महागठबंधन में दरारः अखिलेश यादव से सीखे कांग्रेस

यूपी के लोकसभा उप चुनावों में सपा और बसपा का चुनावी तालमेल ना केवल आम आदमी बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी किसी अजूबे से कम नही था। परंतु सपा और बसपा ने समय की जरूरत समझते हुए इस कारनामे को अंजाम देकर दिखाया। इसके बाद भी सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातर कहते रहे और कोशिश करते रहे कि भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए सभी एकसमान विचार वाले जनवादी, धर्मनिरपेक्ष दलों की एकता होनी चाहिए। हाल ही के दिनों में भी मीड़िया के सवालों का जवाब देते हुए और सार्वजनिक मंचो पर उन्होंने साफ किया कि महागठबंधन के लिए वह दो कदम पीछे हटने के लिए भी तैयार हैं। महागठबंधन के सवाल पर, चाहे वह गठबंधन के चेहरे का सवाल हो अथवा सभी दलों के बीच एकता की बात हो सपा अध्यक्ष की रणनीति एकदम साफ है उन्होंने बार बार कहा है कि सबसे पहली जरूरत मोदी-भाजपा-संघ को सत्ता से बाहर करना है और इसी को प्राथमिकता मानकर गठबंधन होना चाहिए। मौजूदा दौर में फासीवादी रूझानों वाली मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए इसी सोच और रणनीति की जरूरत है। कांग्रेस यदि ईमानदारी से मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करना चाहती है तो उसे अखिलेश यादव से सीखना होगा कि व्यापक एकता के लिए क्या सोच और रणनीति होनी चाहिए।

ऐसा नही है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यह सिर्फ बयानबाजी के स्तर पर ही किया है। उन्होंने यूपी के पिछले उप चुनावों में इसे रणनीतिक स्तर पर कार्यान्वित भी करके दिखाया। अखिलेश यादव ने केवल बड़े दलों को ही नही बल्कि छोटे-छोटे समूहों और दलों को भी अलग अलग रणनीति के तहत साथ लेकर चलने की सूझबूझ दिखाई है। गोरखपुर में निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को सपा में शामिल करके सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाना हो अथवा फूलपुर में अपना दल के कृष्णा पटेल ग्रुप का सहयोग लेना हो अखिलेश यादव ने पिछडा वोटों के बंटवारे को रोकने के लिए ना केवल कमाल का तालमेल बिठाया बल्कि इन दलों को यथोचित सम्मान भी देने का काम किया। यह केवल दलों के सम्मान की ही नही बल्कि वंचित समुदायों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व देने की समझदारी भी थी। ठीक यही कमाल अखिलेश यादव ने कैराना सीट पर किया। जहां पर चर्चा थी कि अजित सिंह चाहते हैं कि या तो वह स्वयं अथवा उनके बेटे जयंत को कैराना से लोकसभा में भेजा जाये। परंतु यहां सवाल किसी व्यक्ति विशेष के संसद में जाने से बड़ा भाजपा को मात देने का था और उसके लिए जरूरी था कि ऐसा उम्मीदवार हो जो वोटों के बंटवारे की संभावना को खत्म करके जीत को सुनिश्चित कर सके तो इस सीट पर अखिलेश यादव ने रालोद के साथ मिलकर अलग रणनीति बनाई। यहां उम्मीदवार सपा का था तो पार्टी झण्ड़ा और सिंबल रालोद का था। वैसे इस सीट पर जीत के लिए जयंत चैधरी की कोशिशों और मेहनत को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता है।

बहरहाल, यूपी उप चुनावों में अखिलेश यादव एक नये अवतार में देश के सामने थे। हो सकता है कि यह राजनीतिक समझदारी और दूरदर्शिता उनका स्वाभाविक अंदाज और उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हो परंतु उनके इस रूप से साक्षात्कार तो गठबंधन और महागठबंधन की कोशिशों में ही सामने आया है और उनके इस रूप और भूमिका का राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग होना अभी बाकि है। वैसे उनके सामने राजनीतिक जीवन का लंबा सफर बाकि है। परंतु सवाल कांग्रेस के बदलते हुए तेवरों का है। जिस प्रकार वह एक के बाद एक अपने स्वाभाविक सहयोगियों को नाराज करती जा रही है। उससे साफ जाहिर हो रहा है कि वह भाजपा की जीत की राह आसान करती जा रही है। कांग्रेस को 2014 की अपनी हार और उससे भी पहले से गिरते जनाधार के ग्राफ का फिर से विश्लेषण करना होगा और वोटों के बदलते हुए सामाजिक समीकरणों को समझकर ही अपनी रणनीति बनानी होगी। उसे सबसे पहले यह समझना होगा कि मौजूदा दौर में भाजपा के कमजोर होते जाने और सत्ता विरोधी माहौल बनने का अर्थ अब स्वाभाविक रूप से कांग्रेस की सत्ता में वापसी नही हो सकता है। यदि कांग्रेस को भाजपा को सत्ता से हटाना है तो उसे वोटों के बंटवारे को रोकना होगा और सभी स्वाभाविक सहयोगियों को एक साथ लाना होगा। यदि कांग्रेस को यह लगता है कि वह अकेले अपने दम पर अथवा अपनी शर्तो पर नाममात्र के लिए कुछ लोगोें को साथ लेकर सत्ता में वापस आ जायेगी तो यह उसकी खुशफहमी है।

