कौन हैं विवादों के केन्द्र में आये एनजीटी प्रमुख जस्टिस ए के गोयल?

आईएनएन भारत डेस्क
ऐसा नही है कि जस्टिस आदर्श कुमार गोयल अर्थात ए के गोयल पहली बार विवादों के केन्द्र में आये हैं। जस्टिस ए के गोयल चण्ड़ीगढ उच्च न्यायालय में अपनी नियुक्ति से लेकर एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून की बेवजह और अनुचित व्याख्या करने तक हमेशा विवादों के घेरे में रहे हैं। जस्टिस ए के गोयल ने जब जस्टिस यूयू ललित के साथ मिलकर एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून में गिरफ्तारी के प्रावधानों मेे फेरबदल किये थे तभी भी कानून के कईं जानकार लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों और उनके निर्णयों पर सवाल उठाये थे।

निर्णय पर सवाल उठाने का पहला आधार कानून के कईं विशेषज्ञों ने कहा था कि यह मामला जजों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है कि वह संसद द्वारा बनाये किसी कानून की व्यख्या करें। इसके अलावा कानून के जानकारों का कहना था कि यदि इस कानून के तहत दर्ज मामलों में दोष सिद्ध कम हो रहें हैं और सजा बेहद कम मामलों में हो रही है तो यह दोष अभियोजन पक्ष का है कि उसने जांच ठीक से नही की और केस ठीक बनाने में कोताही की है। पीड़ित पक्ष के खिलाफ इस प्रकार की व्याख्या पीड़ित पक्ष को दोहरी पीड़ा पहुंचाने की तरह है।

इसके अलावा सवाल उठाने का दूसरा आधार ए के गोयल की संघ से संबद्धता और यूयू ललित के भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से पुराने रिश्तों को बताया गया था। ध्यान रहे कि ए के गोयल चण्ड़ीगढ़ में जज के रूप में नियुक्त होने से पहले तक आरएसएस के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के महासचिव थे। इसके अलावा यूयू ललित तुलसी प्रजापति मुठभेड़ काण्ड में अमित शाह की तरफ से वकील थे।

ए के गोयल की एनजीटी में नियुक्ति जितनी अब विवादों में है उच्च न्यायालय में इससे भी अधिक विवादों में रह चुकी है। ए के गोयल की नियुक्ति पर देश की आईबी ने बेहद विपरीत और तल्ख टिप्पणी की थी। जिसके बाद उस समय के देश के प्रेसिडेंट के आर नारायणन ने जस्टिस ए के गोयल की फाइल वापस कर दी थी। हालांकि बाद में उस समय के कानून मंत्री अरूण जेटली ने उन्हें क्लीन चिट देते हुए उनकी नियुक्ति की फाइल फिर से प्रेसिडेंट के पास भेजी थी।

टाईम्स आॅफ इण्डिया की 8 मई 2003 की एक रिपोर्ट में अक्षय मुकुल लिखते हैं कि उस समय की अटल बिहारी सरकार ने आईबी की रिपोर्ट को नजर अंदाज करते हुए जजों की नियुक्ति की सिफारिश को देश के प्रेसिडेंट के पास भेजा था। रिपोर्ट में अक्षय मुकुल लिखते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए यह प्रक्रिया अपनायी गईः राज्यपाल के माध्यम से राज्य सरकार ने जजों की सूची देश के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेजी गई। जहां से यह सूची कानून मंत्रालय के पास गई। इन नियुक्तियों के बारे में नियुक्ति को लेकर आईबी ने तीन काॅलम बनाये जिसमें एक पेशेवर सक्षमता दो, प्रतिष्ठा/ईमानदारी और तीन, राजनीतिक संबद्धता थे जिसमें आईबी ने पहला काॅलम खाली छोड़ा तो दूसरे काॅलम में गोयल के बारे में लिखा गया भ्रष्ट व्यक्ति और तीसरे काॅलम में उनकी संघ के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के महासचिव के बतौर विवरण दिया गया। हालांकि ए के गोयल के बारे में राजनीतिक हलकों और मीड़िया क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि गोयल राम जन्मभूमि कार सेवा में कार सेवक रहे हैं, परंतु यह एक अपुष्ट चर्चा है जिसके बारे में कुछ भी दावा किया जाना थोडा मुश्किल है। अक्षय मुकुल ने अपनी रिपोर्ट में लिख कि नियुक्ति के लिए शर्टलिस्ट किये गये जिन पांच नामों पर आईबी ने विपरीत प्रतिक्रिया दी थी उसमें से सिर्फ ए के गोयल के नाम को ही सरकार ने क्लीन चिट देकर आगे बढ़ाया और उनकी नियुक्ति हुई। इसके अलावा इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आईबी की रिपोर्ट को उस समय के कानून मंत्री अरूण जेटली ने खारिज कर दिया और उन्होंने इस रिपोर्ट को 19 मई 2001 को खारिज किया और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 21 मई 2001 को इस पर हस्ताक्षर करके फाइल को आगे बढ़ा दिया गया।

केवल टाईम्स आॅफ इण्डिया ही नही उस समय एक हिंदी दैनिक हरिभूमि ने भी इस मामले पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। हरिभूमि ने 9 मई 2003 को यह रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए शीर्षक दिया, जब राष्टपति ने जजों की नियुक्ति पर नाराजगी जतायी। ध्यान रहे कि हरिभूमि के मालिकों में से एक भाजपा नेता कैप्टन अभिमन्यू सिद्धू भी हैं। हालांकि इसके बाद इन खबरों और रिपोर्टों पर लंबे समय तक कोर्ट में मामला भी चला और कार्ट ने सरकार और पत्रकारों दोनों को इस मामले में नसीहतें दी। परंतु जस्टिस ए के गोयल की नियुक्ति पर तब भी सवाल उठे थे और आज फिर से एनजीटी में उनकी नियुक्ति पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। सरकार कितनी भी सफाई दें कि उनका नाम सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने आगे बढ़ाया है और उनकी नियुक्ति की सिफारिश की है। परंतु यह सवाल तो देश की जनता के मन में बना ही रहेगा कि इस सरकार के रहते प्रत्येक संवैधानिक पद के लिए संघियों का नाम ही क्यों आगे बढ़ाया जाता है और वह भी ऐसे व्यक्ति का जिस पर एससी/एसटी अत्याचार कानून के प्रावधानों में बदलाव का विवाद अभी थमने का नाम नही ले रहा है। मौजूदा सरकार कितनी ही सफाई दे उसकी ब्राह्मणवादी संघी मानसिकता और संवैधानिक पद पर बैठे संघी कैडर की करतूतें उसे और उसकी जातिवादी, सांप्रदायिक सोच को बेनकाब करती ही रहेंगी।