केरल की आपदा आने वाले संकट की दस्तक है

महेश राठी
भारत पिछले कुछ सालों से प्रकृतिक आपदओं का कहर झेल रहा है। 2013 में उत्तराखंड में पूरे देश ऐसी ही भयावह त्रासदी का नजारा देखा और उत्तराखण्ड़ में तबाही हुई उससे हम सभी वाकिफ है, इस साल केरल में आई बाढ़ भी एक ऐसी ही त्रासदी है, यह भी उतनी ही विकराल और उतनी ही भयावह त्रासदी है। हमारे मौसम वैज्ञानिक हमेशा की तरह इस वर्ष भी निःशब्द हैं और इस त्रासदी की भविष्यवाणी करने में विफल रहे हैं। वैसे प्रकृति के सामने हम सभी निसहाय हैं, लेकिन दूसरे देशों की तुलना में हमारा मौसम विज्ञान तंत्र छोटे-मोटी भविष्यवाणी करने में भी विफल रहता है नाकाम दिखाई देता है।

जिस तरह से दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन का असर देखने को मिल रहा है उसे देखते हुए हमें भविष्य के लिए तैयार रहने की जरुरत है। पिछले वर्ष अगस्त में केरल में औसत से 29 फीसदी कम बारिश हुई थी जिसे देखते हुए प्रशासन ने जल संरक्षण के कई कदम उठाने शुरु कर दिए लेकिन इस वर्ष सामान्य बारिश के अनुमान के बावजूद स्थिति बिल्कुल उलट गई और राज्य में सामान्य से 19 प्रतिशत अधिक वर्षा हो गई। केरल के 14 में से 6 जिलों में सामान्य से 29-59 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई है। देश के अन्य इलाकों में भी मौसम के अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं, जहां कभी अच्छी वर्षा हुआ करती थी वहां सूखे के हालात हैं और जो इलाके सूखे के लिए तैयार रहते थे उन्हे बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है।

केरल ने पिछले नौ दशक में इतनी मूसलाधार वर्षा नहीं देखी, हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की कई सालों बाद पेरियार नदी पर बने इडुक्की बांध के पांचो गेट खोलने पड़े साथ ही 22 अन्य बांधो के भी गेट भी एक साथ खोले गए। सरकार पेरियार नदी के किनारे बसे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाती उससे पहले ही बाढ़ के पानी ने इन इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। अगर प्रशासन और मौसम वैज्ञानिकों को अतिवृष्टि का थोड़ा भी अनुमान होता तो कम से कम कुछ सुरक्षा इंतेजाम किए जा सकते थे।

यह तय है कि यह असामान्य हालात जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है और इस तबाही को हम इस मायने में मानव निर्मित तबाही भी कह सकते हैं। किस तरह जलवायु परिवर्तन का असर किसानों के खेती करने के तरीकों पर पड़ रहा है। पंजाब का किसान जो कभी कपास उगाया करता था, ज्यादा बारिश होने की वजह से अब धान की खेती कर रहा है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में सोयाबीन की जगह धान की खेती करने को किसान मजबूर है। यह सब जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है। ऐसे नही है कि जलवायु परिवर्तन के इन प्रभावों को हम समझ नही सकते और समय रहते इनसे निपट नही सकते हैं। परंतु तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में हम इतने बौरा गये हैं कि इस पूरे बदलाव को लगातार नजर अंदाज करते जाते हैे। इस जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है कि कुछ सालों पहले लेह लद्दाख ने तबाही झेली थी। वहां जो खेती का पेट्रन बदला था और मौसम में जो बदलाव आया था वह पहले से ही इस तबाही की दस्तक दे रहा था। जीरो से 30-35 डिग्री सेल्सियस नीचे के ठण्डे मौसम वाले ठण्डे रेगिस्तान में जब गर्मी के मौसम में नौजवान नवयुवतियां आधी बाजू की टी-शर्टस पहनकर घूमने लगें तो समझ लेना चाहिए की यह आने वाली तबाही की दस्तक है। ठीक इसी प्रकार हम उत्तराखण्ड़ में मौसम के बदलाव को पढ़ सकते हैें। वहां सर्दी के मौसम के लगातार घटते जाने और सर्दी कम होने और बर्फबारी कम होने से लगातार बदलाव हो रहे हैं। चमोली की फूलों की घाटी जो सर्दी में बर्फ की चादर से ढ़क जाती थी और जून जुलाई की बारिश के बाद वहां बर्फ खत्म होने और बारिश के बाद फूलों के खिलने का मौसम आता था। अब फूलों की घाटी पूरी तरह से बदल चुकी है। फूलों के खिलने का समय और मौसम बदल चुका है। अब अप्रैल मई में फूलों के खिलने का मौसम शुरू हो जाता है। कईं लोग इससे खुश हो सकते हैं परंतु यह जलवायु परिवर्तन के निशान और आने वाली तबाही की साफ दिखाई देने वाली दस्तक हैं। यह आश्चर्यजनक परंतु सत्य है कि फूलों का खिलना खुशी का नही बल्कि आने वाली तबाही का पता देता है। मौजूदा मोदी सरकार जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को लेकर कितनी गंभीर है उसे विकास के नाम पर उसके द्वारा परियोजनाओं को दिये जा रहे पर्यावरण अनापति में साफ पढ़ा जा सकता है। मोदी और उनकी सरकार की पर्यावरण की चिंता कुछ धर्म ग्रंथोें के श्लोकों के उद्धरण और जुमलेबाजी से आगे कुछ भी नही है।

