एनआरसी पर देश को मूर्ख बना रहे हैं आरएसएस-भाजपा के नेता

महेश राठी
नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स अर्थात एनआरसी आरएसएस-भाजपा का नया नारा बन चुका है। बंगाल से लेकर असम और पूरे देश में आरएसएस-भाजपा का हरेक नेता एनआरसी को किसी नये गीत की तरह गाता गुनगुनाता घूम रह है। 11 अगस्त को कलकता की भाजपा की रैली में भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भाषण में एनआरसी ही छाया रहा। अवास्तविक गैर जरूरी मुद्दे बनाने में माहिर आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए आजकल एनआरसी एक ऐसा सटीक मुद्दा है, जो आरएसएस-भाजपा के हर नेता और कार्यकर्ता की जुबान पर है। जुमलेबाजी से देश की जनता को मूर्ख बनाकर सत्ता में आयी भाजपा को लगता है कि वह अपने वादों की विफलताओं को नये सांप्रदायिक जुमलों के सहारे छुपा सकती है। इसीलिए भाजपा सरकार एनआरसी पर अपनी रणनीति और घुसपैठियों के सवाल पूरे देश को गुमराह कर रही है और मूर्ख बनाकर केवल वोट हासिल करना चाहती है।

एक तरफ जहां आरएसएस-भाजपा और भगवा राजनीति के नेता बंग्लादेशी घसुपैठियों को मुद्दा बनाकर उन्हें वापस भेजने की बड़ी बड़ी भडकाने वाली बयानबाजी कर रहे तो वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार के मंत्री बंगलादेश को आश्वास्त कर रहे हैं कि किसी को भी बंगलादेश में नही भेजा जायेगा। यह देश की जनता को मूर्ख बनाना नही तो क्या है। हाल ही में भारत आये शेख हसीना के सत्ताधारी गठबंधन में उनके सहयोगी बीटीएफ के अध्यक्ष अल हज सैयद नजीबुल बशर ने साफ कहा कि किरन रिजीजू और विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर ने उन्हें आश्वस्त किया है कि किसी को भी बंगलादेश वापस नही भेजा जायेगा। बता दें कि एनआरसी का अंतिम प्रारूप प्रकाशित होने के तुरंत बाद और उससे पहले भी बंगलादेश साफ कह चुका है कि भारत में विदेशी घुसपैठियों से उनका कोई लेना देना नही है और हमारे देश का कोई भी नागरिक असम या भारत में नही है। यहां तक कि बंगलादेश ने भारत को यह संदेश मोदी के विकास की भाषा में भी दिया है और कहा है कि हम एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं और हमारी जीडीपी काफी उंची है तो हमारे नागरिक दूसरे देश में क्यों जाने लगे। जीडीपी के आंकड़ों का हवाला देकर जिस विकास गीत के सहारे मोदी देश की जनता को बरगलाते हैं उनके भारतीय महाद्वीप में एकमात्र मित्र देश की सरकार ने मोदी को वही विकास गीत गाकर एनआरसी पर जवाब दिया है।

 

दरअसल, वोटों के ध्रुवीकरण के लिए मोदी सरकार लाखों की आबादी को सरकारी खर्चे पर पलने वाला एक बोझ बनाने की तरफ बढ़ रही है। पिछले दिनों जिस प्रकार की प्रतिक्रिया बंगलादेश ने दी और जैसी तुरंत सफाई भारत सरकार ने तत्परता से दी है उससे साफ जाहिर होता है कि जिन लोगों को एनआरसी से बाहर रखने की योजना भगवा सरकार ने बनाई है सरकार उन्हें घुसपैठिया घोषित करने बाद क्या करेगी उसके लिए सरकार के पास कोई योजना ही नही है। एनआरसी के अंतिम प्रारूप को प्रकाशित करने से पहले ही सरकार ने लगभग 85 हजार लोगों की पहचान विदेशी घुसपैठियों के रूप करने की घोषणा की थी। अब सवाल यह है कि उन 85 हजार लोगों का सरकार ने क्या किया। यदि इस पर गौर करें तो भारत सरकार के दावों के पीछे की उनकी असलियत सामने आ जायेगी। सरकार इन विदेशियों को देश से बाहर भेज नही सकती क्योंकि इन बंगलादेशियों को बंगलादेश ने अपना मानने से इंकार कर दिया है और बेहद सख्ती से वापस लेने से मना कर दिया है। बंगलादेश के सत्ताधारी नेताओं ने यहां तक कह दिया है कि ममता बनर्जी और अमित शाह को अपने शब्दों पर काबू रखना चााहिए क्योंकि उनकी बयानबाजी यहां विपक्षी बीएनपी और जमात जैसे कट्टरपंथियों को इससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का मौका मिल रहा है, उनके देश में हालात बिगड़ रहे हैं। और भारत कभी नही चाहेगा कि बंगलादेश में बीएनपी की सरकार सत्ता में आये। बंगलादेश सरकार बार बार कह रही है कि यह भारत का अंदरूनी मामला है और इन घुसपैठियों से हमारा कोई लेना देना नही है।

