कुशवाह ने फिर दिया अलग होने का इशारा, 2019 चुनाव से पहले एनडीए में बिखराव के संकेत

आईएनएन भारत डेस्क
रालोसपा के मुखिया और केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह ने फिर से एकबार एनडीए को झटका देते हुए भाजपा नीत एनडीए के विरोधी महागठबंधन के करीब जाने का संकेत देकर आने वाले दिनों की अपनी राजनीति का इशारा दे दिया है। कुशवाह ने इशारों इशारों में साफ किया कि यदुवंशियों के दूध और कुशवंशियों के चावल के मिलने से अच्छी खीर बनती है। पटना में बी पी मंडल जन्म शताब्दी समारोह में बोलते हुए उपेन्द्र कुशवाह ने इस राजनीतिक खीर के बारे में आगे स्पष्ट करते हुए और इसे और अधिक स्वादिष्ट बनाने का सूत्र बताया कि इसमें यदि अति पिछड़ों, दबे कुचलों का पंचमेवा मिल जाये तो खीर और स्वाद बन जाती है। इस राजनीतिक खीर के बारे पूरी तर स्पष्ट करते हुए कुशवाह ने कहा कि यही सामाजिक न्याय की सही परिभाषा है।

दरअसल, रालोसपा के मुखिया की बिहार में मौजूदा रणनीति विभिन्न अति पिछड़ो और दलित जातियों को साथ लेकर आने और नये सामाजिक गठजोड़ बनाने की है। इसी सिलसिले में पिछले 12 अगस्त को बाढ़, मोकामा के आसपास के कईं जिलों के सैंकड़ों धानुक नौजवानों को उनकी पार्टी में शामिल कराया गया। इसके अलावा 1 सितंबर से 29 सितंबर तक उपेन्द्र कुशवाह की पार्टी पूरे बिहार में दलित पिछड़े को बड़ी संख्या में साथ लाने की मुहिम शुरू करने वाली है।

बिहार रालोसपा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जितेन्द्र नाथ ने बताया कि रालोसपा 1 सितंबर से 29 सितंबर तक बिहार भर में दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक अधिकार जिला सम्मेलनों का आयोजन करेगी। इन सम्मेलनों का मकसद बिहार की बहुजन आबादी को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना और नीतीश कुमार की दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक राजनीति की असलियत बताना होगा। असल, में ऐसा जान पड़ता है कि कुशवाह की और उनकी पार्टी की पूरी राजनीति नीतीश कुमार के सामाजिक आधार को छीनने और उसे अपनी तरफ लाने की है। जिस प्रकार से पिछले दिनों में नीतीश कुमार की प्रसिद्धी भूमिहार संरक्षक की बनी है उसे देखते हुए कुशवाह की राजनीति कुछ हद तक सफल होती भी दिखती है। अब वही कुशवाह यदि एनडीए से अलग होते हैं तो जाहिर है कि भाजपा नीत एनडीए को इससे दोहरा नुकसान होगा। पहला एनडीए टूटने का और दूसरा नीतीश कुमार के आधार कमजोर होने का। कुशवाह अपनी पार्टी में लागातार कुशवाह, कुर्मी और धानुक नेतृत्व को बढ़ावा देकर नीतीश को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

इसके अलावा अकाली दल ने भी पिछले दिनों हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करके अकालियों ने भाजपा को करारा झटका दिया है। यह कोई पहली बार नही हो रहा है कि भाजपा को उसके सहयोगी छोड़ रहे हैं। इसके पहले उसकी सबसे पुरानी सहयोगी शिव सेना ने भी अकेले जाने और चुनाव लड़ने की घोषणा की थी जिसे वह आगे भी कई बार दोहरा चुकी है। इसके पहले आंध्र में उसकी सहयोगी टीडीपी उसे छोड़ चुकी है। बिहार में भी उसके पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सहयोगी माझी भी भाजपा का दामन पहले ही छोड़ चुके थे। इस प्रकार भाजपा को उसके प्रमुख सहयोगी लगातार छोड़ रहे हैं। मीड़िया में जगत में चर्चा है कि पिछले दिनों यूपी के दो उप चुनाव गोरखपुर और फूलपुर हारने के बाद पत्रकारों के साथ एक आनौपचारिक बातचीत में पासवान परिवार के एक सदस्य ने साफ किया था कि अभी तो वह एनडीए में हैं। परंतु जब उनसे एक पत्रकार ने सवाल किया कि आगे भी क्या वह एनडीए में ही रहेंगे तो उन्होंने हसंते हुए कहा कि चार महीने के हालात की क्या गारंटी है। तभी देखा जायेगा। पासवान परिवार के उक्त सदस्य का कथन साफ जाहिर करता है कि बदलते हालात में उनके तेवर और क्या होंगे।

बहरहाल, बदलते हुए हालात और भाजपा को विभिन्न राज्यों में उनके प्रमुख दलों का छोड़कर भागना इस बात का साफ संकेत हैं कि एनडीए के सहयोगी दलों में घुटन है और जैसे ही महागठबंधन एक नये विकल्प की तरह उभर रहा है वह एनडीए में टूट के लिए दबाव बना रहा है। इस दबाव का असर दिखने भी लगा है। हाल ही तक उपेन्द्र कुशवाह की पार्टी अधिक सीटों के लिए विशेषकर नीतीश कुमार से अधिक सीट के लिए दबाव बना रही थी और वह राजद से किसी भी प्रकार के जुड़ाव को लेकर सतर्क थी। उसकी कोशिश थी कि वह नीतीश और लालू यादव से समान दूरी बनाकर दिखाये परंतु बीपी मंडल की जन्मशताब्दी के आयोजन में कुशवाह ने आगे आने वाले सामाजिक और राजनीतिक समीकरण और अपने भविष्य की रणनीति को साफ कर दिया है और यह भी दिखा दिया है कि बिहार और देश की आने वाली राजनीति क्या मोड लेगी और इससे भी बड़ा यह संदेश उनके भाषण ने दिया है कि आने वाला समय एनडीए के लिये खतरे और टूट का संदेश लेकर आने वाला है। एनडीए में जो टूट 2018 में टीडीपी और माझी के जाने से शुरू हुई है वह आगे जारी रहेगी और 2019 तक कईं अहम सहयोगी भाजपा और एनडीए को छोड़कर जाने वाले हैं।