते हुए कहते हैं कि उनकी सरकार ने इस डील में यूपीए की तुलना में 10 प्रतिशत का फायदा किया है और उतने कम पर डील हुई है। कभी मोदी के मंत्री इस विमान की तकनीक की जानकारी देते हैं तो कभी विमान की अन्य अचूक विशेषताएं बताते हैं। मोदी के मंत्रियों ने इतना ज्ञान देश की जनता को दे दिया है कि देश के लोग राफेल कीे कीमत को छोड़कर उसके बारे में सब कुछ जानते हैं। अब देश के जागरूक लोग जानते हैं कि कीमत से देश की रक्षा प्रणाली को नही बल्कि मोदी सरकार की सुरक्षा को ही खतरा है।

बहरहाल, मोदी सरकार अब राफेल के बचाव के मामले में दो तरह की रणनीति पर काम कर रही है। पहले वह दासाॅ और फ्रांस को अपने बचाव में इस्तेमाल कर रही है तो दूसरी तरफ राहुल गांधी पर व्यक्तिगत आरोपों की बौछार करके इस पूरे मामले को व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप में फंसाकर कमजोर करना चाहती है। इसके लिए जहां मोदी के रणनीतिकारों ने निर्मला सीतारमण को फ्रांस में भेजकर मैदान में उतारा तो वहीं देश में पीयूष गोयल को राहुल गांधी पर आरोपों की झडी लगाने के लिए मैदान में उतार दिया है। हालंकि अब देश के लोग इस बात को समझ रहे हैं कि विपक्ष को बार बार झूठा और मोदी विरोधी कहकर गाल बजाने की बजाये मोदी और उनकी सरकार संसद में राफेल की कीमतों का खुलाया क्यों नही कर देती है। अब मोदी के लिए राफेल ऐसी पहेली बन चुकी है कि जिसे सुलझाने की वह तरकीबे अजमायेंगे उतने ही वह उसमें फंसते चले जायेंगे। कभी कभी ज्यादा कारोबारी दिमाग और व्यक्तिगत अति सक्रियता आपको फंसवा ही देती है जबकि आपकी नीयत में खोट ही खोट हो तो।