झूठ के प्रसारण का केन्द्र बना दिल्ली का विज्ञान भवन

महेश राठी
देश की राजधानी दिल्ली का प्रतिष्ठित विज्ञान भवन तीन दिनों के लिए मानों झूठ प्रसारण केन्द्र ही बनकर रह गया है। या पूरे विश्वास के साथ बोले जा रहे संघ प्रमुख के झूठों को सुनकर कहा जा सकता है कि लगता है झूठ और अफवाहों के कारखाने के प्रमुख का 2019 के लिए प्रचार अभियान शुरू हो चुका है। आरएसएस ने विज्ञान भवन में 17-19 सितंबर तक ‘भविष्य का भारतः आरएसएस का दृष्टिकोण‘ नामक विषय पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। जिसमें स्वयं संघ प्रमुख ने अपने आप को संविधान और राष्ट्र ध्वज का आदर करने वाले देशभक्त संगठन के रूप में पेश करने का प्रयास किया परंतु तथ्य और सत्य फिर से एकबार सिद्ध कर रहे हैं कि संघ झूठ और तथ्यों को तोड मरोडकर पेश करने का चैंपियन संगठन है। पूरा देश जानता है कि देश की आजादी के समय और उसके बाद भी राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के प्रति संघ का क्या रूख रहा है और आजादी की लड़ाई संघ और उसके नेताओं का क्या योगदान रहा है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के प्रति अपनी वफादारी का इतिहास बताते हुए कह दिया कि जब से तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज माना गया तभी से संघ उसका सम्मान करता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले संघ प्रमुख डाॅ. हेडगेवार ने एक सकुर्लर जारी करके 1930 में अपने स्वयंसेवकों को तिरंगा फहराने का निर्देश दिया था। जबकि हकीकत इससे ना केवल अलग है बल्कि संघ द्वारा तिरंगे को लगातार अपमानित करते रहने की है। जब कांग्रेस ने 31 दिसंबर 10929 को पहली बार तिरंगा फहराया था और पूरे देश का आहवान किया था कि आने वाली 26 जनवरी को तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाये तो उसके बाद डाॅ. हेडगेवार ने एक सकुर्लर जारी करके तिरंगा नही फहराने का निर्देश संघ शाखाआंें को दिया था। 21 जनवरी 1930 को एक सकुर्लर जारी करते हुए आरएसएस प्रमुख हेडगेवार ने साफतौर अपने कार्यकर्ताओं को तिरंगे की जगह भगवा ध्वज फहराने के निर्देश दिये थे।

इस सकुर्लर की प्रति हेडगेवार के द्वारा जारी किये गये सर्कुलर्स को हिंदी में अनुवादित करने वाले एनएच पालकर द्वारा प्रकाशित सर्कुलर्स संग्रह में देखी जा सकती है। एचएन पालकर द्वारा हिंदी के इस संग्रह का प्रकाशन 1989 में किया गया था। पालकर आरएसएस के एक वफादार स्वयंसेवक थे। जिसकी प्रशंसा गोलवलकर तक ने की थी। संग्रह का नाम ‘‘डाॅ. हेडगेवारः पत्ररूप व्यक्तिदर्शन है‘‘।

इसके अलावा आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र आर्गेनाइजर ने 14 अगस्त 1947 को अपने संपादकीय में लिखा था कि वो लोग जो भाग्य के सहारे से सत्ता में आ गये हैं उन्होंने हमारे हाथों में तिरंगा थमा दिया है परंतु इसका हिंदुओं के द्वारा कभी भी सम्मान नही किया जायेगा। तिरंगा शब्द अपने आप में बुरा है और इसमें तीन रंग हैं जो निश्चित ही बहुत बुरा मानसिक असर पैदा करेंगे और यह एक देश के लिए खराब है।

ठीक इसी प्रकार से अपनी किताब बंच आॅफ थाॅट्स में गोलवलकर लिखते हैं कि हमारे नेताओं ने देश के लिए एक नया ध्वज तय कर दिया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह पूरा केस बहकने का और नकल करने का है……हमारा प्राचीन और गौरवमयी इतिहास है। तब क्या हमारा अपना ध्वज नही था? क्या हमारा हजारों साल से कोई प्रतीक नही था क्या? निसंदेह था। तब क्यों यह निरा खोखलापन यह निरा खालीपन हमारे दिमागों में है? तिरंगे के प्रति इसी विरोधी और बैर की भावना के संघ को अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराने में आजादी के बाद भी 52 साल लग गये।

मामला केवल तिरंगे तक ही नही हैं। संघ और उसके जन संगठनों ने संविधान की भी इसी प्रकार से ना केवल अवमानना की बल्कि उसकी जगह मनु स्मृति को अपना दण्ड़ विधान बताया। ना केवल दण्ड विधान बताया बल्कि संविधान में महिलाओं को दिये जा रहे अधिकारों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर अभियान चलाया पूरे देश में जलसे जुलूस किये रैलिया आयोजित की। वास्तव में भारतीय हिंदू समाज में इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की दुर्दशा का कारण सामाजिक और सांस्कृति अधिक है। परंतु जब डाॅ. अंबेडकर ने महिलाओं के अध्किारों और बहु-विवाह प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर संविधान सभा में पेश किया तो संघ सहित सारे ब्राह्मणवादी बौखला गये और विरोध शुरू कर दिया। यदि हम पौराणिक हिंदू ग्रंथों को देखें तो उसमें आपको कोई तलाक जैसा प्रावधान कहीं नही मिलेगा। इसका कारण सामाजिक और सांस्कृतिक है। तथाकथित हिंदू संस्कृति की ठेकेदारी करने वाले संगठन आरएसएस ने भारत का संविधान तैयार होने के समय हिंदू कोड़ बिल और उसमें महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए किये गये प्रावधानों का डटकर विरोध किया था। हिंदू कोड बिल में तलाक का प्रावधान था तो वहीं महिलाओं को पैतृक संपति में अधिकार हासिल था। इसके अलावा देश में पहली बार बहुविवाह की प्रथा पर रोक और उसे गैर कानूनी बनाने का प्रावधान भी डाॅ. अबेंडकर ने किया था। जिसका आरएसएस और उसके संगठनों ने डटकर विरोध किया था। आरएसएस और उससे जुड़े हुए संगठन हिंदू कोड बिल के विरोध में सड़कों पर उतरे और हिंदू कोड बिल को संविधान के साथ लागू नही होने दिया गया।

