वंचितों के गीत, संगीत और लोकजीवन में एकाकार लालू यादव का संघर्ष

Author-अमित कुमार, शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
भारतीय ब्राह्मणवादी वर्ग के मीडिया, बुद्धिजीवी, नौकरशाही और सामंती सियासतदानों के द्वारा सामाजिक इन्साफ की लड़ाई के लिए समर्पित योद्धा गरीब गुरबो की आवाज माननीय लालू यादव और उनके बढ़ते कद को कम करने के लिए पूरी दुनिया के सामने उनकी गलत तस्वीर पेश की गयी है, आज जब पहली पीढ़ी के लोग विश्वविद्यालयों तक पंहुचे हैं तब उनकी यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि मनुवादियों द्वारा गढ़े गए इतिहास को उलट दें।

90 के दशक में बतौर मुख्यमंत्री लालू जी ने वंचित समाज के पक्ष में कई ऐसे ऐतिहासिक फैसले लिए जिसको कभी भुलाया नहीं जा सकता है, वो इतिहास में दर्ज हो गए हैं। उस दौर में तब के उनके सहयोगी रामविलास पासवान जी ने कहा था, ‘ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति जितना आक्रमक लालू यादव है, उतना कोई नहीं है‘।

बतौर मुख्यमंत्री लालू जी ने मीडिया से रूबरू होते हुए भ्रष्ट्राचार पर अपनी बात रखते हुए कहा था, ‘जो संगठित माफिया गिरोह था चाहे पानी माफियां हो, कोयला माफिया हो या तारी माफिया हो, और यहाँ इसी राज्य में मार्च लूट होती थी। अभिजात्य वर्ग के विकास की परिभाषा अलग है, और लालू यादव की अलग है, विकास कागज पर दिखाए जाते थे और मार्च के महीने में इस राज्य के पैसे लूट लिए जाते थे। छेनी हथौड़ी से पहाड़ काटने का ठेका मिलता था सिंचाई विभाग में, यहाँ पूरा शिक्षा माफिया था, मेडिकल इंजिनयरिंग पोलटेक्निक, वेटनरी, टीचर ट्रेनिंग ये जो सारा गोरख धंधा था, इस तरह के भष्ट्राचार पर हमने काबू पाया जो भी दोषी रहे हैं उसको मैंने जेल में बंद किया।

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तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू जी के ऊपर प्रसिद्ध निर्गुण गायिका रामरती देवी जी गाना गा रही है, “काहे करेला तू हल्ला बेकार होई कुछ ना चलिए हे तोहार लालू सरकार होई” इसी में लालू जी कह रहे हैं, ‘भैस के सींग से सीएम की सीट पर, पहले भैस के सींग पर बैठता था अब सीएम की सीट पर बैठता हूं‘। कोई भी मूल्यांकन सही सोच के साथ हो सकता है, स्थापित इतिहास में हम अपना हिस्सा जरूर खोजेंगे, अपना इतिहास खुद लिखेंगे।