राफेल बनने जा रहा है मोदी के गले का फंदा?

आईएनएन भारत डेस्क
राफेल को लेकर शुरू हुआ हंगामा थमने का नाम नही ले रहा है। 9 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण, पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा और जाने माने पत्रकार और वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे अरूण शौरी ने एक संवाददाता सम्मेलन में राफेल डील से जुड़े विभिन्न दस्तावेजों के साथ मोदी सरकार विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोला और मोदी की नीयत पर सीधे सवाल खड़े किये। इन तीनों के संवाददाता सम्मेलन में अपनी बात रखने के बाद एकबार फिर राफेल डील को लेकर 10 अगस्त को संसद में हंगामा हुआ और कांग्रेस के नेतृत्व में कईं विपक्षी दलों ने इस मसले को लेकर संसद भवन में धरना दिया। इस धरने में कांग्रेस के अलावा भाकपा के सांसद डी राजा और आप के सुशील गुप्ता के अलावा राजद के सांसद भी शामिल थे।
राफेल के मसले को सरकार लगातार दबाने का प्रयास कर रही है तो वहीं विपक्ष और अन्य व्यक्ति अपने स्तर पर लगातार इस मसले को उठा रहे हैं। प्रशांत भूशण, यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी ने गुरूवार को इस डील से जुडे कईं अहम दस्तावेज पेश करते हुए सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की नीयत पर सवाल उठाये। उनके अनुसार इस पूरे मामले में लगभग 48 हजार करोड़ रूपये पिछली यूपीए सरकार की मौलिक डील ये अधिक दिये गये हैं और वहीं उडने के लिए तैयार मिलने वाले राफेल लडाकू विमानों की संख्या भी पिछली डील से कम है।
रिलायंस की डिफेंस कंपनियों का प्रमाण पत्र मार्च 2015 में जारी
उनके मुताबिक इस पूरी डील में भ्रष्टाचार को अंजाम देने के लिए ही अनिल अंबानी की दो कंपनियां बनवाई गई थी। जिसमें एक अंबानी डिफेंस लिमिटेड और दूसरी अंबानी डिफेंस सिस्टम एण्ड टेकनोलोजिज लिमिटेड थी। इन दोनों कंपनियों का गठन 25 मार्च 2015 को किया गया था। जबकि प्रधानमंत्री मोदी की दो दिवसीय फ्रांस यात्रा 10 अप्रैल से शुरू हुई थी। ठीक मोदी की यात्रा से पहले इस कंपनी का खड़ा किये जाना सरकार की नीयत और मोदी अंबानी की मिलीभगत पर सवाल खड़े करता है।
इसके अलावा सबसे रोचक पहलू इस डील का यह है कि मोदी की इस यात्रा से दो दिन पहले ही विदेश सचिव 8 अप्रैल 2015 को प्रेस वार्ता करते हैं और मोदी की यात्रा का ब्योरा देते हैं जिनमें चार ऐसे तथ्य हैं जो मोदी द्वारा की गई डील से एकदम उलट दिखाई पड़ते हैं। विदेश सचिव की घोषणा के अनुसारः
1. राफेल की डील के बारे वार्ता जारी है।
2. यह पूर्व की मौलिक डील के तहत ही जारी रहेगी।
3. हिंदुस्तान एयरोनोटिक लिमिटेड इस परियोजना का हिस्सा है
4. भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति सुरक्षा के क्षेत्र की बड़ी तस्वीर पर अपनी वार्ता का फोकस रखेंगे। 
विदेश सचिव के इस बयान के दो दिन बाद ही मोदी ने पूरा खेल पलटते हुए कहा कि यह एक पूरी तरह से नई डील होगी।
इसके बाद राफेल डील में अनिल अंबानी समूह का दाखिला होता है और पुरानी डील पूरी तरह से बदल जाती है जैसा कि मोदी ने कहा था। जिससे साफ जाहिर होता है कि मोदी की यात्रा का फोकस क्या होगा और राफेल पर क्या डील होगी सरकार के सबसे अहम पदों पर बैठे और विदेश सचिव जैसे व्यक्ति की जानकारी में भी नही था। यह पूरी डील मोदी ने व्यक्तिगत स्तर पर अंजाम दी थी।
