फ्लाप भारत बंद में आया सवर्णो का असली रंग सामने, पिछडे नेताओं पर हमले

आईएनएन भारत डेस्क
सवर्णो ने 6 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया था जिसका केवल कुछेक राज्यों में और कुछ जातियों में ही नाममात्र असर दिखा। इस मायने में इसे सुपर फ्लाप भारत बंद कहा जायेगा। इस भारत बंद को ऐसा पेश करने की कोशिश की गई थी कि मानो यह एससी/एसटी के खिलाफ सवर्णो और पिछड़ों की एकता है। इस बंद के आयोजक कह भी रहे थे कि यह 22 प्रतिशत के खिलाफ 78 प्रतिशत की लड़ाई है परंतु जैसे जैसे ही दिन चढ़ने लगा इस बंद ने दिखा दिया कि यह सुपर फ्लाप भारत बंद ब्राह्मणवादी भगवा आतंकियों का बंद था जिसने मौका लगते ही कुछ भगवा आतंकियों पिछड़ो को अपने निशाने पर ले लिया।

इस बंद के दौरान जहां बिहार में पप्पू यादव को मुजफ्फरपुर के खेबडा में निशान बनाया गया तो वहीं जदयू नेता श्याम रजक के काफिले पर भी भूमिहारों के गढ़ बेगूसराय में पथराव किया गया। बताया जाता है कि इस हमले में पप्पू यादव को अधिक चोट और श्याम रजक भी घायल हुए हैं। पिछडे, दलित नेताओं पर इस हमले ने दिखा दिया है कि इस फ्लाप बंद के पीछे अपने वर्चस्व की आखिरी लड़ाई की तरफ बढ़ रहा ब्राहमणवाद ही है और बंद के फ्लाप होने पर ब्राह्मणवादी भगवा गुण्ड़े किस कदर बौखला गये हैं।

इस भारत बंद को सफल दिखाने के लिए ब्राह्मणवादी मीड़िया इस कदर बेचैन था कि इसे सफल बताने के लिए उनके भौंपूओं एनडीटीवी और आजतक ने 2 अप्रैल के भारत बंद की तस्वीरें इस्तेमाल करने में भी शर्म नही की। उन्होंने इस बंद को सफल दिखाने के लिए 2 अप्रेल के बहुजन भारत बंद की तस्वीरों का बेशर्मी से इस्तेमाल किया।

बहरहाल, यही बहुजनों के संघर्ष की जीत है कि अभी तक अपने आपको प्रगतिशील और निष्पक्ष चैनल के रूप में प्रचारित करने वाला एनडीटीवी भी धीरे धीरे अपने असली ब्रह्मणवादी रंग में आ रहा है। उसकी प्रगतिशीलता और निष्पक्षता का मुखौटा भी बार बार धीरे धीरे उतर रहा है।

आज के भारत बंद में शामिल लोगों के नाम और उनके चेहरे यदि देखें तो इस बंद से साफ हो जायेगा कि यह भारत बंद दरअसल कुछ ब्राह्मण और राजपूत संगठनों का भारत बंद था। जिसमें कुछ ब्राह्मण और राजपूतों के अलावा कोई नजर नही आया। बंद के समर्थक संघ का तिकोना झण्ड़ा लेकर घूमते नजर आये जिससे साफ जाहिर था कि इस बंद के पीछे कौन लोग हैं और इसी कारण इस बंद का आंशिक असर भी भाजपा शासित राज्यों में ही दिखाई दिया। खासतौर पर शिवराज चैहान का मप्र इसमें थोड़ा आगे दिखाई दिया। वैसे शिवराज अपने राज को बचाने के लिए खासे व्याकुल भी हैं और वो इसके लिए हर तरह यत्न कर भी रहे हैं। मप्र में बंद की गतिविधियों को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

वैसे इतिहास में अभी तक की सबसे बड़ी और निर्णायक चुनौती झेल रहे ब्राह्मणवाद की ऐसी गतिविधियां आने वाले समय में लगातार दिखाई देंगी। दरअसल, यह ब्राह्मणवाद के अस्तित्व की लड़ाई है। ब्राहमणवादी समझ रहे हैं कि उनका अस्तित्व अब खतरे में है और उनकी बेचैनी उनकी बढ़ती और लगातार विफल होती गतिविधियों में देखी जा सकती है। पहले 10 अप्रैल के भारत बंद के बाद अब यह दूसरी विफलता ब्राह्मणवाद की बौखलाहट को और बढ़ाने वाली है।