भ्रष्टाचार के आये ‘‘अच्छे दिन‘‘, मोदी शासन में बढ़ी रिश्वतखोरी

आईएनएन भारत डेस्क
‘‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा‘‘ के जुमले पर सत्ता में आयी मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए किये संशोधन से ऐसा इंतजाम कर दिया है कि इससे रिश्वत देने वाला कभी भी मुंह नही खोल पायेगा और भ्रष्टाचार में अराजकता के स्तर तक बढ़ोतरी होगी। तीन दशकों से चले आ रहे भ्रष्टाचार विरोधी कानून के कुछ प्रावधानों में हुए संशोधन के बाद रिश्वत लेने वाले को कम से कम तीन साल के कारावास की सजा दिये जाने के प्रावधान को बढ़ाकर सजा की सीमा को सात साल कर दिया गया है। इसमें अब सात साल तक भी सजा हो सकती है। वहीं रिश्वत देने वाले को भी नही छोड़ा गया है, रिश्वत देने वालों को सात साल का कारावास या जुर्माना या दोनों के साथ दंडित किया जाएगा।

अब इस नये बदलाव से रिश्वतखोर अधिकारी पीड़ित व्यक्ति का खुलकर शोषण कर सकेंगे। मान लीजिए आपने कभी गलती से रिश्वत दी और रिश्वत लेने वाला अधिकारी फिर से रिश्वत की मांग करता है तो अब आपको उक्त अधिकारी की शिकायत करने से डर लगेगा कि रिश्वत देने के मामले में आप भी नही फंस जायें और लेने वाले से अधिक सजा और जुर्माना आपकोे भरना पड़े। अब भ्रष्टाचार की जांच के लिए रिश्वत देने वाला कोई भी शख्स घरेलू कानून में शामिल नहीं होगा। हालांकि, वैसे लोग जिन्हें रिश्वत देने के लिए मजबूर किया गया है उसे सात दिनों के भीतर कानून प्रवर्तन प्राधिकरण या जांच एजेंसी को यह मामला रिपोर्ट करना होगा। यदि ऐसा नही होता है तो किसी मामले में फंस जाने पर पीड़ित व्यक्ति को भी दोषी माना जायेगा।

ऐसे अजीबो गरीब संशोधनों से सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के चाहे कितने ही दावे करे, लेकिन मोदी सरकार के इस क्रान्तिकारी बदलाव के नतीजे भ्रष्टाचार बढ़ने की शक्ल में सामने आने लगे हैं। बीते एक साल में आमलोगों द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से घूस देने के मामले में खासी बढो़तरी दर्ज की गयी है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया और लोकल सर्कल्स द्वारा किए एक सर्वे के अनुसार बीते एक साल में 56 प्रतिशत लोगों ने घूस देकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। इस सर्वे में देश के कुल 1,60,000 लोगों ने भाग लिया। वहीं इससे पिछले साल 45 प्रतिशत लोगों द्वारा घूस देने का मामला सामने आया था। मोदी सरकार का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान इसी तरह से चलता रहा तो वह दिन दूर नही है जब देश की पूरी आबादी रिश्वत लेने देने के अच्छे अभियान में शामिल होगी और मोदी-शाह की जोडी इसे सच्चे वाले अच्छे दिन आने की घोषणा कर दोनों खुद एक दूसरे की पीठ थपथपायेंगे।

सर्वे के अनुसार भ्रष्टाचार विरोधी हेल्पलाइन की उपलब्धता के मामले में 58 प्रतिशत लोगों ने यह माना कि उनके शहर में ऐसी कोई हेल्पलाइन मौजूद नहीं है तो वहीं 33 प्रतिशत लोगों ने इस संदर्भ में कोई जानकारी न होने की बात कही। घूस देने के माध्यमों पर हुए सर्वे में यह बात सामने आई कि 39 प्रतिशत घूस कैश में दिए जाते हैं, 25 प्रतिशत एजेंट के जरिए और 1 प्रतिशत अन्य किसी तरीके से. वहीं सबसे अधिक घूस पुलिस अधिकारी, बिजली बोर्ड, ट्रांसपोर्ट ऑफिस, टैक्स ऑफिस को देने की बात सामने आई है। सर्वे के अनुसार 36 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सरकारी अधिकारी घूस लेने के बाद ही काम पूरा करते हैं। घूस नहीं देने पर वह काम अटका रह जाता है। वहीं 39 प्रतिशत लोगों का मानना है कि ऐसा नहीं है. जबकि पिछले साल तक ऐसा मानने वाले लोगा 43 प्रतिशत थे।

सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि सर्वे लेने वाले लोगों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए घूस देने की बात बताई है। इससे यह बात सामने आई कि 13 प्रतिशत लोगों ने सीसीटीवी कैमरे लगे सरकारी दफ्तरों में घूस दिया हैं। मतलब साफ है कि सीसीटीवी कैमरे भी भ्रष्टाचा को रोक पाने में असमर्थ हैं।