वापस नही होगा 9 अगस्त का भारत बंद, बढ़ेंगी भाजपा की मुश्किलें

मोदी सरकार और मोदी की केबिनेट ने एससी/एसटी एक्ट को फिर से पुराने स्वरूप में लाने को मंजूरी दे दी है। इसे दलित सहयोगी पार्टियों के 9 अगस्त के भारत बंद में शामिल होने की धमकियों के मद्देनजर भाजपा सरकार की बचाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। परंतु भगवा राजनीति की चैंपियन भाजपा की राजनीतिक पृष्ठभूमि और जनता को बरगलाने के उसके अनुभवों को देखते हुए भाजपा पर विश्वास करना मुश्किल ही नही असंभव है। यदि हम बिल लाने के प्रस्ताव को केबिनेट की मंजूरी के समय को देंखे तो उस पर भी सवाल उठते हैं। असम की एनआरसी को लेकर जब देश में हंगामा हो रहा है संसद में गतिरोध है तो ऐसे समय बिल लाये जाने और उसे संसद में पारित करवाने पर सवाल उठने लाजिमी हैं। ध्यान रहेे बजट सत्र को भाजपा ने अपनी सहयोगी टीआरसी और एआईएडीएमके के साथ सांठगांठ करके किस प्रकार गतिरोध का शिकार बनाया था और ठीकरा विपक्ष विशेषकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पर फोडा था। भाजपा फिर से वही रणनीति पूरे मामले को लटकाने के लिए अपना सकती है। यह सिद्ध करने के लिए कि विपक्ष इस बिल के रास्ते में रूकावट डाल रहा है।

अब जहां तक 9 अगस्त के भारत बंद की बात है तो उसमें केवल एक एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून को फिर से उसके पुराने रूप में बहाल करने का ही मसला नही है। इसके अलावा अनेकों ऐसी मांगे हैं जिन पर भाजपा बचकर नही भाग सकती है। 9 अगस्त के इस आंदोलन की प्रमुख मांगेः

1. एक प्रमुख मांग एससी/एसटी कानून में बदलाव लाने वाले संघ के पुराने कैडर जस्टिस ए के गोयल को इस एससी/एसटी विरोधी कृत्य के इनाम की शक्ल में उनकी सेवानिवृति के दिन ही एनजीटी का चैयरमेन बनाना है। 9 अगस्त के भारत बद की एक मुख्य मांग गोयल को तुरंत पद मुक्त करना भी है।

2. 2 अप्रैल के भारत बंद में मारे गये लोगों को 50 लाख प्रति व्यक्ति मुआवजा और परिवार में एक व्यक्ति को रोजगार की मांग।

3. 2 अप्रैल के भारत बंद के नाम पर अनेकों बेगुनाह नौजवानों को बदले की भावना से जेल में डाला गया है। कुछ मामलों में तो 15 साल के बच्चे को 25 साल का दिखाकर दर्जानों गंभीर मामलों में फंसाकर उनकी जिंदगी बर्बाद करने की साजिश रची गई है। उन निरपराध नौजवानों को तुरंत बिना शर्त जेल से रिहा किया जाये और सभी मामलों की जांच करके दोषी पुलिसकर्मियों पर एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई की जाये।

4. इस कानून को कमजोर करने में सहायक जस्टिस यूयू ललित पर महाभियोग लगाकर उन्हें तुरंत सेवा मुक्त किया जाये और ललित और गोयल दोनों पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाये।

5. कानून को कमजोर करवाने में सहायक एडीशनल सोलिसिटर मनिन्दर सिंह पर कार्रवाई की जाये और किसके कहने पर उन्होंने यह किया जांच की जाए।

6. इसके अलावा एक प्रमुख मांग चन्द्रशेखर आजाद को जेल से रिहा करने की भी है। चन्द्रशेखर को जिस प्रकार फंसाया गया है उससे भाजपा और मोदी-योगी की मानसिकता की झलक मिलती है।

बहरहाल, 9 अगस्त के आंदोलन की इन तमाम मांगों के अलावा भी यह देखना महत्वपूर्ण रहेगा कि मोदी सरकार 9 अगस्त से पहले इस बिल को संसद में पेश कर पास करवाती है अथवा यह एक केबिनेटी जुमलेबाजी ही है। यदि 9 अगस्त तक यह बिल पारित नही होता है तो समझा जायेगा कि यह केवल अपनी सहयोगी दलित पार्टियों के जनाधार को बचाने की मोदी सरकार की एक और जुमलेबाजी है। यदि बिल पारित हो जाता है तो सवाल संघी गोयल और बाकि दोषियों पर कार्रवाई का रहेगा। क्योंकि गोयल पर कार्रवाई की मांग 9 अगस्त भारत बंद के आयोजकों ने ही नही की बल्कि यह मांग मोदी सरकार में उनके सहयोगी पासवान और अठावले और भाजपा नेता उदित राज ने भी की है। अब इस मांग का क्या होगा देखाना बाकि है। यह लड़ाई एक संघी बनाम दलित समुदाय बनती दिखाई पड़ती है। क्योंकि अटल बिहारी सरकार से लेकर मोदी तक सभी का इतिहास संघ के इस वफादार कैडर की वकालत करने और गोयल के गुनाहों पर पर्दा डालने और बचाने का रहा है।

अटल सरकार ने गोयल के खिलाफ आईबी की रिपोर्ट को दरकिनार करके गोयल की नियुक्ति चण्डीगढ़ हाई कोर्ट में करवाई थी तो एनजीटी में नियुक्ति का ठीकरा मोदी सरकार ने चीफ जस्टिस पर फोडकर सरकार और गोयल दोनों को बचाने का प्रयास किया है। अब देखना है कि संघ नियंत्रित मोदी सरकार गोयल को बचाने के लिए क्या दांव चलती है?