यह अघोषित आपातकाल की घोषणा की कार्रवाई है

भगवा सरकार का अर्बन नक्सल विरोध अभियान शुरू हो गया है। समाज में ऐसे लोग जिनकी आवाज समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करती है और कारपोरेट पूंजी की खुली लूट को वैध करने की सरकार की तथाकथित विकास की अवधारणा का विरोध करती हैं, उन आवाजों को खामोश करने अथवा कैद करने के लिए अर्बन नक्सल की नई अवधारणा को गढ़ा गया है। भीमा कोरेगांव की हिंसा के नाम पर हिंसा का शिकार लोगों के हिमायती बुद्धिजीवियों को हिरासत में लेना और उन्हें अर्बन नक्सल के रूप में पेश करना ही भगवा सरकार का मौजूदा अर्बन नक्सल अभियान है।

28 अगस्त को सुबह से ही देश के जाने माने बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर पुलिस की दबिश और गिरफ्तारियों ने मौजूदा मोदी सरकार का एजेंडा साफ कर दिया है। वह जो सबसे अधिक दमन का शिकार हैं और वह जिसके संसाधनों की लूट कारपोरेट पूंजी का प्रमुख एजेंडा है और वह जो इस दौर में प्रतिरोध की सबसे मुखर आवाज हैं। उन्हें या तो खामोश होे जाना चाहिए अन्यथा उन्हें कैद में रहना होगा।

मौजूदा सरकार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए सुधा भारद्वाज, गौतम नौवलखा, आनन्द अरूण फरेरा, वर्नोन गोंजाल्विस, वरवर राव को गिरफ्तार किया गया है। आनन्द तेलतुमडे, स्टैन स्वामी के स्कूल पर दबिश की गई है। यह सभी ऐसे नाम हैं जिनकी आवाज का समाज में असर है जिनका समाज के सबसे वंचित तबकों के लिए किया गया प्रभावी काम है। यह सभी बेजुबान की आवाज और बेसहारा लोगों का सहारा हैं। मानवाधिकार के सबसे तेज सुनाई देने वाले स्वर हैं। ऐसे लोगों को निशाने बनाने का संदेश सीधा है कि अब सरकारी दमन तंत्र का हमला दूर दराज के जंगलों गांवों से निकलकर शहरी मध्य वर्ग को निशाने बनाने निकल आया है। भारतीय फासीवाद मुखौटा उतारकर अपने असली रंग में सामने आ गया है। इस फासीवादी हमले की विभिन्न बुद्धिजीवियों और लेखकों ने आलोचना की है। प्रसिद्ध लेखिका अरूंधती राय ने इन वामपंथी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर साफ कहा है कि अब इमरजेंसी की घोषणा होने ही वाली है। वहीं इतिहासकार राम चन्द्र गुहा ने सुधा भारद्वाज और आनन्द तेलतुमडे की गिरफ्तारी पर आश्चर्य जाहिर करते हुए कहा कि सुधा भारद्वाज किसी भी किस्म की हिंसा से उतनी ही दूर हैं जितना कि अमित शाह पास हैं। इसके अलावा आनन्द तेलतुमड़े के घर पर दबिश को लेकर उन्होंने कहा कि आनन्द देश में अंबेडकर पर मौलिक काम करने वालों में सबसे बड़ा नाम हैं। वह देश के सबसे बड़े दलित बुद्धिजीवी हैं।

इसके अलावा प्रकाश अंबेडकर से लेकर लगभग सभी राजनीतिक दलों और सभी बुद्धिजीवियों ने सरकार की इस कार्रवाई की कड़ी निदा की है। सभी ने एक सुर में उस भगवा राजनीति की निदा की जिसने भीमा कोरेगांव के असली गुनाहगारों संभाजी भिण्डे जैसे लोगों को आजाद छोड़ा हुआ है और इस हिंसा के शिकार दलित समाज के लागों और उनके लिए आवाज उठाने वालो को निशाने पर लिया जा रहा है। यही ब्राह्मणवादी भगवा आतंकवाद का असली चेहरा है। जिसे भीमा कोरेगांव की 200वीं जयंती ने एक बार भी सबके सामने लाकर रख दिया है।