एक तस्वीर जिसने एनआरसी पर खड़े कर दिये कईं सवाल

आईएनएन भारत डेस्क
15 अगस्त 2017, जब सब बच्चे और शिक्षक बारिश के पानी और बाढ़ से डर गये थे और कोई भी स्कूल में जाने और तिरंगे को आसमान में उंचा लहराकर स्वतंत्रता दिवस पर सलामी देने का साहस नही कर रहा था। तब 9 साल का हैदर खान और 10 साल का जियारूल खान तैर कर स्कूल के प्रांगण में फ्लैग पोस्ट तक पहुंचे और सीने से भी उपर तक चढ़ आये पानी में खड़े होकर झण्ड़े को सलामी दी।

पानी में खड़े हैदर और उसे दोस्त जियारूल खान और दो शिक्षकों के तिरंगे को सलाम करती एक तस्वीर ने कईं सवालों को जिंदा कर दिया है और कईं साजिशों की कहानियों पर सवाल खड़े कर दिये हैं। ध्यान रहे हैदर के परिवार के आधिकतर सदस्य 2011 में कोकराझार के दंगों में मारे गये थे। हैदर के पडदादा 1951 की एनआरसी में भारत के नागरिक थे। उनकी मां भी देश की नागरिक हैं।

15 अगस्त 1947 को शोक का दिन बताने वाले और तिरंगे को जलाने वाले और तिरंग को राष्ट्रीय ध्वज नही मानने वाले और भगवा तिकोने झण्ड़े को अपना राष्ट्रीय ध्वज बताने वाली राजनीति आज 10 साल के हैदर को भारतीय नागरिक रजिस्टर से बाहर कर चुकी है। उसका पूरा परिवार नागरिक है परंतु 9 साल का हैदर नागरिक नही है और ऐसी एनआरसी पर भगवा राजनीति के सरदार बने फिर रहे अमित शाह कहते हैं कि अब हम बंगाल में भी यही करेंगे और एनआरसी बनायेंगे।
वैसे भाजपा बताये कि विदेशी नागरिक प्राधिकरण ने पिछले साल तक 70 हजार लोंगो को घुसपैठिया और विदेशी घोषित कर दिया था। उनका भाजपा और उसके बडबोले असमिया मुख्यमंत्री ने क्या किया।

2014 में मोदी ने चुनावी भाषण में कहा था कि वो सत्ता में आये तो विदेशी घुसपैठियों को सीमापर भेज देंगे। क्या हुआ?
इधर भाजपा नेता घुसपैठियों को बाहर करने के दावे करके ध्रुवीकरण की और बंटवारे की राजनीति को गरमाये हुए हैं और उधर बांगलादेश में भारतीय उच्चायुक्त बांगलादेशी मीड़िया को आश्वास्त कर रहे हैं कि बांगलादेश पर इसका कोई असर नही पडेगा। साथ ही मोदी सरकार और उनके मंत्री भी बांगलादेश को यही आश्वासन दे रहे हैं।

2017 की इस पुरानी तस्वीर और इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर ने फिर से एनआरसी के मसले को नये अंदाज में गरमा दिया है। अमित शाह ने गली के नुक्कड पर खडे होकर चीखने के अंदाज में कहा था कि जो कांग्रेस नही कर पायी वो हमने करने की हिम्मत दिखाई है।

अब सवाल हैदर जैसे मासूम का है कि क्या यही भगवा राजनीति की हिम्मत का नतीजा है और सवाल एनआरसी पर भी है कि क्या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की भगवा राजनीति के लिए ही एनआरसी में जानबूझकर ऐसी गलती की गई हैं कि चालीस लाख लोग एनआरसी से बाहर हो गये।

इसके अलावा एक सवाल संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग के उस पत्र क भी है जो जून में सुषमा स्वराज को भेजा गया था कि बतायें एनआरसी से बाहर हुए लोगों का उनकी सरकार क्या करेगी।