देश का सबसे बड़ा रक्षा घोटाला बनने की राह पर राफेल डील ?

आईएनएन भारत डेस्क
बिल्ली अब थैले से बाहर आ चुकी है और नरेन्द्र मोदी नीत आरएसएस नियंत्रित भाजपा सरकार की डील और केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा जोर शोर से बचाव की जा रही राफेल डील अब मोदी-निर्मला बोफोर्स डील में बदल चुकी है? राफेल अभी तक की सबसे अधिक विवादों में रहने वाली डील है। अब राफेल लडाकू विमान डील मोदी सरकार के लिए झूठ और बदनामी का पर्याय बनती जा रही है। इस डील के भावों को बढ़ाये जाने में बहुत बड़ी रकम शामिल है, सार्वजनिक क्षेत्र की हिंदुस्तान एयरोनोटिकल लिमिटेड को बाहर करके अंबानी की कंपनी को फायदा देने के कारण और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर झूठे दावे करने के कारण राफेल डील आजाद भारत के इतिहास की सबसे विवादास्पद डील बनती दिख रही है।

लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और निर्मला सीतारमण के खिलाफ राफेल डील पर सदन को गुमराह करने पर विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया गया है। माना जा रहा है कि इस सरकार के जन विरोधी कामों और आत्मघाती कृत्यों के कारण इसका शीघ्र ही पतन हो जायेगा। लोकतंत्र में सरकारें आती हैं जाती हैं परंतु आखिर में जनता शासक वर्ग के कृत्यों और चूकों का हिसाब करती है। इस बार लगता है कि जनता ने मोदी एण्ड कंपनी के पापों का हिसाब करने की ठान ली है। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव कहता है कि मोदी और सीतारमण ने लोकसभा में यह तर्क दिया है कि 2008 में भारत और फ्रांस के बीच हुआ समझौता सरकार को दामों का विवरण देने से रोकता है, हालांकि यह तर्क ठीक नही है।

जैसे ही इस विवाद ने संसद में और संसद के बाहर एक खास मोड लिया मोदी सरकार एक दस्तावेज लेकर सामने आ गयी कि उसने इस डील में 59 करोड रूपये बचाये हैं। यह दस्तावेज रक्षा मंत्रालय और भारतीय एयरफोर्स ने इसी साल तैयार किया है जो दिखाता है कि हथियारों की खरीद, रख रखाव, सिमुलेटर, मरम्मत सहायता और तकनीकी सहायता 1646 करोड़ रूपये है जबकि यूपीए के मोल भाव के समय इसकी कीमत 1705 करोड रूपये आती। एनडीए सरकार ने 36 विमानों के लिए 59 हजार करोड का भुगतान किया है, जबकि यूपीए 1.69 लाख करोड रूपये भुगतान कर रही थी। इस प्रकार एनडीए सरकार ने 59 करोड रूपये कमाये हैं। राफेल के 36 विमानों की कुल कीमत 59, 262 करोड रूपये है जबकि दस्तावेज के अनुसार यूपीए के दौरान 126 विमानों की कीमत 1,72,185 करोड रूपये थी।

किसी को समझ नही आता है कि 2014 से भारत के चार रक्षामंत्री रहे हैं, फिर प्रधानमंत्री ने राफेल डील में स्वयं मोल भाव क्यों किया। यह डील मोदी के डील करने में सक्रिय होने के बाद से हीे इस डील में एक छुपे भ्रष्टाचार होने का आभास दे रही है। जैसे नोटबंदी के मामले में हुआ, मोदी के अलावा कोई नही जानता है कि असल में फ्रांस में क्या पका। यह रहस्य क्यों? क्या यह इसलिए कि मोदी के सहयोगी विश्वसनीय नही हैं अथवा इसलिए कि मोदी 2019 में वापसी के लिए वित्तीय सहायता सुनिश्चित करना चाहते हैं। यहां यह याद रखना चाहिए कि वरिष्ठ भाजपा नेता अरूण जेटली दो बार रक्षामंत्री रहे हैं, एकबार 2014 में सरकार बनने के समय और दूसरी बार मनोहर पर्रिकर के गोवा के मुख्यमंत्री बन जाने पर। जेटली से निर्मला सीतारमण ने रक्षामंत्री का कार्यभार लिया। उनमें से किसी को भी विश्वास में नही लिया गया।

