2019 चुनावों में हैंकिंग के नये खतरे

महेश राठी
क्या आपको लगता है कि एक लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनाव तानाशाह को कमजोर करते हैं?, यदि हां, तो आप गलत हैं। मौजूदा दौर में चुनाव उनकी सत्ता पर पकड़ को मजबूत करते हैं। क्योंकि उनके पास डिजीटल औजारों की शक्ल में तिकड़मों और चुनावी गडबड़ियों का टूल बाॅक्स है। जिनसे वह ना केवल नतीजों को बदल सकते हैं बल्कि आपके दिमाग को भ्रमित कर सकते हैं। हाल ही अमेरिकी सोशल मीड़िया विशेषज्ञों के एक समूह ने अमेरिकी सांसदों के सामने यह जाहिर किया कि ब्राजील और भारत के आने वाले चुनावों में रूसी हस्तक्षेप ऐसे ही डिजीटल टूल्स के सहारे इन देशों के चुनावों की हैंकिंग कर सकता है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट एंड बेलियोल कॉलेज में प्राध्यापक फिलिप एन. होवर्ड ने सोशल मीडिया मंचों पर विदेशी प्रभाव के मामलों पर सीनेट की खुफिया कमेटी की सुनवाई में यह तथ्य रखे। उन्होंने कहा कि उन देशों में हालात और अधिक खतरनाक हो सकते हैं जहां मीडिया अमेरिका जितना पेशेवर नहीं है। सीनेटर सुसान कोलिंस के एक सवाल के जवाब में होवर्ड ने यह बात कही। उन्होंने भारत और ब्राजील के चुनावों में मीडिया के जरिए हस्तक्षेप की संभावनाओं का जिक्र किया। होवर्ड ने कहा कि हम महत्वपूर्ण रूसी गतिविधि देख रहे हैं, इसलिए उन देशों के मीडिया संस्थानों को सीखने और विकसित होने की जरूरत है। ध्यान रहे कि जनवरी 2017 के आंकलन में शीर्ष अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि रूस ने 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हस्तक्षेप किया था और नतीजों को प्रभावित किया था।

सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में सूचना प्रौद्योगिकी जहां कई क्षेत्रों में वरदान साबित हो रही है तो वहीं उसके अपने खतरे भी हैं। हाल ही में चुनावों की हैंकिंग के रूपों की चर्चा जोरों से हो रही है। भारतीय संदर्भ में इसे देखें तो इवीएम हैंकिंग जल्दी ही एक बड़ा राजनीतिक सवाल बनने जा रहा है। 2 अगस्त को ही देश के लगभग 17 राजनीतिक दलों ने इवीएम पर सवाल उठाते हुए आगामी चुनावों को पेपर बैलेट से कराये जाने की मांग की है। हालांकि अभी तक सत्ताधारी भाजपा और चुनाव आयोग इस मांग को नकारते रहे हैं परंतु पहली बार यह सवाल एक व्यापक और संगठित राजनीतिक लड़ाई बनने की तरफ बढ़ती दिख रही है। ऐसे में चुनाव आयोग को इस पर फिर से विचार करना होगा। क्योंकि देश की राजनीति का इतना बड़ा हिस्सा जब आयोग द्वारा अपनायी जा रहे चुनाव कराने के तरीके पर सवाल उठा रहा है, तो आयोग के इस पर अधिक देर तक अडियल बने रहने से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठने लगेंगे। हालांकि जितना अडियल इस पर चुनाव आयोग है उससे कहीं अधिक अडियल रूख सत्ताधारी भाजपा का है। भाजपा इस सवाल पर चुनाव आयोग से भी अधिक मुखर रही है। बावजूद इसके कि विपक्ष में रहते हुए उसके बड़े नेता खुद भी इवीएम पर सवाल उठाते रहे थे और उन्होंने बेहद मुखर तरीके से इस प्रणाली पर सवाल उठाये थे। ऐसे में सत्ता में आने पर भाजपा का यूटर्न और इवीएम के सवाल पर चुनाव आयोग से भी अधिक मुखर और आक्रामक होना इवीएम पर उठ रहे सवालों को कम नही करता बल्कि और गहराता है।

