“सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम बागी हैं”- लोकनायक जयप्रकाश नारायण

महान समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण, जिन्हें लालू प्रसाद ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में लोकनायक की उपाधि दी थी; की आज पुण्यतिथि है। जेपी व्यवस्था परिवर्तन हेतु सम्पूर्ण क्रांति के प्रतीक माने जाते हैं जो सियासत को निःस्वार्थ भाव से जनसेवा का सशक्त माध्यम बनाने पर जोर दे रहे थे और जनमानस को तैयार कर रहे थे। पदलोलुपता के दौर में उन्होंने कभी कोई संसदीय चुनाव नहीं लडा और निरंकुशता के खिलाफ हमेशा जम कर लोहा लिया। उन्होंने सत्ता को चुनौती दी:
“सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम बागी हैं”।

74 में शरद यादव को ढूंढ कर टिकट दिया और वो मध्यप्रदेश की जबलपुर सीट से लोकसभा का उपचुनाव जीते। एक किस्म से वो जेपी द्वारा सीधे-सीधे लडाए गए पहले उम्मीदवार थे।

जब पटना में पुलिस की लाठियों से जेपी की जान बचाने के लिए लालू प्रसाद ने उनके शरीर पर गिर कर उन्हें ढक लिया तो पुलिस ने लालू जी की अंगुलियों को लगभग थकचुन्ना कर दिया था। जब जेपी अस्पताल में भर्ती लालू जी का हालचाल पूछने आए तो फ्रैक्चर के चलते लालू जी अभिवादन स्वरूप दोनों हथेलियों को सटा कर जोड़ नहीं पा रहे थे। यह तस्वीर तब की एक पत्रिका में छपी थी जिसे दो दशक पहले पिताजी की पलिटिकल फाइल में देखी थी।

जेपी अक्सर कहते थे, “सम्पूर्ण क्रांति से मेरा तात्पर्य समाज के सबसे अधिक दबे-कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर पर देखना है”।

लालूजी की लोकप्रियता से डाह करने वाले उनके कुछ जडनतियाह समकालीन साथी जेपी के पास 1977 में शिकायत करने चले गए कि सर लालू को लोकसभा का टिकट मत दीजिए। जेपी ने सबको फटकार कर अपने घर से भगाया। 13-14 साल बाद जब यही लालू प्रसाद सामंतों के दर्प को तोडते हुए, तिकडमों को कुचलते हुए ताऊ देवीलाल के अतुलनीय स्नेह, शरद यादव की अचूक रणनीति व विधायक दल के गजब के समर्थन से बिहार के मुख्यमंत्री बने तो जेपी की प्रतिमा के आगे पद और गोपनीयता की शपथ ली।

लोकनायक की जेल यात्रा पढने लायक है। सियासत के उथले झंझावात और छिछली महत्वाकांक्षा के युग में उनसे नई दृष्टि व रोशनी मिलती है। वो चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे, राष्ट्रपति बन सकते थे, पर उन्होंने चुनी अपनी नायाब भूमिका जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गई।

उनकी ये पंक्तियां मेरे दिल के बेहद करीब हैं:

जीवन विफलताओं से भरा है
सफलताएँ जब कभी आयीं निकट
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से
तो क्या वह मूर्खता थी?
नहीं!

सफलता और विफलता की परिभाषाएं भिन्न हैं मेरी
इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमंत्री क्या?
किन्तु मुझ क्रांतिशोधक के लिए
कुछ अन्य पथ ही मान्य, उद्दिष्ट थे!
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ संघर्ष के, संपूर्ण क्रांति के!

जग जिसे कहता विफलता
थीं शोध की वे मंजिलें,
मंजिलें वे अनगिनत हैं
गंतव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो!

निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को
तो विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी
और यह विफल जीवन
शत शत धन्य होगा
यदि समानधर्मी प्रिय तरुणों का
कंटकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बना जाये!

जम्हूरियत की रूह बचाने वाले उस अनमोल देशरत्न को हजारों सलाम!

Author: जयंत जिज्ञासु, शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

  • Abhishek Yadav

    क्या बात है भईया शानदार ☺️☺️