यूपी में सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद गठजोड़, भाजपा को मुश्किल होगा कोई सीट जीतना

आईएनएन भारत डेस्क
राजनीतिक हलकों और मीड़िया में यूपी में महागठबंधन बनने और सपा-बसपा-कांग्रेस और रालोद में गठजोड़ की खबरे आ रही हैं। विभिन्न टीवी चैनलों से लेकर मीड़िया सूमहों में इस गठबंधन के हो जाने की खबरे आ रही हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गठजोड़ हो जाता है तो यूपी से भाजपा का पूरी तरह से सूपडा साफ हो जायेगा। भाजपा को इस गठजोड़ के बाद यह तलाशना होगी कि कौन सी एक भी सीट वह पूरे राज्य में जीत सकती है।

असल में राजनीति के जानकारों के ऐसा मानने की वजहें भी हैं। इनमें से एक और सबसे प्रमुख वजह भाजपा के गोरखपुर जैसे अजेय किले का ढ़ह जाना और वहां भाजपा की बुरी हार होना है तो वहीं कैराना में जिस प्रकार भाजपा ने गोरखपुर की हार से सबक लेकर जीत के बड़े बडे दावे किये थे और फिर भी करारी हार का मुंह देखना पड़ा था। वह भी एक ऐसा कारण है जो कि भाजपा के लिए इस गठजोड़ का हो जाना ना केवल यूपी में बल्कि देश की राजनीति में भी सबसे बुरी खबर है।

भाजपा 2014 को दोहाराने की बाते तो करती है परंतु उसे भी मालूम है कि वह 2014 के वोट प्रतिशत के आसपास तो 2017 के विधानसभा चुनावों में भी नही पहुंच पायी थी और 2017 के बाद से उसकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आयी है। इसीलिए राजनीति के जानकार लोगों का मानना है कि 2019 में भाजपा के वोटों में 2017 के मुकाबले भी गिरावट होने वाली है। इसकी पुष्टि कुछ हद तक भाजपा अध्यक्ष के बयानों से हो जाती है। जब अमित शाह बार बार पूर्वी, उत्तर पूर्वी राज्यों और दक्षिण भारत में बढ़त की बात और उत्तरी भारत की कमी को पूरा करने की बात करते हैं। सभी जानते हैं कि भाजपा अध्यक्ष उत्तर पूर्व और दक्षिण में उत्तर भारत की गिरावट को पाटने की कोशिश में भाग दौड़ कर रहे हैं।

हालांकि जब भी भाजपा से 2017 के वोटों की कमी का हवाला देकर सवाल पूछे जाते हैं तो वह 2017 को छोड़कर फौरन 2014 के आधार चुनावी विश्लेषण शुरू कर देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि भाजपा की हालत वोटों के मामले में 2017 से भी बुरी होने जा रही है। 2017 में भी यूपी की जीत वोटों के बंटवारे के कारण ही हो पायी थी। 2017 के बाद होने वाले उप चुनावों में भाजपा की जो हालत हुई है उससे पूरा देश वाकिफ है और ध्यान रहे कि इन उप चुनावों में भी गोरखपुर और फूलपुर में कांग्रेस भी मैदान में थी।
बहरहाल, अब एक निगाह 2017 में भाजपा और महागठबंधन को मिले कुल वोटों पर डाल लें तो भाजपा की परेशानी और बौखलाहट की सारी तस्वीर साफ हो जाती है। 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को कुल 39.7 प्रतिशत वोट मिले थे। इसके अलावा सपा को मिले थे 21.8 प्रतिशत वोट और बसपा ने हासिल किये थे कुल 22.2 प्रतिशत वोट। अब इन दोनों को जोड़ दे तो बसपा-सपा को मिले कुल वोटों की गिनती बैठती है 45 प्रतिशत अर्थात भाजपा के मिले वोटों से 5.3 प्रतिशत अधिक। इसके अलावा यदि कांग्रेस और रालोद को मिले 6.3 और 1.8 प्रतिशत वोटों को भी इसमें जोड़ दें महागठबंधन को मिलने वाले वोटों का कुल आंकड़ा बैठता है 52.1 प्रतिशत। अब 52.1 प्रतिशत वोटों के सामने भाजपा के 39.7 प्रतिशत वोट कहां ठहरते हैं, यह एकदम से साफ है।

हालांकि यह 2017 के वोटों का आंकड़ा है और मौजूदा हालात में उसके प्रदर्शन को देखते हुए माना जा रहा है कि भाजपा के वोटों में और गिरावट आने वाली है। इसके अलावा सपा के साथ पीस पार्टी, निषाद पार्टी और अपना दल के कृष्णा पटेल ग्रुप और वामदलों के आने और कोई प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समझदारी बनाने की भी संभावना है, जैसी समझदारी सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गोरखपुर और फूलपुर में दिखाई थी। ऐसे हालात में जहां महागठबंधन अपने वोटों में और 3 से 4 प्रतिशत इजाफा करके 55 प्रतिशत से अधिक हो सकता है तो वहीं भाजपा का वोट 4 से 5 प्रतिशत गिरकर 35 प्रतिशत के नीचे रह सकता है। अब ऐसे हालात में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में एक भी सीट जीत सकती है। या 2019 में वाराणसी को छोड़कर मोदी कहेंगे कि अबकी बार मुझे मां साबरमती ने फिर से वापस बुलाया है।