जब लडाकू जहाज राफेल की पहली खेप भारत में सितंबर 2019 में आयेगी, उस समय राहत की बात यह होगी कि उस समय तक आरएसएस-भाजपा की जन विरोधी नीतियों वाली और भ्रष्ट सरकार की जगह नई सरकार आ चुकी होगी। शायद तब तक उनके खिलाफ जांच हो और मोदी एण्ड कंपनी 50 हजार करोड के घोटाले में दोषी साबित हो चुकेगी।

एनडीए झूठ फैला रही है

जब रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में दावा किया कि राफेल डील अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में सामने आयी थी, जबकि रिकाॅडर्स साक्षी हैं कि एमआरसीए लडाकू जहाज की खरीद का मामला 2007 में शुरू हुआ था जबकि यूपीए की सरकार थी। 2011 में भारतीय वायु सेना ने यूरो लडाकू टायफून और दसों राफेल पर फोकस केन्द्रित किया और बाकि दावेदारों के दावे खारिज कर दिये। जनवरी 2012 में भारतीय वायु सेना ने लागत के आधार पर राफेल की खरीद का निर्णय किया। ऐसे में अटल बिहारी सरकार कहां से डील में अथवा राफेल खरीद में आ गयी।

डील में 126 राफेल जहाजों की खरीद की बात की गई जिसमें से 18 राफेल फ्रेंच कंपनी को उडने वाली हालत में देना था और बाकि 108 भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनाॅटिकल लिमिटेड में बनाये जाने थे।

पहली डील में राफेल सौदे में प्रौद्योगिकी स्थानान्तरण की शर्त थी जबकि मोदी सरकार के तहत समझौते में फ्रेंच कंपनी पर ऐसी कोई शर्त लागू नही है। अंबानी की कंपनी जिसको मोदी के पेरिस दौरे से दस दिन पहले ही बनाया गया के साथ एक प्राइवेट डील की गई। ऐसी भी रिपोर्टे हैं कि फ्रेंच प्रेसीडेंट मेक्रोन ने स्वयं साफ किया कि कोई गुप्त समझाौता नही है। हालांकि किसी फ्रेंच व्यक्ति ने सुरक्षा कारणों से मामले को गुप्त बनाये रखने की बात नही की है गुप्त रखने की बात कंपनी अपने बिजनेस कारणों से चाहती है।

मार्च 2018 के समझौते में भ्रष्टाचार ?

हालांकि मोदी सरकार लगातार 2008 के सौदे के हवाले से गोपनीयता बनाये रखने का तर्क दे रही है, सुरक्षित वर्गीकृत आंकडों को गुप्त रखने का समझौता 10 मार्च 2018 को हुआ, जिस पर राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने हस्ताक्षर किये। फ्रेंच प्रेसिडेंट की यात्रा के समय 28 मार्च 2018 को सुभाष भामरे ने लोकसभा में कहा यह समझौता एकसमान सुरक्षा नियमों को परिभाषित करता है जिसमें दोनों देशों के बीच वर्गीकृत सुरक्षित सूचनाओं का लेन देन लागू होता है।

रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण डील विवरण देने से इंकार कर चुकी हैं, यह कहकर कि इसमें देश की सुरक्षा संलिप्त है। बाद में वह दोनों सरकारों के बीच गोपनीयता बनाये रखने वाले समझौते की बात करती हैं। लोकसभा में उनका जवाब इसे साफ करता है कि ऐसी गोपनीयता की कोई शर्त समझौते पर हस्ताक्षर करते समय नही थी। यह शर्त डील होने के डेढ़ साल बाद आयी।

‘‘ना खाउंगा, नही खाने दंूगा‘‘ का जुमला बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ठीक उसी प्रकार से पनामा पेपर्स पर भी खामोश हैं जिसमें अरबों रूपये विदेशी बैंकों में जमा हैं। वह जान बूझकर बिरला सहारा डायरियों पर भी खामोशी बनये हुए हैं। किसको मिस्टर प्रधानमंत्री मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं।