संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों में सुनाई दे रही है मोदी की हार की आहट

आरबीआई से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मौजूदा दौर में भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं ने जो रूख दिखाया है उससे मौजूदा मोदी सरकार की खासी किरकिरी हुई है। इन निर्णयों को देखकर कहा जा सकता है कि यह संस्थान अब समझ चुके हैं कि मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और इस समय खुद को मोदी सरकार के साथ खड़ा दिखाना किसी भी मायने में ठीक नही है। इस समय जब मोदी सरकार राफेल को लेकर बुरी तरह फंसी हुई दिखाई पड़ रही थी ऐसे में उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी का आना अथवा नोटबंदी के आंकडों का आना मोदी सरकार की लगातार कम होती लोकप्रियता को पूरी तरह ध्वस्त कर देने वाला है।

जिस प्रकार से आरबीआई ने नोटबंदी से जुड़े हुए आंकड़ों को पेश किया है और उससे सरकार की फजीहत हो रही है उसकी घोषणा के समय को देखते हुए कोई भी आश्चर्य कर सकता है। यह आंकड़ें आरबीआई ने मोदी सरकार के सबसे अधिक संकट के समय सामने लाकर मौजूदा सरकार की मुश्किले ना केवल बढ़ा दी हैं बल्कि ताबूत में आखिरी कील ठोकने जैसा काम किया है। यदि आरबीआई कुछ समय तक अथवा राफेल आदि के मामलों को ठण्ड़ा होने तक इन आंकड़ों को जारी नही करता तो संभवत मोदी सरकार के लिए अधिक आसानी होती। परंतु ठीक इसी समय पर जबकि मोदी सरकार मोब लिंचिंग से लेकर भगवा आतंक के सनातनी मोड्यूल के पकडने जाने और पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक से बैकफुट पर थी तो इन आंकड़ों का जारी किये जाना जलती आग में घी उडेल देने जैसा ही है। नोटबंदी पर आरबीआई की रिपोर्ट आने के बाद से ही मोदी और भाजपा की फजीहत हो रही है। विपक्ष तो आक्रामक था ही, अब शिवसेना जैसे उसके पुराने सहयोगी भी सीधे मोदी से कुछ सवाल पूछे रहे हैं।

संसद के सत्र में पूरे समय राफेल का मुद्दा छाया रहा और उसके बाद भी कांग्रेस ने कई सवाल इस पर उठाये। अब आम जनता के मन में भी यह सवाल उठने लगे हैं कि देश की संसद के सामने सरकार राफेल डील के तथ्य राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर नही रख रही है परंतु एक प्राइवेट कंपनी रिलायंस के मालिक एक अंबानी को इसके बारे में जानकारी हो सकती है। अब देश की संसद से ज्यादा देश की सुरक्षा के मामले में अंबानी अधिक विश्वसनीय हो गया है। लोग यह भी समझ रहे हैं कि यदि इस डील में कुछ भी गलत नही हुआ है तो सरकार संसद के सामने इस डील को रख क्यों नही देती है। इसके अलावा सरकार पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर भी बुरी तरह घिरी हुई थी कि तभी यह नोटबंदी के आंकड़ों का हथियार विपक्ष के हाथ में बैठे बैठाये आ गया।

पिछले दिनों जज लोया की मौत के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट बुरी तरह से विवादों के घेरे में आ गया था। जिसको लेकर कईं विधि विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट विशेषकर मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाये थे कि वह मोदी सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों ने मीड़िया के सामने आकर और प्रेस से बात करके खलबली मचा दी थी। जिससे मोदी सरकार द्वारा न्यायपालिका सहित सभी लोकतांत्रिक सस्ंथाओं को कमजोर करने और सरकार के इशारे पर चलाये जाने के आरोप लगे थे। परंतु अभी और इस समय जिस प्रकार की फैसले और टिप्पणिया सुप्रीम कोर्ट और आरबीआई ने लिये हैं उससे लगता है कि यह संस्थाएं समझ रही हैं कि अब मोदी सरकार के जाने का समय हो गया है और मोदी सरकार के पक्ष में खुद को खड़े दिखाना इस समय ठीक नही है।

ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट ने पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि असहमति लोकतंत्र में प्रेशर कुकर में सेफ्टी वाल्व की तरह है और यदि असहमति को बंद कर दिया जायेगा तो प्रेशर कुकर फट जायेगा। इसका अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायपालिका असहमति पर रोक की मौजूदा सरकार की कोशिशों को समझ रही है और ना केवल समझ रही है बल्कि उस पर सख्त टिप्पणी भी बगैर किसी दबाव के कर रही है। यह दर्शाता है कि लोकतंत्र की यह संस्थाएं अब फिर से अपनी आजादी का अर्थ समझ रही हैं और आने वाले कल के नतीजों को भांप रही है।

अब आरबीआई ने नोटबंदी के समय बंद किए गए 500 और 1000 रुपए के नोटों का 99.3 प्रतिशत बैंकों के पास वापस आ जाने के जो आंकडें सार्वजनिक किये हैं वह भी सरकार की फजीहत बढ़ाने वाले हैं। इन आंकड़ों से सीधा संदेश जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अज्ञात कारणों से डिमॉनिटाइजेशन के जरिए देश को वित्तीय अराजकता की ओर धकेल दिया था। अब विपक्ष को मौका मिल गया है कि वह इन अज्ञात कारणों को जनता के सामने लाये जो विपक्ष कर भी रहा है। गुजरात कोआॅपरेटिव बैंकों में भाजपा मंत्रियों और नेताओं द्वारा नोटबंदी के शुरू के पांच दिनों में 3100 करोड़ रूपये से भी अधिक पुराने नोटों को बदलवाने के खेल पर चर्चा शुरू हो गयी है। ध्यान रहे इन 3100 करोड़ मूल्य के पुराने नोटों के बदले जाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सहकारी बैंकों की नोट बदली पर रोक लगा दी थी। जिस पर विपक्ष यही कह रहा है कि पांच दिनों में ही भाजपा के लोगों ने अपना काम कर लिया था।

विपक्ष साफ साफ मोदी पर निशाना साधते हुए कह रहा है कि नोटबंदी आजादी के बाद सबसे बड़ा घोटाला था और मोदी ने नोटबंदी की घोषणा अपने लोगों के कालेधन को सफेद करने का अवसर देने के लिए ही की थी।

बहरहाल, यह तय है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी और आरबीआई की घोषणा ने यह तय कर दिया है कि यह संस्थान आने वाले कल के चुनावों के नतीजों को समझ रहे हैं और उसी के अनुरूप काम करने का निर्णय ले रहे हैं। अब देखते हैं कि चुनाव आयोग इस माहौल में ईवीएम पर क्या निर्णय लेता है। यह तो मुश्किल है कि चुनाव पेपर बैलेट से हों क्योंकि चुनाव आयोग ऐसा करने से साफ इंकार कर सकता है। परंतु यदि आयोग 25 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गिनती को अनिवार्य करने पर भी निर्णय लेता है तो यह निष्पक्ष और साफ चुनाव करवाने की दिशा में बडा कदम होगा और जनता का विश्वास चुनाव आयोग में बहाल होगा। वैसे ऐसा होना कोई असंभव भी नही है क्योंकि आने वाले चुनाव के नतीजों को पढ़ने का सामथ्र्य सभी में है और चाहे आरबीआई हो अथवा चुनाव आयोग।