हिंदू कोड बिल के प्रावधानों बहुविवाह पर रोक और महिलाओं को तलाक, संपति में अधिकार के खिलाफ मार्च 1948 में एक एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी का मानना था कि किसी को भी हिंदू समाज के पसर्नल मामलों में दखल करने का अधिकार नही है। आज जो तर्क मुस्लिम पसर्नल लाॅ बोर्ड दे रहा है एंटी हिंदू कोड बिल के तर्क उससे कई गुणा आगे और हास्यास्पद थे। अपनी मर्जी से शादी करने और तलाक के अधिकार और पैतृक संपति में महिला की हिस्सेदारी को हिंदू विरोधी बताया गया। यह लड़ाई केवल तर्कों तक ही नही थी बल्कि आरएसएस ने इसे मैदान में भी साकार किया। जिसके लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में 11 दिंसबर 1949 को एक जनसभा का आयोजन किया गया। आरएसएस के नेताओं ने एक के बाद एक अपने भाषणों में हिंदू कोड बिल का विरोध किया। संघ और उसके सहयोगी नेताओं ने मनु और याज्ञवलक्य के बनाये गये विधान को अक्षुण्ण और अपर्रिवतर्नीय बताया और उसे बचाने के लिए देश में सैंकड़ों जनसभाओं का आयोजन किया। पूरे देश में घूम घूमकर संघ और उसके संगठनों ने हिंदू कोड़ बिल में महिलाओं को सशक्त करने वाले प्रावधानों को चुनौती दी।
संघ टोले का यह अभियान केवल मैदानी अभियान यह संघी नेताओं तक सीमित नही था। भाजपा के आदर्श नेता और भाजपा और संघ के एक प्रेरणा स्रोत श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस लड़ाई के एक अहम हिस्सा थे और ना केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी बल्कि आज के उनके हाल ही में दिवंगत आदर्श अटल बिहारी वाजपेयी भी इस महिला सशक्तिकरण विरोधी लड़ाई में पीछे नही थे। 1949 के उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी संघ से जुड़े हुए अखबार पांचजन्य के संपादक थे और यदि आप सितंबर-दिसंबर 1949 के उनके अखबार में छपे आलेखों के शीर्षकों को पढ़े तो हिंदू महिला सशक्तिकरण विरोध में अटल की भूमिका और उनके मानस को समझ सकते हैं। उनके अखबार के आलेखों के शीर्षक काफी रोचक थे जिसमें वो कहते हैं कि ‘‘यह कोड बिल दांपत्य संबंधों पर कुठाराघात है‘‘, ‘‘यह वैवाहिक संस्था को तोडने वाला बिल है‘‘। भागवत के संघ के स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी ने केवल दूसरे लोंगो के लिखे को प्रकराशित किया बल्कि हिंदू कोड बिल के खिलाफ संपादकीय भी लिखे।

पांचजन्य ने अपने एक अंक में हिंदू कोड बिल विशेषकर तलाक का विरोध करते हुए लिखा था कि बापू ने भी कभी तलाक पर कुछ नही कहा अर्थात वह भी यथास्थिति बनाये रखने के पक्ष में थे। ध्यान रहे बापू की हत्या के बाद संघ पर रोक के साथ ही आर्गेनाइजर के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी गई थी। संघ से जुड़े समाचार पत्रों ने अपने विरोध में उन्होंने केवल हिंदू कोड बिल को ही निशाना नही बनाया बल्कि पूरे संविधान को निशाना बनाया और कहा कि डाॅ. अंबेडकर का तैयार किया गया ‘‘संविधान अंग्रेजी बैण्ड़ पर डांस जैसा है‘‘ और नवनिर्मित संविधान और कुछ नही ‘‘भानुमति का पिटारा भर है‘‘। यहां तक इन ब्राहमणवादी ताकतों ने साफ कहा कि हमारे दिलों में मनु बसे हैं और मनुस्मृति हमारा दण्ड़ विधान है। हम मनु और याज्ञवलक्य के होते किसी अंग्रेजी संविधान को नही मान सकते हैं। ध्यान रहे भारतीय संविधान और महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों का ऐसा विरोध करने वाले अखबार के संपादक अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसके अलावा संघ से जुड़े हुए दूसरे समाचार पत्र आर्गेनाइजर ने भी इसी प्रकार से हिंदू कोड़ बिल और संविधान का विरोध किया यहां तक कि तिरंगे को भी खारिज करते हुए अपने अखबार के मुखपृष्ठ पर भगवा झण्ड़े के समर्थन में द्विभाषी आलेख और संपादकीय छापा और शीर्षक दिया हमारा ध्वज (अवर फ्लेग)। इस आलेख में तिरंगे को खारिज करते हुए भगवा तिकोने ध्वज को ही अपना राष्ट्रीय ध्वज बताया था।