महागठबंधन में दरार, कांग्रेस का अहंकार या मायावती की आकांक्षायें?

आईएनएन भारत डेस्क
आरएसएस-भाजपा को हराने के दावे कर रहे महागठबंधन में लगता है कि बनने से पहले ही दरार पड़ गयी है। मायावती छत्तीसगढ़ में अजित जोगी के साथ मिलकर चुनाव लडेंगी। इस घोषणा के साथ ही भाजपा-आरएसएस के विकल्प की भ्रुण हत्या हो गयी है। बसपा और अजित जोगी के गठजोड के साथ ही कांग्रेस ने भी राजस्थान और मध्य प्रदेश में अकेले चलने की घोषणा कर डाली है। जिससे आगामी लोकसभा चुनावों में महागठबंधन बनने की कवायद पर भी अवश्य ही फर्क पडेगा।

इस खबर के फौरन बाद ही एक तीसरे मोर्चे की चर्चा फिर से सियासी गलियारों में जोर पकड़ने लगी है। राजस्थान में सात दलों ने मिलकर एक राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चे का इसी महीने के शुरू में गठन करने की घोषणा की थी। इसके अलावा मध्य प्रदेश में भी ऐसे ही मोर्चे की कवायद जोर पकड चुकी है। इस मोर्चे के लिए प्रयास करने वाले भाकपा के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अनजान की माने तो मध्य प्रदेश में मोर्चे की चर्चा अपने निर्णायक दौर में है और कभी भी उसकी घोषणा की जा सकती है। अब मायावती के छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से अलग जाने पर यह चर्चा भी जोरों पर है कि मायावती भी इस वाम जनवादी मोर्चे में शामिल हो सकती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा ने राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चे के गठन की घोषणा के समय इस बात का इशारा किया था।

इसके अलावा भी भाकपा नेता अतुल कुमार अनजान ने आईएनएन भारत से बातचीत में कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री देवगौडा जी की बात इस बारे में मायावती से हुई है उन्होंने अपने जयपुर भाषण में ही साफ कर दिया था कि यदि कांग्रेस से मायावती की वार्ता विफल रहती है तो वह हमारे इस नये मोर्चे में शामिल हो सकती हैं। उनका स्वागत है। राजस्थान में सात दलों के इस मोर्चे में भाकपा, माकपा, जडीएस, रालोद, समाजवादी पार्टी, भाकपा-माले, एमसीपीआई शामिल हैं। भाकपा नेता की माने तो मध्य प्रदेश में भी मोर्चे ने सीटों की पहचान शुरू कर दी है।


अब इसी प्रकार से विभिन्न समाचार पत्रों में खबरें आ रही हैं जिससे जाहिर होता है कि मायावती तीसरे विकल्प पर विचार कर रहीं हैं। अगर ऐसा कोई मोर्चा बनता है तो यह भाजपा के लिए खुशखबरी की इस समय सबसे बड़ी खबर होगी। हालांकि कांग्रेस के नेताओं की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी हो रही हैं। उससे मायावती और कांग्रेस के बीच किसी प्रकार के तालमेल बनने की संभावना नजर नही आ रही है। बल्कि नेताओं के बयानों से हालात बिगडते ही दिखाई पड़ रहे हैं।

अब सवाल यह है कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है। कांग्रेस का अहंकार अथवा मायावती की अखिल भारतीय स्तर पर विस्तार और प्रधानमंत्री बनने की इच्छा। या दोनों ही। भाजपा की बिगडती हालत को देखकर कांग्रेस को लगता है कि वह तीनों राज्यों में अपने दम पर चुनाव जीत सकती है। पंरतु उसे यह समझना पड़ेगा कि देश और तीनों राज्यों की जनता भाजपा और उसकी नीतियों से परेशान जरूर है और संभवत उसे सबक सिखाना चाहती है। परंतु भाजपा की इस हालत का अर्थ कांग्रेस के लिए कोई वापसी की गारंटी नही है। यह भाजपा को नकारने वाला वोट हो सकता है कांग्रेस के लिए सकारात्मक वोट नही। जनता दोंनों की आर्थिक नीतियों और उसमें एकसमानता को अच्छी तरह से समझती है। इसीलिए कांग्रेस को इसे अपनी वापसी के हालात नही समझकर भाजपा को नकारे जाने की परिस्थितियां समझकर ही रणनीति बनाते हुए सभी भाजपा विरोधी वोटो ंको एकजुट करना चाहिए। वैसे कांग्रेस को यह भी समझना चााहिए कि तमाम गिरावट के बावजूद भाजपा और संघ का एक निश्चित वोट बैंक है जिससे उसने सालो सांप्रदायिकता का जहर फैलाकर तैयार किया है। उससे नीचे भाजपा नही जायेगी और निश्चित वोट बैंक को छोटा करने के लिए सभी विरोधी दलों को एकसाथ आकर अपने बड़े संयुक्त वोट बैंक से भाजपा को छोटा करना पड़ेगा। यदि विपक्षी वोट बैंक बंटा तो भाजपा के लिए जीतना आसान हो जायेगा।

वैसे भी बसपा ने छत्तीसगढ़ में उससे कम ही सीटों की मांग की थी जितनी उसे जोगी के साथ गठजोड़ में मिली हैं। सूत्रों की माने तो बसपा छत्तीसगढ़ में 11 सीटों की मांग कर रही थी। परंतु कांग्रेस को लगता है कि उन्हें 11 सीटें देने की क्या जरूरत है वह तो अपने दम पर सारी सीटें जीत ही जायेगी। इसीलिए छत्तीसगढ में कांग्रेस के इस गरूर ने कि वह अकेली जीत जायेगी। बात नही बनने दी। इसके अलावा कहा जा रहा है कि कांग्रेस के छत्तीसगढ़ के इंचार्ज पुनिया भी इस गठजोड़ की एक रूकावट रहे हैं। ध्यान रहे कि पुनिया पहले बसपा में ही थे और बसपा छोड़ने के बाद ही उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा था। मायवती और पुनिया के बीच तल्ख बयानबाजी और टकराव को पूरे देश ने देखा भी था और सुना भी था। कांग्रेस को बसपा से बात करते हुए कम से कम इस बात का ध्यान रखना चााहिए था।

हालांकि कुछ लोग अभी इसे मायावती का दबाव का दांव बता रहे हैं। याद रहे कि मायावती ने एकबार हरियाणा में भी ऐसे ही इनलो के ओम प्रकाश के चौटाला के साथ भी गठजोड़ किया था और फिर ऐन चुनाव से पहले अचानक उस गठजोड़ को तोड दिया था। अब देखें उंट किस करवट बैठता है। लेकिन यह तो तय है कि यदि तीन राज्यों में वोटों का बिखराव होगा और भाजपा जितेगी तो इसका असर आगामी लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। कहीं ऐसा नही हो कि कांग्रेस-बसपा की इस तकरार में 2019 भी आरएसएस-भाजपा की झोली में जा गिरेगा। यदि भाजपा-आरएसएस को हराना है अखिलेश यादव जैसी समझ बनानी होगी। अखिलेश का साफ कहना है कि यदि भाजपा को हराने के लिए दो कदम पीछे भी हटना पडे तो हटूंगा। बाॅल अभी भी कांग्रेस और बसपा के पाले में ही है। अभी भी दोनों मिलकर बात बना सकते हैं और इस महागठबंधन की भ्रुण हत्या को रोक सकते हैं।