असंतुष्ट किसानों की वापसी मोदी के जाने की तैयारी

किसान क्रान्ति यात्रा का दिल्ली सीमा पर जमावडा खत्म हुआ। परंतु दिल्ली से असंतुष्ट किसानों की वापसी मोदी सरकार की वापसी की पटकथा लिख गयी है। किसानों की मांगों में से सात पर सरकार की तथाकथित सहमति से असहमति जताकर और अपने संघर्ष को जारी रखने का ऐलान करके किसानों ने साफ संदेश दे दिया है कि उन्हें इस सरकार पर जरा भी विश्वास नही है। राजनाथ सिंह के आवास पर कईं घंटे चली चर्चा के बाद किसान नेताओं और सरकार के बीच सात मांगों पर सहमति बन गई थी। परंतु जैसे ही केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने इस सहमति की घोषणा की और किसान नेताओं ने भी इस सहमति पर हामी भरी तो वहां मौजूद किसानों ने सरकार के आश्वासन और झूठी सहमति को सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा कि बिजली बिलों की माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की मांग माने जाने के बगैर कोई सहमति कोई समझौता नही, हमारा संघर्ष जारी रहेगा। किसान नेता सरकार से वार्ता के बाद सात मांगों पर सहमत हो गये थे परंतु किसानों की भीड़ ने एक स्वर में जिस प्रकार सरकार और नेताओं के बीच बनी सहमति को नकारा है। वह दर्शाता है कि किसान मोदी सरकार से किस कदर खफा हैं और वह मोदी सरकार को एक किसान विरोधी सरकार ही मानते हैं।

मोदी सरकार और उसके इशारे पर माहौल बनाने वाला मीड़िया बेशक कुछ भी दावे करे पंरतु जिस तरह से दिल्ली सीमा पर जमे किसानों ने मोदी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की है उससे साफ जाहिर है कि अब मोदी के दिन खत्म हुए और किसानों के मोदी के खिलाफ यह नारे मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो जाने की घोषणा है। बेशक किसानों ने सरकार की तथाकथित सहमति से सहमत नही होकर यहीं डटे रहने की घोषणा की परंतु जैसे ही उन्हें रात में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की समाधि तक जाने का मौका मिला वह समाधिस्थल तक गये और उन्होंने अपना धरना खत्म कर अपने अपने घरों की तरफ रूख करना शुरू कर दिया। यह बेशक एक मामूली घटना जान पड़े परंतु इस घटना के बड़े मायने हैं। जो किसान सरकार की तथकथित सहमति को नकार रहे थे, उन्होंने चौधरी चरण सिंह की समाधि पर नमन करके ही अगले संघर्ष की घोषणा के साथ अपना धरना खत्म कर दिया। यह भाजपा के द्वारा किये गये सांप्रदायिक बंटवारे से चौधरी चरण सिंह की विरासत की तरफ फिर से किसानों की वापसी का संकेत है।

किसानों की यह वापसी और भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे की हार केवल चैधरी चरण सिंह की समाधि पर ही नही बल्कि मंगलवार को चले हंगामें के बीच और पूरी किसान क्रान्ति यात्रा के दौरान भी दिखाई दिया जिसमें हर हर महादेव और अल्लाहो अकबर के नारे और भजन और रांगनियों की गूंज और नमाज की अजान एक साथ सुनाई देती रही। भाजपा और संघी साजिश में फंसकर हिंदू मुसलमान बन गये किसान एकबार फिर से मेहनतकश किसान बनकर साथ साथ संघर्ष के मैदान में एकजुट दिखाई पडे। नफरत और बंटवारे के दर्द को साथ मिलकर चले संघर्ष ने भूला दिया, मिटा दिया। भाजपा के लिए यह चुनौती नही बल्कि उससे आगे संघ-भाजपा की हार की लकीर खींच देने का अगला चरण था। अब भाजपा के लिए चुनौती केवल इतनी है कि आगामी लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में अपने आपको हार का दंश झेलने के लिए कैसे तैयार कर पाती है। उसकी हार की निर्णायक पटकथा तो किसानों की इस क्रान्ति यात्रा ने लिख दी है। दिल्ली से वापस लोटे किसान सीमा पर पुलिसिया हमले की अनेकों अनेक कहानियां लेकर वापस जायेंगे और फिर वही कहानियां गांव गांव घर घर में फैलेंगी और मोदी सरकार के खिलाफ बन रहे माहौल की आग को और तेज करेंगी।