अटल बिहारी वाजपेयी की मौत ने उजागर किया मोदी के हिंसक ‘राजधर्म‘ का चेहरा

देश में भीड़ हिंसा के फासीवादी रूझान की जन्मस्थली को वैसे तो देश के सभी जागरूक लोग जानते और पहचाानते है, परंतु पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की मौत ने इस हिंसक भीड़ के चहरे की पहचान और उसका पता साफ कर दिया है। सभी जानते हैं कि यह हिंसक भीड़ ब्राहमणवादी संघ की कार्ययोजना का हिस्सा और झूठ और अफवाहों के संघी कारखाने का उत्पाद है परंतु अभी तक भाजपा-संघ के तमाम मुखौटे नेता इससे सीधे संघी और भाजपाई जुड़ाव को खारिज करते रहे हैं। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की मौत के बाद देश में हुई कुछ घटनाओं ने साफ कर दिया है कि इन घटनाओं के पीछे केवल और केवल संघ ही है।

अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे भगवा वेशधारी स्वामी अग्निवेश पर भाजपाईयों की भीड़ ने भाजपा मुख्यालय के सामने ही जिस प्रकार हमला बोला उससे जाहिर हो गया कि देश में इस हिंसक भीड़ की प्रशिक्षण और प्रेरणा स्थली कहां हैं। बुनियादी भारतीय संस्कारों को शर्मसार करते हुए जो धक्का मुक्की और मारपीट अग्निवेश के साथ की गई उसने पूरी तरह से जाहिर कर दिया है कि पूरे देश में हिंसा को हवा देने वाली भीड़ किसकी है और उसे यह नये राजनीतिक संस्कार कहां से मिले हैं।
इसके अलावा दूसरी घटना मोतिहारी के एक पिछड़े प्रोफेसर संजय यादव पर हुआ जानलेवा हमला है। वैसे तो बताया जाता है कि वह महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में व्यापत अनियमितताओं को लेकर पहले से ही काफी मुखर रहने के कारण वीसी और उसके गिरोह के निशाने पर थे परंतु अटल बिहारी वाजपेयी पर उनकी कुछ तथ्यात्मक टिप्पणियों ने ब्राह्मणवादी भीड़ को हिंसा करने का मौका दे दिया और उन्होंने संजय यादव पर जानलेवा हमला कर डाला।

दरअसल, यही असली संघी माॅडल है जो अपने विरोधियों को आतंकित करके अपने वर्चस्व को बनाये रखना चाहता है। और इस संघी भीड़ हिंसा का नायक जब देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर विराजमान हो तो यह भीड़ किसी को भी अपना निशाना बनाकर अपने राजनीति लक्ष्यों को पूरा करती है। यही आतंकवाद ब्राह्मणवाद का असली ‘‘राजधर्म‘‘ है। इस भीड़ आतंक के राजधर्म का महानायक इस हिंसा पर किस प्रकार फासीवादी हंसी हंसकर इसे आगे बढ़ता है वह 2002 में उस संवाददाता सम्मेलन में साफ हो गया था, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी बगल में मोदी को बिठाकर गुजरात नरसंहार पर ‘राजधर्म‘ की सीख दे रहे थे और मोदी ढ़ीठ हंसी हंसते हुए प्रोटोकाॅल को नजर अंदाज करते हुए प्रधानमंत्री के बीच में ही बोलते हैं कि वही तो कर रहे हैं। यानि वह जो गुजरात में 2002 में कर रहे थे वही उनका राजधर्म था। जाहिर है फासीवाद का राजधर्म सुनियोजित और योजनाबद्ध भीड़ हिंसा ही है।

अटल बिहारी वाजपेयी की मौत के बाद जिस प्रकार अटल बिहारी वाजपेयी को देश के मीड़िया ने विराट रूप में पेश किया और उनके व्यक्तित्व पर कुछ तथ्यात्मक टिप्पणी करने के लिए जिस प्रकार अटल के आलोचकों को निशाने पर लिया गया उससे संघी फासीवाद का ‘राजधर्म‘ सामने आ गया। इसके अलावा यह भी एक सच्चाई है कि स्वामी अग्निवेश सरीखे लोग तो अटल बिहारी वाजपेयी के कोई प्रखर आलोचक भी नही रहे फिर भी उन्हें निशाने पर लिया गया। जो साफ जाहिर करता है कि जो भी संघी फासीवादी तौर तरीकों का स्वाभाविक विरोधी होगा उसे नरेन्द्र मोदी के 2002 के राजधर्म का निशाना बनना ही होगा, उसे बख्शा नही जायेगा। इस ‘राजधर्म‘ को कोई खतरा कोई, चुनौती स्वीकार नही है। अटल बिहारी वाजपेयी की मौत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब हर चुनौती और हर खतरा इस मोदीवादी ‘राजधर्म‘ के निशाने पर है।