बृजेश ठाकुर की आड़ में किसे बचा रहे हैं नीतीश कुमार?

आईएनएन भारत डेस्क
राजद नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने दिल्ली के जंतर मंतर पर कैंडल मार्च में भाषण करते हुए और उससे पहले भी मीड़िया से बात करते हुए साफ कहा था कि मुजफ्फरपुर बालिका यौन उत्पीड़न मामले के सूत्रधार और प्रमुख आरोपी बृजेश ठाकुर नीतीश कुमार के करीबी हैं। ठाकुर को मिलने वाली सुविधाएं और बेशुमार दौलत इसकी गवाही भी दे रही हैं।

दूसरी तरफ नीतीश कुमार लगातार दावे कर रहे हैं कि दोषियों को बख्शा नही जायेगा। परंतु बृजेश ठाकुर को जैसी सुख सुविधाएं जेल के नाम पर दी जा रही हैं, उससे जाहिर होता है कि दोषियों को क्या सजा मिलने वाली है। मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड का मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर इस वक्त जेल में बंद है। ब्रजेश ठाकुर को जिला जेल में रखा गया है। चार दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार के हवाले से यह भी खबर सामने आयी कि मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल स्थित एक अस्पताल में ब्रजेश ठाकुर आराम फरमा रहा है। और जेल के नाम पर उसे अस्पताल में रखने के लिए एक मेडिकल बोर्ड भी बनवाने की तैयारी की जा रही है।

बताया जाता है कि इस की पुष्टि स्वयं जेल अधीक्षक राजीव कुमार ने की है। ठाकुर की ऐश का बचाव करते हुए उन्होंने साफ कहा कि यदि ठाकुर को कुछ हो जाता है तो कौन जवाब देगा। फिर कहा जायेगा कि जानबूझकर ऐसा किया गया। इसके अलावा राजद ने अपने एक ट्वीट में यह भी कहा कि ठाकुर जेल में बंद होने के बावजूद भी बाहरी दुनिया से संपर्क में है और सब कुछ ठीक हो जाने की बात करता है लोंगो को धमकाता भी है।

जानकारी के अनुसार, मुजफ्फरपुर कांड के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के रसूखदार लोगों से कनेक्शन थे। बिहार सरकार के अधिकारी नेता तमाम लोग बृजेश ठाकुर के करीबियों में शुमार थे। बिहार के तमाम बड़े नेताओं के साथ बृजेश ठाकुर की तस्वीर हैं। तमाम लोग उसे बड़े ही अदब के साथ सम्मान देते थे।

केवल इतना ही नही मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के मुख्य आरोपित ब्रजेश ठाकुर के राजनीतिक रुतबे के सामने सरकार के सारे नियम बौने थे। अपनी राजनीतिक पहुंच एवं दबंगई का भय दिखाकर ब्रजेश ठाकुर अफसरों से काम करवाता था। इसकी एक बानगी यह है कि जिस दिन उस पर एफआइआर दर्ज हुई उसी दिन उसने अपनी संस्था ‘सेवा संकल्प‘ के नाम पर 40 लाख रुपये का टेंडर हासिल कर लिया। समाज कल्याण विभाग द्वारा यह टेंडर ‘मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति निवारण योजना‘ के तहत दिया गया था। अब नीतीश कह सकते हैं कि मामला उनके संज्ञान में नही था। मुख्यमंत्री के नाम पर योजना है और नीतीश जानते ही नही कि किसे किसे धनराशि दी जा रही है।

इसके अलावा इस पूरे मामले के खुलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे सभी गैर सरकारी संगठनों के सोशल आॅडिट का निर्देश दिया है। मगर बिहार सरकार की हिम्मत की दाद देनी पडेगी कि इतने बड़े काण्ड के बाद भी वह सोशल आॅडिट का विरोध कर रही है। हालांकि बिहार सरकार अकेली नही है जो इसका विरोध कर रही है। उत्तर प्रदेश सरकार सहित और भी कईं सरकारें इसका विरोध कर रही हैं परंतु सवाल यह है कि यूपी-बिहार जैसे राज्य जिनमें इन अमानवीय और भयावह काण्ड़ों का खुलासा हुआ है वह सोशल आॅडिट का विरोध करने का नैतिक साहस कैसे जुटा पा रहे हैं अथवा अभी इससे भी बड़े कुछ खेल सूबे में चल रहे हैं जिनकी पर्दादारी है। वैसे बता दें कि सोशल आॅडिट का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में दिया था और जिसकी अनदेखी तब से की जा रही थी और इतने बडे काण्ड का खुलासा हो जाने के बाद भी नैतिकता के दो बड़े आलम्बरदार योगी और नीतीश धार्मिक और राजनीतिक आलम्बरदार, अभी भी सोशल आॅडिट नही करवाने की हिम्मत दिखा रहे हैं।

इसके अलावा इस पूरे मामले में इस्तीफा देने वाली नीतीश सरकार की मंत्री मंजू वर्मा का बयान भी कुछ कम आश्चर्यजनक नही है। उन्होंने कहा कि मेरे पति एक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मैं भी राजनीति और सामाजिक जीवन में हूं और मंत्री हूं। ऐसे में हर किसी का फोन रिसीव करना मेरा दायित्व बनता है। इस दौरान मंजू वर्मा ने कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड (सीडीआर) पर भी सवाल उठाए और इसको सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर सिर्फ बात करने की वजह से उनके पति चंद्रशेखर वर्मा दोषी हैं, तो उनसे बात करने वाले दूसरे भी दोषी हैं। ऐसे सभी लोगों के नाम भी सामने आने चाहिए। अब सवाल है कि मंजू वर्मा का इशारा किसकी तरफ है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पालतू तोते के रूप में मशहूर सीबीआई के पास और भी कईं लोगों के सीडीआर हैं परंतु निशाना केवल मंजू वर्मा के पति को ही बनाया गया है। चूंकि उनके पति का नाम विपक्ष के निशाने पर था तो इसीलिए केवल उन्हें ही शिकार बनाया जा रहा है, अन्यथा तो शिकार होने लायक ढ़ेरों लोग हैं।

ठाकुर तीन अखबार निकालते थे। जिसमें केवल सरकारी विभागों में बांटने लायक ही 300 कापियां छपती थी परंतु इस पर भी उन्हें लाखों के विज्ञापन राज्य और केन्द्र सरकार देती थी। अब मौजूदा राज्य और केन्द्र सरकार जो अपने ही सलेक्टिड लोगों को विज्ञापन देने के लिए कुख्यात हैं तो नीतीश कुमार बतायें कि ठाकुर उनके कितने अपने थे और राज्य में उनके और कितने ऐसे अपने हैं जिन्हें सोशल आॅडिट से बचाया जा रहा है। नीतीश कुमार को समझ लेना चाहिए कि ‘राग भ्रष्टचार‘ गाने से भ्रष्टचार खत्म नही होता है। क्योंकि भ्रष्टचार कोई शायत्रीय राग नही है कि किसी गवैये की तरह ‘‘राग भ्रष्टचार‘‘ छेड़कर कोई भी दुःशासन सुशासन बाबू बन बैठेगा। सुशासन बाबू बनने के लिए कार्रवाई करनी पड़ती है और कार्रवाई केवल विपक्ष पर ही नही अपनों पर भी करनी होती है। अब समय आ चुका है कि नीतीश कुमार जवाब दें कि बृजेश ठाकुर के बच जाने से कौन कौन बच रहा है और वह किसे किसे ठाकुर की आड़ में बचा रहे हैं।