 

अब सवाल यह है कि सरकार इस पूरे मसले का हल क्या करेगी। घुसपैठियों को कहां भेजेगी। अभी केवल कुछ एक हजार से ज्यादा ऐसे विदेशी कैदी असम की छह जेलों कोकराझार, गोलपाडा, सिलचर, तेजपुर, डिब्रुगढ़ और जोरहाट जेल में हैं। उन्हें केवल हिरासत में रखा गया है। अब संख्या बढ़ने से जेल प्रशासन को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अब इससे निपटने के लिए असम सरकार ने गोलपाडा के माटिया में 3000 विदेशियों के लिए एक नया डिटेन्सन कैंप बनाने का निर्णय लिया है। जिसके लिए गोलपाड़ा के माटिया में जिला प्रशासन ने 20 बीघा जमीन आवंटित की है और साथ ही कैंप बनाने के लिए 47 करोड़ रूपये का बजट भी है। अब केवल 3000 के लिए 20 बीघा जमीन और 47 करोड़ रूपये तो जाहिर है यदि 30 लाख के लिए कैंप की जरूरत पड़ेगी तो कम से कम हजारों एकड जमीन और 47 हजार करोड़ या उससे अधिक बड़ी धनरााशि की जरूरत होगी। यह जमीन और कैंप के निर्माण पर होने वाला खर्च असम सरकार वहन करेगी या केन्द्र का भगवा गिरोह वहन करेगा, अभी साफ नही है। इसके अलावा यह केवल कैंप निर्माण तक का मामला नही है उसमें रहने वालों के लिए खाने, रहने, इलाज, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्या का सरकार किस प्रकार निवारण करेगी। ऐसा तो नही है कि 30 या 40 लाख लोगों को कैंप में मार देना के लिए रखा जायेगा। मौजूदा दुनिया में ऐसा तो संभव है नही। इसके अलावा यदि इन लाखों लोगों से पहचान छीनकर इन्हें समाज में बगैर पहचान पत्र के खुला छोड़ा जायेगा तो जाहिर है कि उन्हें उनके जीवनयापन लिए देश में कहीं भी रोजगार नही मिल पायेगा। ऐसे स्थितियां उन्हें अपराधों और अर्द्धअपराधों की दुनिया में ही ले जायेगी। और इस पूरे खतरे को बिना सोचे समझे भगवा गिरोह वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हवा दे रहा है। इतनी बड़ी राज्यविहीन और नागरिकता विहीन आबादी जिसे या तो आप कैंप में रखकर घुसपैठियों को बिरयानी खिलायें जिसके लिए भगवा गिरोह ने 47 करोड और 20 बीघा जमीन आवंटित कर दी है या फिर उन्हें बगैर पहचान के समाज में अपराध करने की मजबूरी के साथ खुला छोड़ दें।

 

वास्तव में भारत सरकार के पास राज्य विहीन ऐसे लोंगों से डील करने के लिए कोई नीति या रणनीति नही है। यह भी समझना होगा कि राज्यविहीन आबादी और शरणार्थी दोनों में अंतर है। परंतु भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह भारत का नागरिक है कि नही बराबरी का अधिकार देता है। अनुच्छेद 20 सभी की सुरक्षा की गारंटी करता है और अनुच्छेद 21 भारत में रहने वाले लोगों को उनके जीवन और व्यक्तिगत आजादी सग वंचित नही करने को सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 21ए भारत में रहने वाले सभी को शिक्षा सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 23 और 24 सभी को शोषण के विरूद्ध अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 32 सुुप्रीम कोर्ट को भारत में रहने वाले सभी लोगों के अधिकार लागू करवाने का अधिकार देता है। इसीलिए जब अमित शाह संसद में कहते हैं कि कांग्रेस जो हिम्मत नही दिखा पायी वह हमने दिखाई तो वह इस देश की जनता को बताना भूल जाते हैं कि उनकी इस हिम्मत की कितनी बड़ी कीमत देश की अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ेगी। क्योंकि भारत का मित्र पड़ोसी देश इन बंगलादेशियों को अपने देश से जोड़ने पर लगातार महावीर मोदी सरकार को चुनौती दे रहा है और जिन्हें भगवा राजनीति घुसपैठिया बताकर राजनीतिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है उन्हें भारतीय संविधान भारत के नागरिक ना रहने पर भी कुछ बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करता है। जाहिर है इस भगवा राजनीति की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ेगी।