अंबानी की “सेवा” के लिए “प्रधानसेवक” ने बदल डाले सारे नियम-कानून

आईएनएन भारत डेस्क
इंडियन एक्सप्रेस में पिछले दो दिनों से ऋतिका चोपड़ा की रिपोर्ट आ रही है कि किस तरह अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर नियमों में बदलाव किया गया। ऋतिका ने आरटीआई के जरिए मानव संसाधन मंत्रालय और पीएमओ के बीच पत्राचार हासिल कर यह रिपोर्ट तैयार की है।

मानव संसाधन मंत्रालय के जो स्थापित नियम हैं उनके अनुसार अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित संस्थान का टैग कभी भी नहीं मिल पाता। अब जब अंबानी को खुश करने है और अभी तक दुनिया में वजूद में ही नही आये अंबानी के शिक्षण संस्थान को प्रतिष्ठित संस्थान का टैग लगाना है तो प्रधानसेवक उर्फ चैकीदार को ही अंबानी की चााकरी बरनी पड़ेगी। चाकरी भी इस हद दर्जे की कि वित्त मंत्रालय की चेतावनी के बाद भी अंबानी को खुश करने के लिए नये नियम बनाये गये।

वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी थी कि जिस संस्थान का कहीं कोई वजूद नहीं है उसे इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का लेबल देना तर्कों के खिलाफ है अर्थात अतार्किक है। इससे भारत में शिक्षा प्रणाली को ठेस पहुंचेगी। इसके बाद भी अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को मानव संसाधन मंत्रालय की सूची में शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।

वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग यानी डिपार्टमेंट ऑफ एक्सपेंडिचर ने मानव संसाधन मंत्रालय को लिखा था कि इस तरह से एक ऐसे संस्थान को आगे करना जिसकी अभी स्थापना तक नहीं हुई है, उन संस्थानों की तुलना में उसके ब्रांड वैल्यू को बढ़ाना होगा जिन्होंने अपने संस्थान की स्थापना कर ली है। इससे उनका उत्साह कम होगा। जाहिर है वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग साफ मानना था कि इससे प्रतिष्ठित और स्थापित शिक्षण संस्थानन हतोत्साहित होंगे।

केवल किसी को खुश करने के लिए इस प्रकार से किसी ऐसे संस्थान को यह दर्जा देना ना केवल भविष्य में एक गलत पंरपरा की शुरूआत है बल्कि शिक्षा प्रणाली को भारी ननुकसान पहुुंचाने वाला भी है। केवल किसी की मंशा के आधार पर कि भविष्य में कुछ ऐसा करेंगे, किसी संस्थान को इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा देना तर्कों के खिलाफ है। इसलिए जो नए नियम बनाए गए हैं उनकी समीक्षा की जानी चाहिए। पंरतु जिनकी पूरी राजनीति और पूरा राजनीतिक जीवन ही कुतर्को पर टिका और कुतर्कों से संचालित होता हो उनके लिए तर्क क्या और कुतर्क क्या। उन्हें केवल मालिकों की चाकरी से मतलब।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार वित्त मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय की राय के खिलाफ जाकर पीएमओ से अंबानी के जियो संस्थान को दर्जा दिलवाने सिफारिश की और उसके लिए प्रतिबद्धता और बेहतर मंशा को ही प्रावधान बनाने के लिए विवश किया। यह खबर दिखलाती है कि प्रधानसेवक कार्यालय अंबानी के लिए कितनी दिलचस्पी ले रहा था। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्थापित नियमों और अनुभव का हवाला देकर प्रधानसेवक के कार्यालय को लिखा परंतु प्रधानसेवक के कार्यालय ने 13 जून को मंत्रालय को लिखे अपने पत्र में स्थापित नियमों और प्रतिबद्धता की जगह केवल अच्छी मंशा के नियम की आवश्यकता पर ही जोर दिया।

इसके बाद एक बार फिर से मानव संसाधन मंत्रालय ने प्रतिवाद करते हुए प्रधानसेवक कार्यालय को 30 जून 2018 को पत्र लिखा। परंतु इस बार पीएमओ ने 2 जुलाई के अपने जवाब में फिर से प्रतिष्ठित नामों की मंशा और उद्देश्य के लिए जरूरी स्थितियों का हवाला देकर नियमों के विपरीत अपनी राय दी। पूरा देश गवाह है कि किस प्रकार शिक्षा प्रणाली के साथ एक ऐतिहासिक मजाक प्रधानसेवक के सेवा भाव के कारण हुआ और अंत में प्रधानसेवक कार्यालय की कृपा से और चैकीदार की मंशा के अनुसार अंबानी के शिक्षा संस्थान को बगैर वजूद में आये ही इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस अर्थात प्रतिष्ठित संस्थान का तमगा मिल गया। देश ने इससे मजबूत प्रधानसेवक नही देखा होगा जो अंबानी की सेवा के अपने जुनून में सारे नियम कायदे ही बदलवा सकता है।