बिहार में टूट की तरफ बढ़ता एनडीए, बढ़ रही जदयू-भाजपा की मुश्किलें

महेश राठी
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का समय आजकल भोज में अधिक बीत रहा है। कभी दलित की चैखट पर भोज तमाशा तो कभी नीतीश कुमार जैसे सहयोगी के साथ मान मनोव्वल भोज की कवायद परंतु फिर भी भाजपा और एनडीए का संकट खत्म होने का नाम नही ले रहा है। बेशक नीतीश कुमार और उनके प्रवक्ता बिहार में नीतीश को बड़ा भाई बनाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रहें हों परंतु यह भी वास्तविकता है कि बिहार में नीतीश कुमार ही एनडीए के संकट का एकमात्र कारण भी हैं। बिहार में एनडीए का संकट एक ऐसी कहानी है जिसकी पटकथा नीतीश कुमार के दोबारा एनडीए में शामिल होते ही लिखी जा चुकी थी।

बहरहाल, इस समय एनडीए के सहयोगी और केन्द्र में मंत्री उपेन्द्र कुशवाह और उनकी पार्टी एनडीए के लिए एक ऐसी पहेली बनते जा रहे हैं जिसका हल मोदी-शाह की जोड़ी शायद ही कर पाये। पिछले काफी दिनों से उपेन्द्र कुशवाह की पार्टी रालोसपा ने दावा किया था कि उनकी पार्टी बढ़ते हुए जनाधार वाली पार्टी है और पिछले लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी को नीतीश से अधिक सीटें मिली थी और उनकी जीत का प्रतिशत भी नीतीश से कहीं अधिक था तो ऐसे में अगले विधानसभा चुनावों में उपेन्द्र कुशवाह को ही एनडीए के मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर पेश किया जाए। इसके अलावा उन्हें आगामी लोकसभा चुनावों में भी जदयू से अधिक सीटें लड़ने के लिए दी जायें। बिहार में रालोसपा के उपाध्यक्ष जितेन्द्र नाथ ने कईं मौकों पर इस दावे को ना केवल दोहराया है बल्कि इसके पक्ष में सामाजिक समीकरण भी रेखांकित किया है। इसके अलावा उपेन्द्र कुशवाह बेशक एनडीए का हिस्सा रहे हों परंतु यह भी निर्विवाद सत्य है कि एनडीए में रहते हुए भी उन्होंने लगातार पिछड़े वर्ग के सवालों को बेहद मुखरता के साथ उठाया है। कईं बार उनके सवालों ने एनडीए के प्रमुख दल भाजपा को असहज और परेशान भी किया है।

बिहार में राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले पंद्रह सालों में नीतीश की छवि बदली है और अब उनकी छवि बिहार में पिछडा नेता की नही बल्कि एक भूमिहार संरक्षक की बनकर रह गयी है। बिहार में भूमिहारों के लिए नीतीश कुमार एक ‘‘रिवर्स राॅबिन हुड‘‘ की भूमिका में हैं, क्योंकि ‘‘लूटेंगे भूमिहार और बचायेंगे नीतीश कुमार‘‘। नीतीश के ‘‘रिवर्स राॅबिन हुड‘‘ रोल की कहानी सूबे में हर जगह लिखी एक ऐसी इबारत है जिसे बिहार के मलाईदार महकमों से लेकर तमाम सरकारी ठेकों में भूमिहारों के कब्जे की शक्ल में कमाई की हरेक जगह पर पढ़ा जा सकता है। इसे कोई समझे कि नही बिहार का भूमिहार भली भांति समझता है और जानता भी है। इसीलिए पिछले कईं सालों से भूमिहार नीतीश कुमार के पीछे लामबंद है। भूमिहार अपने इस पिछडे संरक्षक की भूमिका के प्रति कितना सजग है उसे भूमिहारों में लोकप्रिय एक जुमले से समझा जा सकता है। बिहार के भूमिहारों में एक जुमला जो बेहद आम है और नीतीश कुमार और भूमिहार गठजोड़ के समन्वय को उजागर भी करता है। वह जुमला है ‘‘ताज तुम्हारा, राज हमारा‘‘। यह आज के बिहार के सत्ता समीकरण को सही मायने में परिभाषित करता है। आप नीतीश कुमार के करीबियों की पूरी सूची देख लें अधिकतर जगहों पर आपको भूमिहार ही नजर आयेंगे। यहां तक कि उनके गैर बिहारी सबसे मुखर प्रवक्ता के सी त्यागी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के त्यागी हैं जो बिहार के भूमिहार के समकक्ष ही नही बल्कि यूपी में भूमिहार की पर्याय जाति वाले माने जाते हैं। यह कमाल ही है कि नीतीश का सबसे चहेता गैर बिहारी नेता भी एक भूमिहार ही है। बहरहाल, इस भूमिहार प्रेम के रहस्य को वही अधिक जान सकते हैं।

