बिहार के लेनिन जगदेव बाबू, शोषितों के मार्गदर्शक, एक महान क्रान्तिकारी नेता

आईएनएन भारत डेस्क
बिहार के लेनिन के नाम से प्रसिद्ध हुए महान क्रान्तिकारी नेता जगदेव प्रसाद बाबू का जन्म 2 फरवरी 1922 को हुआ और शोषितों की आवाज उठाते हुए 5 सितम्बर 1974 को वे शहीद हो गए। उनके क्रान्तिकारी तेवरों के कारण जगदेव बाबू को बिहार लेनिन के नाम से जाना जाता है। जगदेव बाबू को बिहार लेनिन उपाधि हजारीबाग जिला में पेटरवार (तेनुघाट) में एक महती सभी में वहीं के लखन लाल महतो, मुखिया एवं किसान नेता ने अभिनन्दन करते हुए दी थी।

बिहार के लेनिन के रूप में प्रसिद्ध इस महान क्रान्तिकारी का जन्म – बोधगया के समीप कुर्था प्रखंड के कुराहरी गांव में 2 फरवरी 1922 को हुआ। बिहार में जाति व्यवस्था के अनुसार दांगी जाति में जन्मे जो कुशवाहा की उपजाति है। उनके के पिता का नाम प्रयाग नारायण और माता का नाम रसकली देवी था। पिता स्कूल में शिक्षक थे और माता गृहणी।

जगदेव प्रसाद बचपन से ही मेधावी छात्र थे। अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री लेने के बाद उनका रूझान पत्रकारिता की ओर हुआ। वे पत्र -पत्रिकाओं में लेखन का कार्य करने लगे। सामाजिक न्याय की आवाज उठाने वाले लेखों के कारण इन्हें काफी समस्या हुई। इन्ही दिनों वे सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए, उन्हें सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘जनता‘ में संपादन का कार्यभार सौपा गया। 1955 में हैदराबाद जाकर अंग्रेजी साप्ताहिक ‘सिटीजन‘ और हिंदी पत्रिका ‘उदय‘ के संपादन से जुड़े। अनेक धमकियों के बावजूद ये सामजिक न्याय और शोषितों के अधिकार हेतु जागरण के लिए अपनी लेखनी चलाते हुए प्रकाशक से मनमुटाव और अपने सिद्धांतो से समझौता न करने की प्रवृति के कारण उन्हें त्यागपत्र देकर वापस पटना आना पड़ा।

पटना आकर जगदेव प्रसाद समाजवादियों के साथ आन्दोलन में शामिल हो गए। 1957 में उन्हें पार्टी से विक्रमगंज लोकसभा का उम्मीदवार बनाया गया मगर वे चुनाव हार गए। 1962 में बिहार विधानसभा का चुनाव कुर्था से लड़े पर जीत नहीं मिली। वे 1967 में कुर्था विधानसभा से पहली बार चुनाव जीते। इसी साल उनके अथक प्रयासों से स्वतंत्र बिहार के इतिहास में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी और महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाया गया। पहली गैर-कांग्रेस सरकार का गठन हुआ। बाद में पार्टी की नीतियों तथा विचारधारा के मसले पर उनकी राम मनोहर लोहिया से अनबन हो गयी।
‘कमाए धोती वाला और खाए टोपी वाला‘ की स्थिति देखकर जगदेव प्रसाद ने संसोपा छोड़ दी। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, 1966 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का एकीकरण हुआ था। जगदेव प्रसाद ने 25 अगस्त 1967 को ‘शोषित दल‘ नाम से नई पार्टी बनाई। उस समय अपने भाषण में कहा था- ‘जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूं, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूं इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जाएंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जाएंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत आखिर में हमारी ही होगी।

7 अगस्त 1972 को शोषित दल और रामस्वरूप वर्मा जी की पार्टी ‘समाज दल‘ का एकीकरण हुआ और ‘शोषित समाज दल‘ नमक नई पार्टी का गठन किया गया। जगदेव बाबू ने पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में जगह-जगह तूफानी दौरा आरम्भ कर दिया। बिहार की राजनीति में एक ऐसे दौर की शुरुआत हुई जब जगदेव प्रसाद के क्रांतिकारी भाषण से कई तबकों के लोगों को परेशानी होने लगी।

5 सितम्बर 1974 को कुर्था में जनसभा के दौरान जगदेव बाबू की हत्या कर दी गई। उस दिन रैली में बीस हजार लोग जुटे थे। जगदेव बाबू ज्यों ही लोगों को संबोधित करने के लिए बाहर आए पुलिस प्रशासन के मौके पर मौजूद अधिकारी ने जगदेव बाबू को गोली मारने का आदेश दिया। समय अपराह्न साढ़े तीन बज रहे थे। 27 राउंड गोली फायरिंग की गई जिसमें एक गोली बारह वर्षीय दलित छात्र लक्ष्मण चैधरी को लगी और दूसरी गोली जगदेव बाबू के गर्दन की बेधती हुई निकल गई। जगदेव बाबू ने ‘जय शोषित, जय भारत’ कहकर अपने प्राण त्याग दिए। सत्याग्रहियों में भगदड़ मच गई। पुलिस ने धरना देने वालों पर लाठी चार्ज किया। उसी दिन बीबीसी लन्दन ने पौने आठ बजे संध्या के समाचार में घोषणा की, कि बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद की हत्या शांतिपूर्ण सत्याग्रह के दौरान कुर्था में पुलिस ने गोली मारकर कर दी।

अपने जीवन में जगदेव बाबू ने शोषित समाज की मुक्ति के लिए कईं क्रान्तिकारी नारे गढ़े जो उस समय बेहद लोकप्रिय हुए।

सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग ललकारा है।।

दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।।

गोरी गोरी हाथ कादो में, अगला साल के भादो में।।

दो बातें हैं मोटी-मोटी, हमें चाहिए इज्जत और रोटी।।