अंबानी के इस डील में आने से सबसे बड़ा झटका सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल को लगा जिससे वी पूरी तरह से इस डील से बाहर हो गयी। अब देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में ऐसी कंपनी डील करेगी जिसका विभिन्न परियोजनाओं में विफल रहने का रिकाॅर्ड रहा है और जिसको रक्षा क्षेत्र का कोई अनुभव नही था। अंबानी की उस कंपनी के लिए सर्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनी और रक्षा उपकरणों के विनिर्माण का 60 सालों का व्यापक अनुभव रखने वाली कंपनी को बाहर कर दिया गया।
2014 में यूपीए 2 के समय राफेल से समझौता करने वाली एचएएल का राफेल बनाने वाली दासों के साथ साझी परियोजना में 70 प्रतिशत हिस्सा था। अब इस पूरे समझौते की वार्ता सभी के लिए रहस्य की चीज थी यहां तक कि शीर्ष नौकरशाह भी पूरी डील से नावाकिफ थे। मेक इन इण्डिया का ढ़ोल पीटने वाली सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी को इस डील से बाहर कर दिया और उडने के लिए तैयार 36 लडाकू जहाजों की खरीद विदेशी कंपनी से कर डाली। पुरानी डील में प्रौद्योगिकी के स्थानान्तरण का समझौता था जिससे देश में 108 लडाकू विमान तैयार होते जिसका अब कोई जिक्र नही है। अब कुल मिलाकर साफ हो गया कि मोदी के साथ पेरिस जाने वाले अनल अंबानी की डील से कुछ पहले बनी कंपनी इस डील में करोड़ों रूपये कमाने वाली है। अब इस नई डील में रिलायेंस की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत और दसों की हिस्सेदारी 49 प्रतिशत होगी जिसमें पहले भारत की सरकारी कंपनी की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत थी। यह मेक इन इण्डिया की जीत है? जिसमें घाटे में और कर्ज में चल रही एक कंपनी अचानक हजारों करोड़ रूपये के मुनाफे में आ जाती है।
डील के बाद का रिलायंस की 31 मार्च 2017 को जारी की गई आॅडिट रिपोर्ट
इसके अलावा जिस राष्ट्रीय सुरक्षा हवाला सरकार दे रही है वह सरासर बेबुनियाद है। पहले भी सरकारें अपने ऐसे सौदों को सार्वजनिक करती रही हैं। इस बार भी मौजूदा सरकार के पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने संसद में स्वयं ही इस सौदे में तय की गई राफेल की कीमत को 670 करोड़ प्रति विमान बताया था।
इसके अलावा मोदी सरकार और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन फ्रांस के साथ जिस गोपनीयता को बनाये रखने की बात कर रही है। उसके बारे में फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों ने इण्डिया टूडे को दिये अपने साक्षात्कार में साफ कहा था कि डील को गोपनीय बनाये रखना पूरी तरह से भारत सरकार का अपना मामला है।
इसके अलावा ऐसे कईं सवाल हैं जिनका जवाब सरकार को देना है। क्योंकि इस डील में कोई साफ नही है कि कब तक 36 राफेल मिलेंगे। यह जहाज भारत में कहां बनेंगे यह भी साफ नही है। प्रौद्योगिकी के ट्रांसफर के बारे में भी कोई विवरण सामने नही है। पिछले डील में 126 राफेल मिलने थे अब केवल 36 का जिक्र है बाकि का क्या होगा इसके बारे में कोई वर्णन डील में नही है और सरकार इस पर चुप है।
बहरहाल, यह पूरा मामला देश के अभी तक के सबसे बड़े रक्षा घोटाले का है, जैसा कि विपक्ष और इस मामले के अन्य जानकार दावा कर रहे हैं। सरकार बेशक इस मामले पर कितनी ही लीपापोती करे और जोर से चिल्लाकर अपने आप को पाक साफ दिखाने की कोशिश करे परंतु यह तय है कि इस पूरे मामले में कुछ बडा खेल तो जरूर हुआ है जिसे दबाने की कोशिश सरकार कर रही है। परंतु अब लगता है कि मोदी सरकार के दबाने से मामला दबने वाला नही है और आने वाले समय में राफेल का फंदा मोदी के गले में फंसता जायेगा और राफेल मोदी के कार्यकाल का सबसे बड़ा संकट बनकर उभरने वाला है।