दरअसल, नीतीश के पिछले पंद्रह सालों के राज में कुछ बदला हो कि नही उनकी छवि जरूर बदली है। एक पिछड़े नेता से एक भूमिहार संरक्षक नेता और मुख्यमंत्री की छवि। नीतीश की इसी बदलती छवि को पहचान कर उपेन्द्र कुशवाह की पार्टी ना केवल उपेन्द्र कुशवाह को बिहार के अगले मुख्यमंत्री का एनडीए का चेहरा बनाने की मांग पर अडी है बल्कि उपेन्द्र कुशवाह को बिहार में गैर यादव पिछडों के नेता के रूप में पेश भी कर रही है। और कुशवाह को गैर यादव पिछड़ों का नेता बनाने की इस मुहिम में सबसे रोचक तथ्य यह है कि उनका दावा पिछड़ों के उसी वोट बैंक पर है जिसके दम पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। कुशवाह, कुर्मी और धानुक, कुशवाह वह स्वयं हैं और धनुक समुदाय में बताया जाता है कि उन्होंने जमीन पर पिछले दिनों खासी सेंध लगायी है। रही बात कुर्मी की तो उन्होंने शेखपुरा के जितेन्द्र नाथ को कुर्मियों को अपनी तरफ लाने के लिए रालोसपा में ना केवल उपाध्यक्ष बनाया बल्कि पिछड़ा प्रकोष्ठ का मुखिया भी बनाया है। ध्यान रहे कि पिछले दशक में नीतीश कुमार के कुर्मी नेता के रूप में उभरकर आने में भाकपा विधायक और कुर्मी नेता सतीश कुमार की एक अहम भूमिका रही है। पिछले दशक की शुरूआत में इन्हीं सतीश कुमार ने विशाल महा-कुर्मी रैली का आयोजन किया था। जिसमें उस समय के भाकपा नेता जितेन्द्र नाथ सतीश कुमार के प्रमुख सहयोगी रहे थे। जिसके बाद नीतीश कुमार एक बड़े कुर्मी नेता के रूप में उभरकर सामने आये थे। जान पड़ता है कि रालोसपा एक खास रणनीति के तहत अब इन्ही जितेन्द्र नाथ को भूमिहार संरक्षक नीतीश कुमार के सामने एक कुर्मी नेता के रूप में पेश कर रही है।

बहरहाल, ऐसा कहना मुश्किल है कि रालोसपा नीतीश का सारा जनाधार झटक लेगा परंतु यह तय है कि नीतीश के वोट बैंक में कुशवाह पहले भी सेंध लगाकर नुकसान पहुंचा चुके हैं अबकी बार निश्चित ही वह उस नुकसान को निर्णायक स्तर तक बढ़ायेंगे। और जिस प्रकार कुशवाह और उनकी पार्टी नीतीश से अधिक सीटों पर अड़ी है उससे जाहिर है कि एनडीए की टूट को बचा पाना मुश्किल ही नही असंभव है। क्योंकि सीटें सिर्फ 40 हैं और जिसमें से पिछली बार भाजपा ने 22 जीती थी और पासवान की लोजपा ने सात लड़कर 6 जीती थी और रालोसपा ने 3 लड़कर 3 जीती थी। यानि एनडीए की कुल जीती हुई सीट थी 31 और बाकि बची 9 सीटें और 40 में से 11 सीटें पाकर नीतीश बड़े भाई तो बिल्कुल नही बन सकते हैं। नीतीश सीट बढ़वाना चाहते हैं। कम से कम भाजपा की बराबरी पर तो वह रहेंगे ही और उधर रालोसपा और लोजपा भी अधिक की ना केवल आस लगायें हैं बल्कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसकी मांग भी कर डाली है। वहीं यदि भाजपा अपनी जीती हुई सीटें छोड़ती है तो साफतौर पर यही संदेश जायेगा कि भाजपा कमजोर हुई है और हार रही है। पूरे सीट बंटवारें को लेकर बिहार एनडीए ऐसी स्थिति में है जहां उसका टूटना लगभग तय है। देखें मोदी-शाह की जोड़ी कैसे अपने सहयोगियों को संभाल पाती है। अमित शाह बेशक कह रहे हैं कि वह नये सहयोगी जोडेंगे परंतु अभी तक तो पुरानों के भी बचे रहने की कोई गारंटी नही दिखाई पड़ रही है।