जेएनयू में आशानुरूप नतीजे, फिर जीता वाम

जेएनयू छात्रसंघ के नतीजे बिल्कुल आशाओं के अनुरूप आ ही गये। पहले से तय माना जा रहा था कि इन चुनावों में वाम छात्र संगठनों का गठजोड़ ही जीतेगा और आखिर में आये चुनाव नतीजों ने जाहिर कर दिया कि नतीजे एकदम से आशा के अनुसार ही आये हैं। हालांकि कुछ सीटों पर मतान्तर कम या ज्यादा हो सकता है परंतु नतीजे वाम गठजोड के पक्ष में ही आये हैं। वैसे इस बार वाम संगठनों ने पिछले साल की तुलना में अपने वोटों में इजाफा भी किया है।

                                                             चुनावों के अंतिम नतीजे

सभी सीटों पर जहां एबीवीपी दूसरे स्थान पर रही है तो वहीं पिछले कुछ सालों में बापसा भी एक ताकतवर छात्र संगठन के रूप में सामने उभरकर आया था। परंतु इस बार बापसा के वोट में एक गिरावट देखने को मिली है। जिसका प्रमुख कारण पिछले साल एकजुट होकर लड रहे बापसा और यूनाईटिड ओबीसी फोरम में आपसी मनमुटाव भी हो सकता है। इसके अलावा इस वर्ष छात्र राजद के मैदान में आ जाने के कारण और ओबीसी फोरम के छात्र राजद के पक्ष में चले जाने के कारण भी संभवत यह गिरावट देखी गई है। माना जा रहा है कि ओबीसी फोरम का वोट अबकी बार एकजुट एक जगह ना आकर बापसा और वाम संगठनों के बीच में बंटा है। उदाहरण के लिए उपाध्यक्ष और महासचिव पद पर वाम उम्मीदवारों के वोटों की गिनती अध्यक्ष पद से खासी अधिक रही है जो यह जाहिर करता है कि इन पदों पर यह वोट खासी तादाद में स्थानान्तरित हुआ है। वहीं संयुक्त सचिव पद पर इस वोट का बंटवारा एनएसयूआई और वाम उम्मीदवार के बीच हुआ जान पड़ता है। वैसे हम यदि पिछले कुछ सालों के वोटो के बंटवारे पर निगाह डाले तो पिछले साल तक वाम वोटों में एक तुलनात्मक गिरावट दर्ज हो रही थी। हालांकि यह एबीवीपी के किसी बढ़ाव का नही बल्कि विश्वविद्यालय में दलित, पिछडे वर्गों के अपने संगठनों के बनने और बढ़ने के कारण हुआ था। परंतु अब इन्हीं संगठनों में आपसी मनमुटाव के कारण इनके वोट बंटकर स्वाभाविक रूप से वाम खेमे की तरफ लोटते दिखे हैं। इस पर अलग से विचार करने की जरूरत है।

वाम वोटों के वोटों में इजाफे का एक बडा कारण वाम छात्र संगठनों का लगतार संघ और उसके छात्र संगठन एबीवीपी पर हमलावर रहना भी है। यह केवल चुनावों का मामला नही बल्कि प्रत्येक क्षेत्र में यह छात्र संगठन विश्वविद्यालय परिसरों, विशेषकर जेएनयू में पूरे साल संघ की राजनीति के खिलाफ हमलावर रहे हैं। रोजाना के विमर्श से लेकर, रोजमर्रा की गतिविधियों तक। जिसका परिणाम वाम संगठनों के वोटों में एक इजाफा इस वर्ष दिखाई पड़ा है। बावजूद इसके कि छात्र संगठनों का दावा है कि प्रशासन द्वारा लगभग एक हजार नये छात्रों को मताधिकार से वंचित किया गया था।

बहरहाल, जेएनयू के परिसर तक तो यह वाम एकता और एकजुट संघर्ष ठीक है परंतु इस परिसर से बाहर संघ-भाजपा को मात देने के लिए वाम के अलावा धर्मनिरपेक्ष और जनवादी ताकतों के साथ एकता और एकजुटता की जरूरत होगी क्या उसके लिए वाम खेमा और जनवादी ताकतें तैयार हैं। यह देखना होगा। क्योंकि इतनी व्यापक एकता दोनों पक्षों से कुर्बानी मांगती है और दोनों पक्षों को पार्टी पक्ष से अलग देश और जनवाद को बचाने को पक्ष बनाना होगा। यदि दोनों पक्ष केवल पार्टी हितों को उपर रखकर एकता की बात करते हैं तो इस एकता के बनने में ना केवल संदेह बल्कि यह भगवा राजनीति के पक्ष में समर्पण की तरह हो सकता है। इस एकता के लिए दोनों पक्षों को अपनी अपनी संकीर्णता त्यागनी ही होगी तभी यह एकता और फासीवादी भगवा राजनीति की हार संभव हो पायेगी। वैसे भी देश जेएनयू नही है।