इस खुशफहमी का नतीजा कांग्रेस गुजरात और कर्नाटक में भुगत चुकी है परंतु फिर भी उससे कुछ सबक सीखना नही चाहती है। यदि कर्नाटक में पहले ही कांग्रेस ने जेडीएस से गठजोड़ किया होता तो भाजपा का इस दक्षिणी राज्य से पूरी तरह से सफाया हो चुका होता। परतु अपने अहम में कांग्रेस ने भाजपा को बड़ा होने का मौका दिया और अंत में फिर जेडीएस से गठजोड करके ही वह भाजपा की सत्ता में वापसी रोक पाये। इसके अलावा कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि यदि सपा-बसपा कांग्रेस के जैसा रूख उत्तर प्रदेश में अख्तियार करते हैं और रालोद, पीस पार्टी, निषाद दल, कृष्णा पटेल के अपना दल और वाम दलों के साथ मिलकर गठजोड बनाते हैं तो क्या कांग्रेस यूपी में एक भी सीट जीतने की स्थिति में रहेगी। ध्यान रहे कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी की जीती हुई सीटें ऐसी हैं जहां सपा और बसपा अपने उम्मीदवार नही उतारती हैं। यदि सपा-बसपा और अन्य दलों का गठजोड़ 2019 में अमेठी और रायबरेली में भी अपने साझा उम्मीदवार उतार देता है तो क्या राहुल और सोनिया गांधी के लिए अपनी सीटें बचा पाना आसान रह जायेगा। कांग्रेस का ठीक यही हाल बिहार में भी है। झारखण्ड़, बिहार, यूपी, बंगाल, महाराष्ट्र जैसे अनेक राज्य ऐसे हैं जिनसे देश का भविष्य तय होगा। परंतु क्या कांग्रेस इन राज्यों में अपने दम पर कुछ सीटे जीतने की स्थिति में है। फिर यह खुशफहमी किस लिए कि भाजपा हार जायेगी और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो जायेगी। कांग्रेस भाजपा विरोध के इस अभियान की चालक सीट पर तभी बनी रह सकती है जबकि उसमें सबको साथ लेकर चलने का जज्बा और समझदारी हो अन्यथा बेवजह का सत्ता का ख्वाब कांग्रेस को सत्ता तो दूर मोदी और भाजपा की राह आसान करने का ही काम करेगा। अभी भी समय है, कांग्रेस अखिलेश यादव से सीखे कि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए दिल भी बड़ा करना पड़ता है और जरूरत के समय दो कदम पीछे भी हटना पड़ता है।

याद रखना होगा कि सपा-बसपा और अन्य जितनी भी क्षेत्रिय पार्टियां हैं सभी कांग्रेस के खिलाफ ही पैदा हुई हैं और हमेशा गैर कांग्रेसवाद की राजनीति करती रही हैं परंतु मौजूदा दौर में उनमें अधिकतर और सबसे बड़ा जनाधार रखने वाली पार्टियां समय की जरूरत को देखते हुए आज कांग्रेस के साथ आने के लिए तैयार हैं और इस साथ के लिए कुर्बानी देने के लिए भी तैयार हैं। फिर कांग्रेस को किस बात का गुमान है। इसके अलावा एक तथ्य को भी कांग्रेस को समझ लेना चाहिए कि जिस प्रकार ओबीसी, दलित और आदिवासी एकता की राजनीति अथवा कहें कि बहुजन राजनीति तेजी से राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में आ रही है उसके चलते कांग्रेस के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी आने वाले दिनों में जनाधार संभाले रख पाना मुश्किल हो जायेगा। क्योंकि लड़ाई अब सीधे तौर पर ब्राह्मणवाद बनाम गैर ब्राह्मणवाद की तरफ बढ़ रही है और ऐसे समय में उदार ब्राह्मणवादी कांग्रेस के लिए संभवनाएं बेहद सीमित हैं। अकेले चलने के अहं का नतीजा गोरखपुर और फूलपुर से अधिक कुछ नही हो सकता है जहां कांग्रेस भाजपा से नाराज अगडे वोट पाने वाली पार्टी भर बनकर रह गयी थी। अभी भी समय है कि कांग्रेस वक्त रहते चेत जाये अपने सहयोगी अखिलेश यादव से सीखे और उनकी तरह ही अपना दिल बड़ा करे।