संघ-भाजपा की हार की आहट और माफीनामों का इतिहास

आईएनएन भारत डेस्क
आरएसएस द्वारा विज्ञान भवन में आयोजित संवाद सम्मेलन में जिस प्रकार से संघ ने अपनी छवि सुधारने की मुहिम की शुरूआत करते हुए झूठ का अंबार लगाया उससे साफ जाहिर है कि संघ-भाजपा आगमी लोकसभा चुनाव 2019 में अपनी हार की आहट से डरे हुए हैं। हालांकि संघ प्रमुख भागवत ने कई धर्मनिरपेक्ष और जनवादी नेताओं को बुलाया था परंतु केवल एक दो छुपे संघियों के अलावा इस संवाद सम्मेलन में कोई नजर नही आया। इस संवाद सम्मेलन में जाने माने कारपोरेट दलाल अमर सिंह और जदयू नेता के सी त्यागी को छोड़कर किसी ने भी जाना जरूरी नही समझा। संवाद सम्मेलन को देखकर लगता है कि यह संघ परिवार द्वारा रिमोट नियंत्रित नरेन्द्र मोदी नीत भाजपा सरकार की विफलताओं का ढ़कने और छवि सुधारने का एक गंभीर प्रयास मात्र था। यही कोई पहला मौका नही है, हाल ही में आरएसएस कईं अवसरों पर अपनी खाल बचाने और सार्वजनिक छवि सुधारने के लिए ऐसा कर चुकी है। मौजूदा मेकओवर को एक बच्चा भी बता सकता है कि इसका मकसद 2019 के चुनावों के मद्देनजर जनता को जीतने के लिए क्योंकि यह अभी से लगभग तय हो चुका है कि मतदाता आरएसएस नियंत्रित मोदी सरकार को चुनावों में खारिज करेंगे।

छवि सुधारने की इस कवायद को देखकर कोई भी संघ के पुराने पहले के छवि सुधार कोशिशों को याद कर सकता है। छवि सुधारने और अपनी जाने बचाने के लिए माफीनामें देना और अपने कृत्यों से मुकर जाना संघ और भाजपा का पुराना जाना पहचाना कारोबार रहा है। कोई भी उस समय को नही भूल सकता है जब आरएसएस नेताओं ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को माफीनामा लिखकर दिया था। केवल इतना ही नही बल्कि उन्होंने इंदिरा के 20 सूत्रीय कार्यक्रम को भी पूरा समर्थन कर दिया था। यह कहा जा रहा है कि यह महाराष्ट्र विधानसभा की प्रक्रियाओं के रिकाॅर्ड में है कि उस समय के आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस ने पूणे की यरवदा जेल से कईं माफीनामें इंदिरा गांधी को भेजे थे, जिसमें आरएसएस को जेपी आंदोलन से अलग करने की बात उन्होंने कही थी।

आजादी के दिनों में वापस जायें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद 30 जनवरी 1948 को सरदार पटेल ने आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया था और केवल एक शर्त पर ही प्रतिबंध हटाने तैयार हुए थे कि वह एक लिखित संविधान प्रकाशित करे, अपने आपको सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित करे, हिंसा और किसी प्रकार के गुप्त एजेंडे में लिप्त नही हों, भारत के संविधान और ध्वज के प्रति वफादारी दर्शाये। माफीनाम देने के लिए गोलवलकर इतना आतुर थे कि नेहरू के उनसे मिलने को इंकार कर देने के बाद भी वह प्रतिबंध के बाद 1949 में एक महीने से भी अधिक तक जवाहर लाल नेहरू से मिलने के लिए दिल्ली में टिके रहे। उस समय के आरएसएस प्रमुख गोलवलकर ने सरदार पटेल की शर्तों को मानकर शर्तो के अनुसार माफीनामा दिया और तब जाकर प्रतिबंध हटा, परंतु उन्होंने कभी भी लिखित कानून नही बनाया और ना ही व्यवहार में यह केवल पूरी तरह से सांस्कृतिक संगठन ही रहा।

इसके अलावा उनके मानस पिता सावरकर के बारे में दुनियाभर में मशहूर है कि उन्होंने कितने माफीनामें ब्रिटिश सरकार को दिये और आखिर में अपनी रिहाई के बाद पूरी जिंदगी ब्रिटिश सरकार की शर्तों और निर्देश के अनुसार काम किया। एक तरह से देखा जाये तो आधुनिक भारत के इतिहास में सावरकर माफीनामें के चैंपियन ही माने जायेंगे। सह केवल माफी नामें की बात है यदि समर्पण की बात लें तो ब्रिटिश सरकार के सामने समर्पण के खत लिखने में भाजपा और संघ के दूसरे पितामह भी पीछे नही रहे हैं। अब भागत और संघ हार की आहट सुनकर इतना घबराया हुआ है कि धर्मनिरपेक्ष, जनवादी लोगों को बुलाकर अपने आपको उदार सिद्ध करने के लिए झूठ पर झूठ बोले जा रहा है। कभी भी संविधान को नही मानने वाला और हमेशा से तिरंगे का अपमान करने वाला संघ आज तिरंगे का ध्वजवाहक बन रहा है और संविधान के पालन और उसके सम्मान की बात कर रहा है। इसे भी संघ का एक मौखिक माफीनामा ही माना जाना चाहिए।

वर्तमान समय में आने पर छवि बदलने की एक और कोशिश है कि मोदी सरकार के पांचवे साल में संघ परिवार द्वारा नियंत्रित मोदी सरकार को लेकर आरएसएस को अब यह पूरी तरह से साफ हो गया है कि यह ना केवल बुरी तरह से विफल रही है बल्कि इसने नोटबंदी और जीएसटी के माध्यम से जनता की जिंदगी को जिन दुर्दशाओं में धकेल दिया जनता उन्हें उसके लिए कभी भी माफ नही करेगी। शाह-मोदी की जोड़ी स्वयं कह रही है कि यदि 2019 में जीते तो 50 साल तक राज करेंगे। परंतु संघ और भाजपा इससे विपरीत असलियत से वाकिफ हैं कि 2019 में हार तय है और अबकी हारे तो 50 साल तक कोई भाजपा का वापस नाम नही लेगा। उपरोक्त से यह स्पष्ट हो जाता है कि क्यों आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री मोदी पूरी तरह से अपनी छवि बदलने की कसरत में लगे हैं। कुछ भी हो भारत पूरी तरह से जन विरोधी, सांप्रदायिक, फासीवादी मोदी सरकार को आगामी आम चुनावों में बाहर फेंकने के लिए तैयार बैठी है।