एनडीए में टूट की संभावनाओं के बीच नीतीश कुमार का टूटता जनाधार

आईएनएन भारत डेस्क
बिहार में आगामी 2019 के आम चुनावों को लेकर जहां एनडीए सीट शेयरिंग को लेकर टूट के कागार पर पहंुच चुका है तो वहीं नीतीश कुमार के लिए अपना जनाधार बचाने के लिए भी कसरत करनी पड रही है। अपने अति पिछड़ा और महादलित जनाधार के खिसक जाने को डर नीतीश पर इस कदर हावी हो गया है कि उन्होंने भी मोदी की तर्ज पर एक समारोह में अल्पसंख्यकों द्वारा पहनाई जा रही टोपी पहनने से इंकार कर दिया। इसका अर्थ साफ है कि नीतीश का जनाधार टूट रहा है और वह अब भगवा राजनीति और वोटों के सहारे ही हैं। दरअसल, एनडीए के अंदर एक तरह का ‘राजनीतिक तूफान‘ मचा हुआ है। घटक दल ना केवल एक-दूसरे को शतरंजी बिसात पर शह-मात देने के मूड में दिख रहे हैं बल्कि एक दूसरे के जनाधार का झटकने की रणनीति में भी लगे हैं। खासकर नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा तो खुलकर एक-दूसरे के सामने आ गए हैं और सधे कदमों से वार पर वार कर रहे हैं। लेकिन इन सबसे हटकर दोनों का आधार वोट बैंक अंदर ही अंदर नए समीकरण गढ़ने में जुट गया है।

बिहार के मगध से लेकर पूर्व बिहार के भागलपुर व पूर्णिया-किशनगंज तक फैले धानुक-कुर्मी समाज एकजुट होकर अपनी ताकत दिखाने के मूड में साफ दिख रहे हैं। सियासी गलियारों में तेजी से जारी चर्चाओं से साफ समझा जा ससकता है कि मगध से लेकर पूर्व बिहार के लगभग 22 जिलों के धानुक व कुर्मी समाज के बुद्धिजीवियों की एक गोपनीय बैठक हुई है। इसी में धानुक-कुर्मी एकता मंच का गठन किया गया है। इसके संयोजक के रूप में इसकी कमान शेखपुरा के जितेंद्र नाथ को दी गयी है। उन्हें लव-कुश यानी कुर्मी और धानुक को संगठित करने की महती जिम्मेदारी दी गयी है।

पटना में एक मीटिंग को संबोधित करते हुए जितेन्द्रनाथ

इसके अलावा आगामी 2 नवंबर को बिहार में धानुक-कुर्मी एकता मंच ‘सम्मान व स्वाभिमान सम्मेलन‘ के बहाने अपनी ताकत दिखायेगा। हालांकि पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल में होने वाले इस सम्मेलन की जानकारी धीरे-धीरे तमाम दलों को हो गयी है। खासकर नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा तो इसे लेकर अंदर ही अंदर सियासी संपर्क भी शुरू कर दिया है। दरअसल इस एकता मंच में शामिल बुद्धिजीवियों में दोनों नेताओं के समर्थक शामिल हैं। हालंाकि धानुक-कुर्मी एकता मंच के संयोजक जितेंद्रनाथ की और राजनीतिक संदर्भ में इसके मायने के बारे में पूछा तो उन्होंने इस मंच का किसी भी राजनीतिक पार्टी से संपर्क होने से साफ इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह विशुद्ध रूप से सामाजिक संगठन है और यह संगठन अपना पत्ता समय पर खोलेगा। बस अभी मंच का एक ही मकसद है कि संगठन को मजबूत किया जाए। और हम लोगो का फोकस है कि 2 नवंबर को होने वाला सम्मेलन ऐतिहासिक हो। इसी को लेकर धानुक-कुर्मी समाज के बुद्धिजीवियों की समय-समय पर बैठक हो रही है। रैली की तैयारी की मॉनिटरिंग हो रही है।

जातिगत समीकरण को समझाते हुए जितेन्द्रनाथ कहते हैं कि बिहार मंत्रिमंडल में 13-13 परसेंट वोट बैंक होते हुए भी धानुक-कुर्मी के सिर्फ दो मंत्री हैं, जबकि सवर्ण समाज के 7 मंत्री हैं। इतना ही नहीं, समाज के लोगों को कई तरह के संकटों से गुजरना पड़ रहा है। पिछले दिनों शेखपुरा में धानुक समाज के सैकड़ों लोगों को पुलिस ने बुरी तरह पीटा था, कइयों को जेल भेज दिया गया था। समाज के मुख्यमंत्री होते हुए भी लोगों को इंसाफ नहीं मिला। ऐसे में अब यह समाज अपने सम्मान और स्वाभिमान के लिए एक बार फिर आगे आ रहा है। इतिहास करवट लेने के मूड में है और 2 नवंबर समाज के लिए ऐतिहासिक दिन होगा. यदि सरकार नहीं संभली तो इसका खामियाजा भी उसे ही भुगतना होगा।

दरअसल, जितेन्द्रनाथ की यह लव-कुश प्लस सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है जिसकी व्याख्या ‘खीर थ्योरी‘ के जरिए कुशवाहा सामने ला चुके हैं। यह व्यापक योजना है पर मूल रणनीति कुशवाहा को कुर्मी-कोईरी समाज का सर्वमान्य नेता बनाने की है। लिहाजा ये नीतीश कुमार के वोट बैंक की कीमत पर ही सफल होगी। जितेन्द्रनाथ कुशल संगठनकर्ता के तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से पहचान बनाकर आये हैं। अब उपेंद्र नाथ नई सोशल इंजीनियरिंग की कवायद में जुटे हुए हैं। हाल ही में पटना में इसकी बानगी दिखाई भी पड़ रही है कहा जा रहा है कि उनके द्वारा डिजायन किये गये दलित, अति पिछडा अधिकार जिला सम्मेलनों ने काफी हद तक नीतीश के जनाधार में सेंध लगाने का काम किया है।