प्रदूषण और कूडे की राजधानी बनी दिल्ली में मोदी ने लिया संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार

आईएनएन भारत डेस्क
प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी को दिल्ली में बुधवार को आयोजित एक विशेष समारोह में संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार ‘‘चैंपियंस ऑफ अर्थ द अवार्ड’’ से सम्मानित किया गया। संयुक्त राष्ट्र महासचिव गुटारेस ने पर्यावरण के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ‘ अवॉर्ड से सम्मानित किया।

प्रधानमंत्री मोदी को यह पुरस्कार ऐसे समय मिला है जबकि दिल्ली पूरी तरह से कूडे का ढ़ेर बनी हुई है। शहर की हरेक बस्ती, हर गली हर सड़क पर कूडे के ढ़ेर लगे हुए हैं। दरअसल, यह मोदी के विकास के माॅडल की असलियत को जाहिर करता है। जिसमें मोदी सरकार विकास के दावे करती है, जीडीपी की उंची वृद्धि दर की बाते करती है परंतु बाजार और देश की जनता किसानों की बदहाली, नौजवानों की बेरोजगार, बढ़ती महंगाई, निरंकुश भ्रष्टाचार के बावजूद शुचिता और विकास के दावे करती है। ठीक यही सच्चाई संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार को लेकर भी है।

यह ना केवल राजधानी के कूडे के ढ़ेर बनने की बात है बल्कि देश में प्रदूषण के मामले में भी ठीक यही स्थिति हैं। मई 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन जारी दुनिया के दस सबसे प्रदूषित शहरों में नौ शहर भारत के शामिल थे। और उन नौ शहरों में दिल्ली ही नही बल्कि मोदी का अपना निर्वाचन क्षेत्र वराणसी भी शामिल था। दस में से एक शहर केवल कैमरून का शामिल था। इस सर्वे में 100 देशों के 4000 शहरों को शामिल किया गया था। जिसमें सबसे पहले पायदान पर देश के नये विकास पुरूष एनकाउंटर वीर योगी आदित्यनाथ का शहर कानपुर था तो दूसरे स्थान पर हरियाणा का फरीदाबाद था।

इस सबके बावजूद भी प्रधानमंत्री मोदी को संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार हासिल हो जाता है तो यह इस पुरस्कार की मौलिकता पर सवाल उठाता है। क्या यह पुरस्कार सही में पर्यावरण चिंताओं और पर्यावरण के लिए किये जा रहे प्रयासों को लेकर दिया गया है अथवा यह किसी अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा और कि यह मोदी एण्ड कंपनी के प्रबंधन का कमाल है कि संयुक्त राष्ट्र संघ फ्रांस के राष्ट्रपति और मोदी को यह पुरस्कार देता और इस पुरस्कार देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन भी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय या किसी अन्य जगह नही बल्कि कूडे का ढ़ेर बनी भारत की राजधानी नई दिल्ली में आकर दिया जाता है।

वास्तव, में यह मोदी एण्ड कंपनी के मैनेजमेंट का पुरस्कार है, ना कि किसी पर्यावरण के लिए किये गये कामों का। यह कारपोरेट विकास का कमाल ही है कि दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों वाले देश के प्रधानमंत्री को संयुक्त राष्ट्र संघ का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार प्रदान किया जाता है। इस कारपोरेट विकास के माॅडल को यदि मोदी को दुनिया का सांप्रदायिक सद्भाव का चेहरा बनाने की जरूरत पडी तो मोदी को दुनिया का सांप्रदायिक सद्भाव का सर्वोच्च सम्मान भी देने से वह पीछे नही हटेगा। यही कारपोरेट विकास और भारत में उसके सबसे बड़े एजेंट के सम्मान और पुरस्कार की वास्तविकता है।