आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मध्य वर्ग के लिए राहत भरा, निजता और आधार सुरक्षा पर संशय बरकरार

आईएनएन भारत डेस्क
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बदलावों के साथ आधार की संवैधानिकता को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आधार पर अपना फैसला सुनाते हुए आधार को संवैधानिक रूप से वैध बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर को केंद्र के महत्वपूर्ण आधार कार्यक्रम और इससे जुड़े 2016 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कुछ याचिकाओं पर फैसला सुनाया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 38 दिनों तक चली लंबी सुनवाई के बाद 10 मई को आधार मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले में हाईकोर्ट के पूर्व जज के. एस. पुत्तास्वामी की याचिका सहित कुल मिलाकर 31 याचिकाएं दायर की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने आधार को संवैधानिक रूप से वैध बताते हुए कहा कि सरकार को डेटा सुरक्षित करने के तरीकों पर काम करना चाहिए। लेकिन इस मसले पर कोर्ट ने कई अहम आदेश भी दिए हैं। ये आदेश कुल मिलाकर देश के मध्य वर्ग के लिए काफी राहत भरे साबित हो सकते हैं। वैसे फैसले को देखा जाये तो यह फैसला भारत के नये सुविधा भोगी मध्य वर्ग के कईं राहत लेकर आया है। भारतीय मध्य वर्ग की चिंता दरअसल कोई बड़े क्रान्तिकारी बदलावों की नही है बल्कि उसे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में छोटी मोटी मुश्किलों से राहत चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने इस मध्य वर्ग का अपने फैसले में पूरा ध्यान रखा है। असल में फैसला सुनाने वाले जज भी सभी उसी वर्ग से आते हैं और यदि साफगोई से कहा जाये तो उनका फैसला अपने वर्ग को राहत देने वाला ही कहा जाना चाहिए।

आज हर दूसरे काम के लिए आधार की अनिवार्यता को झेल रहे शहरी मध्य वर्ग को इससे बड़ी राहत महसूस होगी। इस फैसले के बाद अब कई कामों के लिए लोगों को आधार देने की जरूरत नही होगी। अधिकतर उन कामों और सेवाओं में राहत दे दी गयी है जिन सेवाओं का सबसे ज्यादा उपयोग और उपभोग भारत का नवोदित मध्य वर्ग करता है। इन दी गयी राहतों से ना केवल लोगों को बल्कि दूरसंचार कंपनियों, वित्त क्षेत्र की कंपनियों और बैंकों के अलावा कुकुरमुत्ते की तरह रोज उग रहे निजी शिक्षण संस्थानों को भी अधार के चक्कर से छुटकारा मिल जायेगा। बहरहाल, इन कामों के लिए अब आधार की जरूरत नही हैः

-मोबाइल नंबर के लिए अब आधार नंबर लिंक कराने की जरूरत नहीं है।

-नया सिम कार्ड लेने के भी लिए आपको आधार नंबर उपलब्ध कराने की जरूरत नहीं होगी।

-बैंक में अकाउंट खुलवाने के लिए भी आधार अनिवार्य नहीं रहेगा। बैंक खाते से आधार लिंक कराने की अब जरूरत नही है।

-आधार एक्ट की धारा 57, 2(क) को खत्म कर दिया है। इसके तहत अब किसी प्राइवेट कंपनी को आधार देना अनिवार्य नहीं होगा। अर्थात सिम लेने या पेटीएम के लिए अब आधार की जानकारी देना जरूरी नहीं है।

-यूजीसी, एनईईटी, सीबीएसई की परीक्षाओं के लिए भी आधार की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी है।

-स्कूल में एडमिशन के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं। कोर्ट ने कहा कि स्कूल में एडमिशन का फायदा सेक्शन 7 के तहत नहीं आता है इसीलिए इसके लिए आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है।

– कोर्ट ने कहा कि अगर कोई बच्चा आधार जमा नहीं करता तो भी उसे किसी स्कीम से बाहर नहीं रखा जा सकता है। आधार के लिए बच्चों का एनरॉलमेंट कराने के लिए जरूरी है कि उनके अभिभावक इस बात के लिए राजी हो।

परंतु आधार की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आधार की सुरक्षा को बनाये रखने के लिए सरकार पुख्ता इंतजाम करे और इस पर नये सिरे से गौर करे।

इतनी राहतों के बाद भी आधार को पैन कार्ड से लिंक कराना होगा। साथ ही इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हुए भी आधार की जरूरत पड़ेगी क्योंकि फैसले में इनकम टैक्स की धारा 139।। को बरकरार रखा गया है।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक अहम बदलाव करते हुए फैसला दिया है कि सरकार या कोई कंपनी आधार नंबर को छह महीने से ज्यादा स्टोर नहीं कर सकती है। यानी अगर आप बैंक खाता खुलवाने या सिम कार्ड लेने के लिए आधार नंबर देते हैं तो उस आधार को 6 महीने से ज्यादा स्टोर नहीं किया जा सकता है। पहले यह डेटा पांच साल तक रखने की बात हुई थी। हालांकि कोर्ट के इस फैसले पर अभी से सवाल उठ रहे हैं कि जब एकबार आधार नंबर तैयार हो गया तो उसमें हमेशा के लिए आपक सारी सूचनाएं एकत्र हो जाती हैं फिर छह महीने क्या आपकी जानकारी आधार नंबर हासिल करने वाले के पास हमेशा बनी रहेगी। इसे कई जानकार लोग अव्यवहारिक भी बता रहे हैं।

बहरहाल, सवाल अब सरकार की नीयत का है। इस कारपोरेट विकास के जमाने में सरकार प्रत्येक व्यक्ति पर निगरानी रखना चाहती है और उसी लिए इस आधार नंबर की ईजाद भी हुई है। दरअसल, सूचना अधिकार कानून अर्थात आरटीआई जहां नागरिक को सशक्त करता है और सरकार की निगरानी का अधिकार देता है तो वहीं आधार नंबर से मौजूदा कारपोरेट नियंत्रित सरकारें नागरिकों की निगरानी की अपनी इच्छा को कानूनी जामा पहनाना चाहती हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसले सरकार और नागरिक दोनों को थोडी राहत दी है तो वहीं दोनों को कुछ संशय में भी छोड़ा है।