कर्नाटक में भाजपा एकबार फिर से सत्ता हथियाने की जोड तोड में लगी?

आईएनएन भारत डेस्क
कर्नाटक में एकबार फिर भाजपा को जोडतोड से सरकार बना लेने का भ्रम हो गया है। इसीलिए कहा जा रहा है कि भाजपा नेता और  पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भाजपा कार्यकारिणी की बैठक बीच में ही छोड़कर कर्नाटक रवाना हो गये हैं। परंतु इसके जवाब में जेडीएस नेता और मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि उन्हें बीजेपी की डर्टी ट्रिक्स का ज्ञान है। परंतु हम उनका मुकाबला करने के लिए तैयार हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने हाल ही में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है। कांग्रेस और जेडीएस ने 60 प्रतिशत से ज्यादा सीटें जीती हैं और 53 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं। भाजपा अब शहरी इलाकों में मजबूत नहीं रही है। अगर हम सत्ता में बने रहे तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार होगी। इसी डर के कारण वे पुरानी रणनीति पर वापस आ गए हैं, लेकिन हम एक बार फिर से लड़ने के लिए तैयार हैं। 

कर्नाटक में अचानक ही राजनीतिक सरगर्मी तेज होने पर अटकलें लगाई जा रही है कि कांग्रेस-जेडीएस के गठबंधन वाली सरकार को गिराने के लिए भाजपा की कोशिशें तेज हो गयी हैं। ये अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने आए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता येदियुरप्पा शनिवार सुबह अचानक ही दिल्ली से बेंगलुरु लौट गए। हालांकि येदियुरप्पा ने बताया है कि वो किसी परिवारिक इमरजेंसी के चलते अचानक ही दिल्ली से बेंगलुरु लौटे हैं, इसका प्रदेश की राजनीति से कोई लेना देना नहीं है।

वास्तव में, कांग्रेस विधायक लक्ष्मी हेबालकर और बेलगाम जिले के ताकतवर जर्खिहोली भाइयों के बीच विवाद ने गठबंधन सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। ऐसे में भाजपा को नए सिरे से जोड़तोड़ करने का मौका मिल गया है और भाजपा इन बदले हुए राजनीतिक हालात का फायदा उठाना चाहत है। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर ने कहा है कि निश्चित रूप से भाजपा मौजूदा राजनीतिक हालात का फायदा उठाना चाहेगी।

वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन की परेशानियों के बढ़ने की एक दूसरी वजह भी है। कांग्रेस के ताकतवर मंत्री डीके शिवकुमार और उनके भाई डीके सुरेश के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू हो गई है। डीके सुरेश कांग्रेस के सांसद हैं। ध्यान रहे डीके शिवकुमार की मौजूदा सरकार को बनवाने में विशेष भूमिका रही है। वैसे शिवकुमार और देवगौडा एक ही समुदाय के आते हैं और उनके बीच पुरानी राजनीतिक स्पर्धा भी रही है। बावजूद उसके शिवकुमार ने भाजपा को कर्नाटक की सत्ता में आने से रोकने के लिए और कांग्रेस-जेडीएस की सरकार बनवाने के लिए पूरा दमखम लगा दिया था। इससे पहले भी शिवकुमार और उनका आलीशान रिजाॅर्ट गुजरात राज्यसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस विधायकों को रखने के मामले में खासा सुर्खियों में रहा है।

इन दोनों भाइयों का भाजपा पर कर्नाटक में सत्ता में आने के लिए तिकडम करने का आरोप है। उनका कहना है कि सत्ता के लिए भाजपा बेहद बेताब है। इसीलिए वो उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के केस में फंसाना चाहती है। डीके शिवकुमार ने कहा कि भाजपा ईडी और आयकर विभागों का इस्तेमाल कर हमें परेशान कर रही है। वे सोचते हैं कि हमें फंसाकर वो सरकार गिरा देंगे. लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा। हम लड़ेंगे और सरकार सुरक्षित बनी रहेगी।

मौजूदा कर्नाटक विधानसभा में कुल सदस्यों की संख्या 224 हैं, जिसमें दो सीटें खाली हैं। ऐसे में कुल 222 सीटों में सरकार के पास मौजूदा सीटें हैं 118 जिसमें कांग्रेस की 79, जेडीएस 36, बसपा 1, निर्दलीय 1। वहीं भाजपा के पास हैं केवल 104 सीटें। अब जाहिर है कि भाजपा किसी भी सूरत में कांग्रेस और जेडीएस में जोडतोड किये बगैर सत्ता हासिल कर नही सकती है। माना जाता है कि इसी जोडतोड के मद्देनजर येदियुरप्पा ने भाजपा कार्यकारिणी बीच में छोड़कर बैंगलुरू की उड़ान भरी है।

वैसे यह भी सच्चाई है कि यदि कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन की सरकार कर्नाटक में अगले लोकसभा चुनावों तक बनी रहती है और दोनों मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ते हैं तो कर्नाटक से भाजपा का पूरी तरह से सफाया हो जायेगा और दक्षिण और उत्तर पूर्व के दम पर वापस केन्द्र की सत्ता में आने का मोदी-शाह की जोडी का प्लान धरा का धरा रह जायेगा। इसीलिए भी भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व भी चाहता है कि किसी भी तरह से कर्नाटक में सरकार गिराकर भाजपा की सरकार बना ली जाये। जिससे कि लोकसभा में फिर से जीत का और केन्द्र में वापसी का सपना पूरा किया जा सके।

हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस और जेडीएस अलग अलग होकर लडे थे फिर भी उन्होंने बढ़त हासिल की थी। यदि वह दोनों लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ते हैं तो लगभग 56 प्रतिशत वोटों पर उनके गठबंधन का कब्जा होगा और ऐसे में भाजपा का कर्नाटक से सफाया होना तय है। कर्नाटक में लोकसभा की कुल 28 सीटें हैं और मौजूदा लोकसभा में उनमें से 17 भाजपा के पास और 9 कांग्रेस के पा और 2 जेडीएस के पास हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में जब कथित रूप से मोदी की लहर और सुनामी क्या क्या बतायी जा रही थी उस समय भी कर्नाटक में कांग्रेस के हिस्से में 40.80 प्रतिशत और जेडीएस के हिस्से में 11 प्रतिशत वोट थे। अबकी बार हवा मोदी सरकार के खिलाफ है तो ऐसे में जाहिर है कि भाजपा के वोट कम होंगे और कांग्रेस और जेडीएस साथ मिलकर लड़ते हैं और जाहिर है बसपा भी उनके साथ होगी जो कि अभी गठबंधन का हिस्सा है और उसका मंत्री भी सरकार में है तो वोटों की गिनती में 2014 की तुलना में इजाफा ही होगा। कर्नाटक के राजनीति के जानकारों का मानना है कि यदि लोकसभा चुनाव कांग्रेस, जेडीएस और बसपा साथ मिलकर लडते हैं तो उन्हें 28 में से 24-25 सीटें मिलना तय है। अब यही गणित है जो भाजपा को डरा रहा है और उसे कर्नाटक में सरकार गिराने के लिए मजबूर भी कर रहा है। जिसके लिए भाजपा एकबार फिर से जोडतोड में लग गयी है।