बहरहाल, जहां तक सवाल हैंकिंग का है केवल इवीएम ही हैंकिंग होना का एकमात्र जरिया नही है। वर्तमान समय में हैंकिंग के कईं रूप और बेहद प्रभावी रूप समाने आ रहे हैं। अमेरिकी सांसदों के सामने सोशल मीड़िया विशेषज्ञों की चिंता के केन्द्र में हैकिंग के इन्हीं नये माध्यमों का जिक्र किया गया है। यह माध्यम हैं इंटरनेट से जुडी हुई सोशल मीड़िया की एपलिकेशन्स, जिसमें फेसबुक, ट्वीटर, यूट्यूब से लेकर ईमेल और अनेंकों अन्य साथ हैं। इसमें ना केवल राजनीतिक दलों के पक्ष में प्रचार अभियान चलाया जाता है बल्कि झूठी खबरो को गढ़ना और प्रचाारित करने से लेकर सूचनाओं की हैकिंग भी इसका एक रूप हो सकते हैं। इसे हमने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में देखा कि कैसे हैलरी क्लिंटन के व्यक्ति ईमेल्स और संदेशों की हैंकिंग की गई और उन्हें ट्रंप के पक्ष में और हैलरी के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था। यह चुनाव हैकिंग पूरी तरह से इंटरनेट पर निर्भर करती है। चुनाव हैंकिंग का यह मौजूदा दौर का सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला तरीका है। जिसके उपयोग की शुरूआत का साक्षी कुछ हद तक 2014 के आम चुनावों में रहा है। झूठे आंकड़े, जनमानस में स्थापित पुराने नेताओं और उनके परिवारों के चरित्र हनन से लेकर उनके बारे तमाम झूठी अफवाहों का फैलाये जाना, अपने पक्ष में झूठी जुमलेबाजी करना और स्वयं को एक मसीहा के तौर पर पेश करने के लिए सोशल मीड़िया पर विशेषज्ञों की एक पूरी फौज उतार देना। यह सब ऐसे नजारे और तरीके थे जिनके हम सभी साक्षी रहे हैं।

भारत के आम चुनाव 2014 में पहली बार इंटरनेट से जुडी विभिन्न सेवाओं और सोशल मीड़िया या कहें कि प्रौद्योगिकी का पहली बार व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था। और ऐसा नही है कि इसने भारतीय चुनावों पर असर नही डाला। 2014 के चुनावों में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत में इस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का बड़ा हाथ रहा है। परंतु अबकी बार जो चेतावनी अमेरिकी सोशल मीड़िया विशेषज्ञों ने दी वह अधिक गंभीर है। इवीएम के खिलाफ अभियान तो ठीक है परंतु विपक्ष को अपना अभियान केवल इवीएम तक ही सीमित नही रखना चाहिए। उसे सोशल मीड़िया और इंटरनेट के जरिये होने वाले चुनाव हैकिंग युद्ध का भी जवाब खोजना होगा।