ऐसा भी नही है कि केवल भारत ही इस संकट का सामना कर रहा है यह पूरी दुनिया की समस्या है। दुनिया के अन्य देशों में भी मौसम में अकल्पनीय बदलाव देखा जा रहा है। यूरोपीय देश भीषण गर्मी झेल रहे हैं, आस्ट्रेलिया सूखे की चपेट में है, जापान में बाढ़ का संकट है तो वहीं अमेरिका में गरमी से जंगलों में आग बड़ी समस्या बनी हुई है। ऐसा नहीं है की यह सब अचानक हो रहा है, लेकिन हम पर्यावरण चक्र में बदलाव को नजरअंदाज नहीं कर सकते। ग्लोबल वार्मिंग से लगातार बढ़ रहा समुद्र का जल स्तर एक बड़ी समस्या है। हाल ही की एक रिपोर्ट बताती है कि जकार्ता जैसे द्वीपीय शहर किस तरह से पानी में डूबने की तरफ बढ़ रहे हैं और मालद्वीव जैसे देश का पूरा अस्तित्व ही दांव पर लगा हुआ है और मालद्वीव ने किसी दूसरे महाद्वीप और किसी दूसरे देश में बसने के लिए अभी से खोज शुरू कर दी है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि जिस तरह से तापमान में वृद्धि हो रही है उसके नतीजे 2050 तक दिखने लगेंगे।

हम प्रकृति के सामने बहुत छोटे हैं, लेकिन इसे सहेजने का काम हमारा है। मौसम में हो रहे बदलाव के साथ हमें बदलना होगा। हमें कई ऐसे उपाय करने होंगे जिससे प्राकृतिक आपदाओं में होने वाले जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके और उससे बचा जा सके। ऐसे इंतजाम करने होंगे जो प्रकृति के खौफ उसकी नाराजगी से बचा जा सके। यह देखा गया है कि बाढ़ के कारण सबसे ज्यादा नुकसान लैंडस्लाईड से होता है, ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाकर मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। निर्माण कार्य को प्रकृति अनुकूल बनाना होगा। उत्तराखंड में हमने देखा था किस तरह नदी के बेसिन में निर्माण कार्य कर दिया गया था। कार्बन उत्सर्जन में कमी लानी होगी। ज्यादा से ज्यादा अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा। छोटे शहर जिन्हे हम स्मार्ट सिटी बनाने जा रहे हैं वहां जल निकासी और निर्माण कार्य के लिए दिशा निर्देश जारी करने होंगे ताकि जो गलती महानगरों में हम कर चुके हैं वे दोहराई न जा सके। बाकी जिम्मेदारी हमारी है कि हम जितना खयाल खुद का रखते हैं उतना ही प्रकृति का भी ख्याल रखें।

केरल भी इसी मानव निर्मित विकास की चपेट में आता दिखाई पड़ रहा है। केरल और वहां के लोगों को प्रकृति के रख रखाव और रक्षा के मामले में तुलनात्मक रूप से अधिक सजग माना जाता है परंतु वहां भी विकास के नाम पर होते बड़े बड़े निर्माण और पहाड़ों और पेड़ों की कटाई नये तरह के संकट का कारण बन रही है। जिसका नतीजा है कि केरल में मूसलाधार बारिश और बाढ़ तबाही लेकर आई, 26 साल बाद एशिया के सबसे बड़े बांध इड्डुकी के पांचो गेट खोल दिए गए हैं। लोगों को पेरियार नदी के किनारे न जाने की चेतावनी जारी कर दी गई है। राज्य की लगभग सभी नदियां उफान पर हैं। राज्य में विभिन्न बांधों के 22 गेट खोले गये हैं। पेरियार नदी के आसपास रहने वाले सभी लोगो को सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए कहा गया हैं। इस बाढ़ में 350 से ज्यादा लोगों की जान चली गई तो वहीं 2 लाख से अधिक लोग बेघर हो गए हैं। सेना ने राहत बचाव के काम में जुटी हुई है।

अभी तक इस मूसलाधार बारिश और बाढ़ से भारी तबाही हुई है। जहां हमें इस तबाही से बचाव के फौरी इंतजाम करने होंगे तो वहीं एक साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन से बचने के उपायों और पर्यावरणीय बर्बादी को रोकने और अपने इको सिस्टम को सुरक्षित रखने के उपायों पर व्यापक रणनीति बनाकर स्थायी इंतजाम करने होंगे। ध्यान रहे हमारा इको सिस्टम बेहद नाजुक सिस्टम है और उसको नुकसान होने का अर्थ है पूरी मानव जाति के लिए खतरा और इस सुंदर नीले ग्रह की तबाही। यदि हमें इस खुबसूरत नीले ग्रह को बचाना है तो जलवायु परिवर्तन पर केवल बात करनी होगी बल्कि उसे अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन का प्रमुख एजेंडा बनाना होगा।