एनडीए में गैर भाजपा, गैर कुशवाह गठजोड़, पासवान-जदयू साथ, उठाये मोदी सरकार पर सवाल

आईएनएन भारत डेस्क
जनता दल यूनाईटेड ने भी रामविलास पासवान की पार्टी के सुर में सुर मिलाते हुए मोदी सरकार को एससी एसटी एक्ट पर आंखे तरेरी हैं। जदयू ने दलित एक्ट के कड़े प्रावधानों को अध्यादेश के जरिए बहाल करने की रामविलास, चिराग पासवान की पार्टी की मांग का समर्थन किया है। इसके साथ ही इस मामले पर फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एके गोयल को रिटायरमेंट के 48 घंटों के अंदर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का चेयरमैन बनाने के फैसले पर कड़ा एतराज जताया है।

दो तीन दिनों के अंदर एनडीए के भीतर प्रतीकात्मक सवालों को लेकर विरोध के सुर फूटने की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पहले उपेन्द्र कुशवाह, फिर पासवान और उनके बेटे ने मोदी सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किये तो अब जदयू नेता नीतीश कुमार ने भी पासवान के सुर में सुर मिलाते हुए ए के गोयल को हटाये जाने की मांग की है। एलजेपी नेता व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान ने शुक्रवार को मोदी सरकार को 9 अगस्त से पहले एके गोयल को एनजीटी के चेयरमैन पद से हटाने और एससी-एसटी एक्ट पर अध्ययादेश लाने का अल्टीमेटम दिया था, जिसका बिना वक्त गंवाये जदयू ने भी समर्थन कर दिया है।

असल में यह पूरी कवायद बहुजन वोटों को हथियाने अथवा उनमें फूट डालने को लेकर हो रही है। नीतीश कुमार और पासवान जानते हैं कि उनका जनाधार दलित और महादलित ही है और एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों में बदलावा से जो संदेश दलित और महादलित समाज में गया है यदि उस पर तुरंत ही कुछ नही किया गया तो उन्हें उसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है। नीतीश जानते हैं कि एनडीए में सीट बंटवारे के सवाल पर वह कुशवाह की पार्टी को अपने साथ ला नही सकते हैं और कुशवाह संभवत नीतीश को ही मुद्दा बनाकर एनडीए से बाहर जाने वाले हैं। इसीलिए वह पासवान के साथ खड़े दिखाई देकर उन्हें एनडीए में रखने और अपने पक्ष में रखने और संयुक्त रूप से भाजपा के साथ सीट बंटवारे के लिए मोलभाव कर सकते हैं।

अभी तक राजनीतिक गलियारों में सीट शेयरिंग को लेकर जो अपुष्ट फार्मूला चर्चाओं में है उसमें पासवान को फिट कर लिया जाना ज्यादा मुश्किल नही है। यदि भाजपा-जदयू 17-17 सीटों पर लड़ते हैं तो पासवान छह सीटों पर संतुष्ट हो सकते हैं। ध्यान रहे पिछली बार पासवान की पार्टी सात सीटों पर लड़ी थी और चार पर उसे जीत हासिल हुई थी।

बहरहाल, पासवान और नीतीश की इस जुगलबंदी का संकेत साफ है कि दोनों ने मान लिया है कि कुशवाह अधिक दिनों तक एनडीए में टिकने वाले नही हैं। इसके अलावा तथ्य यह भी है कि कुशवाह की नाराजगी भाजपा और एनडीए से नही बल्कि नीतीश कुमार से ही है। और कुशवाह कभी भी इस व्यक्तिगत द्वेष को छुपाते भी नही हैं। वहीं भाजपा भी जाहिर है कि कुशवाह और नीतीश में से नीतीश के साथ ही जाना पंसद करेगी और इसीलिए वह नीतीश और उपेन्द्र कुशवाह की इस तनातनी पर कुछ भी बोलने से बच रही है। शायद भाजपा नेतृत्व ने भी मन बना लिया है कि उपेन्द्र कुशवाह अंततः उसे छोड़कर ही जाने वाले हैं इसीलिए भी भाजपा नेतृत्व खोमोश है।

यही कारण है कि दलित वोट बैंक के मद्देनजर एनडीए के भीतर गैर-बीजेपी दल जदयू और लोजपा इस मसले पर एकजुट दिखाई दे रहे हैं। जदयू महासचिव केसी त्यागी ने शनिवार को दावा किया कि जब वीपी सिंह की अगुवाई में लालू यादव, शरद यादव, रामविलास पासवान सब साथ थे, तब दलित हितों की रक्षा के लिए यह कानून बना था। इसलिए आज अगर कोई भी इसमें छेड़छाड़ करता है, तो इसका विरोध होना स्वाभाविक है।

त्यागी ने आने वाले 9 अगस्त को दलित संगठनों के देशव्यापी आंदोलन में एलजेपी के शामिल होने के फैसले को भी जायज ठहराया है। उन्होंने भाजपा के दलित वोट बैंक खिसकने की चेतावनी देते हुए कहा कि जब 2019 में दलित वोट ही नहीं करेगा, तो एनडीए कहां बैठेगा। जाहिर है कि पासवान और जदयू का यह साथ आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारियों का ही हिस्सा है, जिसमें वोटों की फिक्र भी है और सीटों की चिंता भी। वैसे एनडीए को इस प्रकार की बगावतों के कई संस्करण देखने बाकि हैं क्योंकि भाजपा के सहयोगी जानते हैं कि ना तो भाजपा की और ना ही मोदी की 2014 वाली स्थिति है। इसीलिए मोलभाव के लिए दलित हितों से लेकर एससी/एसटी एक्ट और ए के गोयल सभी विवादास्पद सवाल भाजपा के सहयोगी उठा रहे हैं।