जहां तक भारत में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की बात है ऐसा माना जाता है कि 2019 तक आते आते इनकी संख्या 520 मिलियन हो चुकी होगी और 520 मिलियन उपयोगकर्ता अर्थात चुनाव हैंकिंग का शिकार होने के लिए 520 मिलियिन की बड़ी संख्या। सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में नई पीढ़ी की पढ़ने समझने की जगह स्मार्टफोन बनता जा रहा है। यहां तक कि किसी राजनीति दल और वैचारिक समूह के साथ जुड़ने के लिए भी उसका मन मस्तिष्क यही स्मार्टफोन तैयार कर रहा है। किसी किशोर के लिए हाथ में स्मार्टफोन आ जाना उसकी दुनिया बदल जाने की तरह है। यही दुनिया उसे आंकडों की नई दुनिया गाॅसिप के नये संसार में ले जाती है। यही स्मार्टफोन और सोशल मीड़िया की दुनिया उसे आवाज देती है, दुनिया से परिचय कराती है, नये सपने दिखाती है और उसकी विचारधारा तक भी गढ़ती है। यही दुनिया उसे नया नागरिक नया मतदाता बनाती है और सोशल मीड़िया की हैंकिंग का शिकार यह नया नौजवान नये सत्ताधीशों के हाथ में देश की बागडोर सौंपने का औजार बनता है। जरूरी नही कि उसे मिलने वाली सारी सूचनाएं किसी राजनीतिक दल से मिल रही हों, यह सूचनाएं सोशल मीड़िया पर बैठे झूठी खबर गढ़ने वालों और फैलाने वाले तथाकथित निष्पक्ष विशेषज्ञों की हो जो रात दिन उसे सूचनाएं भेजकर उस भावी नागरिक का मन मस्तिष्क दूषित कर रहे हों। यदि ऐसा नही होता तो दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियां क्यों दूसरों के डाटाबेस उडाने, चुराने के अपराध में लगी होती अथवा उस डाटा की खरीद फरोख्त में लगी होती।

चुनावी हैकिंग का यह नया तरीका ही है जो एन्द्रेज सेपुलवेदा जैसे चुनावी हैंकिंग करने वाले अपराधी बना रहा है। एन्द्रेज जिसने अपनी हैकर्स की टीम के साथ लगभग आठ सालों तक लेटिन अमेरिका में आंकड़ों और सूचनाओं की चोरी से लेकर विपक्षी दलों के चुनाव अभियान में सेंध लगाने और झूठ और अफवाहों को गढ़कर और चुनाव प्रणाली में गड़बड़ियां करके लेटिन अमेरिका के कई देशों में चुनावी हैंकिंग को अंजाम दिया। यह बात अलग है कि आजकल एन्द्रेज कोलम्बिया की बोगाता जेल में दस साल की सजा काट रहा है। परंतु उसकी गिरफ्तारी और उसके द्वारा किये गये रहस्योद्घाटन ने एक ऐसे सच से दुनिया को रूबरू करा दिया जो सबकी आंखों के सामने तो था परंतु उसकी असलियत दुनिया की आंखों छूपी हुई थी।

यह केवल एक एन्द्रेज नही है जो मैदान में है। उसने तो इस कारोबार की शुरूआत की थी अब तो अनेकों एन्द्रेज और केम्ब्रिज एनेलिटिका जैसी कंपनियां मैदान है जो वादा करती हैं कि वह डाटा का उपयोग करके उसे देखने वाले का दिमाग बदल देंगी। वह बेशक सालों से रिपब्लिकन रहा हो रातों रात डेमोक्रेट हो जायेगा। ठीक उसी तरह वह पूरी जिंदगी बेशक कांग्रेसी रहा हो परंतु रातों रात भाजपा हो जायेगा। 2014 में हमने ऐसा होते भी देखा है। इसके अलावा इस पूरे चुनाव हैंकिंग बिजनेस का सबसे दिलचस्प पहलू यह भी है कि पूरी दुनिया में इसके लाभार्थी दक्षिणपंथी नेता और दल ही रहे हैं। एन्द्रेज के ग्राहकों से लेकर केम्ब्रिज एनेलिटिका के ग्राहकों तक। कारण साफ है यह पूरी लड़ाई आखिर में आर्थिक ही है और जो अधिक मुनाफे के पागलपन में कुछ भी करने को तैयार हैं, उन्हें फासीवादी तानाशाह भी मंजूर हैं और लोकतंत्र कमजोर हो जाना भी। उसके लिए चाहे कितनी ही चुनावी गडबड़ियां हों कितने ही झूठ फैलाये जायें कितनी ही अफवाहें और कितनी ही भीड़ हत्यायें।