जिसे मां गंगा ने बुलाया था वो गंगा को भूला, जिसने याद रखा वो गंगा के लिए मारा गया

आईएनएन भारत डेस्क
पूरे देश को याद होगा देश के प्रधानमंत्री का वाराणसी में दिया गया वह भाषण जिसमें मोदी ने लगभग चीखने के अंदाज में कहा था कि उन्हें मां गंगा ने बुलाया है। मोदी ने गंगा से बुलावे पर वाराणसी से चुनाव जीतकर देश के सबसे शक्तिशाली पद को तो हथिया लिया परंतु वह गंगा को पूरी तरह से भूल गये।

वहीं स्वामी ज्ञन स्वरूप सानंद ने गंगा के अविरल और निर्मल प्रवाह के लिए आमरण अनशन कते हुए अपनी जान तक दे दी। 2011 में संन्यास लेने के पहले स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद का नाम डॉ जी डी अग्रवाल था। उन्होंने पीएम मोदी को भी पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि अगर गंगा की सफाई की उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो वह 10 अक्टूबर से जल का भी त्याग कर देंगे।

गंगा की सफाई के लिए विशेष काननू पास कराने की मांग को लेकर आमरण अनशन कर रहे स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद का गुरुवार को ऋषिकेश के एम्स में निधन हो गया। एम्स के जनसंपर्क अधिकारी हरीश थपलियाल ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि कमजोरी और हार्ट अटैक की वजह से स्वामी सानंद का निधन हुआ है। बीते 111 दिनों से अनशन पर बैठे स्वामी सांनद को प्रशासन ने बुधवार को ऋषिकेश के एम्स में जबरन भर्ती कराया था। अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार 111 दिनों से अनशन पर बैठे स्वामी सांनद ने मंगलवार को जल का भी त्याग कर दिया था, जिसके बाद प्रशासन ने उन्हें अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती कराया था।

बता दें कि वर्तमान में नदियों की समस्याओं और उनके समाधान के देश में बड़े विशेषज्ञ स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद 22 जून से गंगा के संरक्षण के लिए कानून बनाने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे। इतना ही नहीं उन्होंने गंगा के संरक्षण पर कानून के लिए प्रधानमंत्री मोदी को भी पत्र लिखा था। इसी साल 6 अगस्त को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था कि इन चार सालों में आपकी सरकार द्वारा जो कुछ भी हुआ, उससे गंगा जी को कोई लाभ नहीं हुआ। उसकी जगह कॉर्पोरेट सेक्टर और व्यापारिक घरानों को ही लाभ दिखाई दे रहे हैं। अभी तक आपने गंगा से मुनाफा कमाने की ही बात सोची है। सानंद के पत्र का ना ही कोई जवाब मिला और न ही कोई कार्रवाई हुई।

अपने पत्र में उन्होंने गंगा के विषय पर मनमोहन सिंह सरकार की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए मनमोहन सिंह जी ने लोहारी-नागपाल जैसे बड़े प्रोजेक्ट रद्द कर दिए थे, जो 90 प्रतिशत बन चुके थे और जिसमें सरकार को हजारों करोड़ रुपये की क्षति उठानी पड़ी थी। इसके साथ ही उन्होंने भागीरथी जी के गंगोत्री से उत्तरकाशी तक का क्षेत्र ईको-सेन्सिटिव जोन घोषित करा दिया था, जिससे गंगा जी को हानी पहुंचाने वाले कार्य नहीं हो सकें। इससे पहले 4 जुलाई को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को भेजे पत्र में डॉ अग्रवाल ने लिखा था, “आप लोगों की गलत नीतियों और आर्थिक विकास की लालच से यह स्थिति आयी है।”

2011 में संन्यास लेने के पहले स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद का नाम डॉ जी डी अग्रवाल था। डॉ अग्रवाल आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर थे, फिर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के शुरुआती दिनों में लंबे समय तक उसके सदस्य सचिव रहे। इसके बाद ग्रामोदय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। इस सरकार के पहले तक डॉ अग्रवाल नदियों से और पर्यावरण से जुड़ी लगभग हर उच्च-स्तरीय कमेटी का हिस्सा रहे। पिछले कुछ वर्षों से, विशेष तौर पर संन्यास लेने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन गंगा के लिए समर्पित कर दिया था।