भाजपा से नेताओं का होता मोहभंग, आगामी चुनावों में मोदी की हार की आहट

आईएनएन भारत डेस्क
अभी तक भाजपा में यशवंत सिन्हा और शत्रुघन सिन्हा ही घोषित बागी थे परंतु जैसे जैसे तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो भाजपा के नेताओं और उसके सहयोगियों का भाजपा का साथ छोड़ने का सिलसिला तेज होता जा रहा है।

अभी हरियाणा के चर्चित ओबीसी नेता राजकुमार सैनी ने भाजपा का दामन छोड़कर अपनी पार्टी का गठन करने की घोषणा कर दी है तो वहीं राजस्थान के रातपूत नेता और भाजपा के एक जमाने के दिग्गज नेता रहे जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह और उनकी पत्नी के भाजपा का दामन छोडकर जाने और कांग्रेस में जाने की चर्चा जोरों पर हैं। भाजपा को लगातार झटके मिल रहे हैं परंतु गोदी मीड़िया लगातार इन खबरों को कम करके दिखा रहा है अथवा दिखा ही नही रहा है। असल, भाजपा से नेताओं का जाना और सहयोगियों का मोहभंग होना एक डूबते हुए जहाज की निशानी है।

जसवंत सिंह से वसुंधरा राजे की आपस में इस कदर ठनी हुई थी कि जसवंत सिंह भाजपा के खिलाफ बागी होकर पिछले लोकसभा चुनावों में मैदान में उतर गये थे। उनके पुत्र ने उस समय भी अपने पिता का साथ दिया और भाजपा से अलग होने के लिए समय का इंतजार किया था। अब मानवेन्द्र सिंह इस अलगाव की घोषणा और अपने अगले कदम के लिए एक बड़ी रैली की तैयारी में लगे हैं अैर माना जाता है कि इस रैली में वह भाजपा को अलविदा कहकर राहुल गांधी का हाथ थाम लेंगे।

वहीं हरियाणा के पिछड़ा नेता और उससे भी अधिक जाट समुदाय के विरोधी के रूप में पहचाने जाने वाले राजकुमार सैनी ने भी भाजपा को अलविदा कह दिया है। ध्यान रहे 2014 के आम चुनावों में सैनी कांग्रेस के नेता और प्रसिद्ध उद्योगपति नवीन जिंदल को हराकर लोकसभा में पहंुचे थे। परंतु उनके भाजपा में बने रहने से भाजपा को भी खासी दिक्कतो का सामना करना पड़ रहा था। माना जाता है कि वह भांप चुके थे कि अब उनके राजनीतिक भविष्य को मोदी का नाम सहारा नही दे पायेगा, इसीलिए उन्होंने हरियाणा में गैर जाट राजनीति की जमीन पर एक कद्दावर नेता बनने के लिए अलग दल बनाकर जाटों के खिलाफ खुले तौर पर मोर्चा खोलने का निर्णय लिया। हो सकता है कि सैनी इससे अपने आपको गैर जाट

राजनीति का बड़ा चेहरा बना पायें परंतु जिस प्रकार भाजपा में रहते उनके खुले जाट विरोध पर भाजपा ने चुप्पी साधे रखी है उससे भाजपा की हालत ऐसी हो चुकी है कि उसे ना माया मिली ना राम। जाट सैनी के कड़वे और जहरीले बोलों की वजह से उससे नाराज हो चुके हैं और गैर जाट आरक्षण दंगे की मार अभी तक और कभी तक भी भूलने वाले नही हैं। उस पर दंगे में शामिल लोगों पर भाजपा ने कोई कार्रवाई तो दूर बल्कि उन्हें बचाने की कोशिशे ही की हैं। बहरहाल, यह तय माना जा रहा है कि हरियणा पूरी तरह से भाजपा के हाथ से हमेशा के लिए जा चुका है। इसके अलावा सैनी अपनी पार्टी बनाने के क्रम में जिस प्रकार भाजपा और मोदी की आलोचना करने से बचते रहे हैं उससे एक संदेश राजनीतिक हलकों में और लोगों में यही भी जा रहा है कि यह संघ और भाजपा की ही चाल है कि सैनी ने अपनी पार्टी बना ली और चुनावों के बाद फिर से भाजपा के साथ जाने की संभावनाओं को बचाये रखा है।

इसके अलावा बिहार में उपेन्द्र कुशवाह का राजद के साथ महागठबंधन में जाना तय माना जा रहा है। कुशवाह बार बार एनडीए से अलग होने और दूसरे विकल्पों की बात करते रहे है परंतु उसके बावजूद भी भाजपा अध्यक्ष अथवा किसी अन्य ने उनसे अभी तक सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत नही की है। माना जाता है कि यह सब नीतीश के दबाव के कारण हो रहा है और नीतीश भी चाहते हैं कि कुशवाह एनडीए से अलग हो जायें। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि राजद से कुशवाह की बातचीत निर्णायक दौर में है और सीटों का मामला भी लगभग तय हो चुका है। अभी तक राजद कुशवाह को चार सीटें देने पर राजी है परंतु रालोसपा अभी सीटों की संख्या कुछ और बढ़वाना चाहती है। एनडीए में भी माना जा रहा था कुशवाह की मांग सात सीटों की थी। इसीलिए मामला और सात और चार के बीच में अटका है। वैसे सूत्रों के अनुसार बात लगभग बन ही चुकी है। वहीं पासवान की भी ऐन मौके पर पाला बदलकर महागठबंधन में आने की चर्चा जोरों पर है। राजद के नेता पासवान के उनके खेमे में आने को लेकर काफी आश्वस्त हैं।

कमोबेश यही हाल यूपी में राजभर नेता ओमप्रकाश राजभर का भी है। उन्होंने हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले में अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में बोलते हुए यहां तक भी कह दिया कि उनका भाजपा से कोई लेना देना नही है। असल, में उनकी कोशिश अधिक से अधिक अपनी जाति के लोगों और अतिपिछड़ा समाज को साथ लाकर अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की और सत्ता में आने वाले आगामी गठबंधन से मोलभाव करने की है। ध्यान रहे कि राजभर लगातार यूपी की योगी सरकार और उसकी नौकरशाही पर हमले करते रहे हैं और इसी बहाने वह योगी और उनकी सरकार को निशाने पर लेते रहे हैं। यूपी में ब्राह्मणवादी सत्ता और नौकरशाही से त्रस्त केवल राजभर की यह हालत नही है बल्कि भाजपा की दलित नेता बहराईच से सांसद सावित्री बाई फूले खुले तौर बगावती तेवर दिखाती रही हैं और बसपा के संस्थापक काशीराम की खुलेआम तारीफ करती रही है। उन्होंने खुले तौर पर कईं बार दलितों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर अपनी पार्टी को ही कठघरे खड़ा कर दिया है। वैसे अभी यह शुरूआत भर है और भाजपा को छोड़ रहे नेताओं को देखकर लगता है कि चुनावों की घोषणा के बाद इस डूबते जहाज में कूदकर भागने वालों की लंबी कतार लग जायेगी और कोईं भी जुमलेबाजी उन्हें रोक नही पायेगी।