जयंत चौधरी संभाल सकते हैं रालोद की कमान और अजीत सिंह की विरासत

आईएनएन भारत डेस्क
बागपत चुनाव समीक्षा के लिए पहुंचे रालोद अध्यक्ष अजीत सिंह ने कहा कि वह 2019 लोकसभा का चुनाव नही लडेंगे। छह बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजीत सिंह ने यहां पार्टी की बैठक में कहा कि वह अब 80 साल के हो चुके हैं और अब आगामी लोकसभा चुनाव नही लडेंगे। ध्यान रहे पिछले 2014 के लोकसभा चुनावों में चौधरी अजीत सिंह को मुम्बई पुलिस कमिश्नर रहे और पहली बार चुनाव लड रहे सतपाल सिंह ने हरा दिया था।
हालांकि इससे पहले भी एक बार उन्हें भाजपा के पूर्व नेता और पूर्व कृषि मंत्री रहे सोमपाल शास्त्री इस सीट से हरा चुके हैं। परंतु बावजूद दो हार के भी अजीत सिंह पश्चिमी उतर प्रदेश के इस जाट बहुल इलाके के प्रभावशाली नेता हैं। अजीत सिंह की इस घोषणा के पीछे कयास लगाये जा रहे हैं कि वह अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र जयंत चौधरी को सौंपना चाहते हैं। माना जा रहा है कि जयंत ना केवल बागपत से आगामी लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं बल्कि वह औपचारिक रूप से रालोद की कमान भी संभाल सकते हैं।

पश्चिमी उतर प्रदेश का जाट समुदाय भी जयंत चौधरी में काफी संभावनाएं देखता है और चौधरी चरण सिंह के पौत्र के प्रति काफी सम्मान का भाव भी रखता है। जयंत चौधरी की छवि भी राजनीतिक हलकोें में एक विश्वसनीय और शांत एवं समझदार नेता के रूप में जानी जाती है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि जयंत चौधरी में इतनी योग्यता है कि वह रालोद की कमान संभालने के बाद लोकदल का खोया हुआ आधार वापस ला सकते हैं। अजीत सिंह की आज की घोषणा को लोकदल में पीढ़ीगत बदलाव की शुरूआती घोषणा के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि अजीत सिंह ने कोई राजनीति से सन्यास जैसी घोषणा नही की है परंतु यदि आप चुनावों की दौड़ से बाहर हो जाते हैं तो यह सन्यास की तरफ बढ़ने का कदम ही माना जाता है।

इसके अलावा अजीत ने एक अन्य अहम बात कही कि इस दौर में अकेले चुनाव लड़ने का अर्थ है पार्टी का वजूद खत्म करवाना। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस तथ्य को वह और उनकी पार्टी नही बल्कि सभी दल समझ रहे हैं। अजीत सिंह के इस बयान से प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है जिससे साफ पता चलता है कि अजीत सिंह की पार्टी आगामी लोकसभा चुनावों में सपा, बसपा और कांग्रेस के महागठबंधन का हिस्सा होंगे। वैसे भी जयंत चौधरी, राहुल गांधी और अखिलेश यादव के आपसी रिश्तों के मद्देनजर भी रालोद को महागठबंधन के हिस्से के तौर पर ही देखा जा रहा है। कांग्रेस, सपा और रालोद तीनों ही दल एक पीढ़ीगत बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं और ऐसे में इन पुरानों दलों की नयी पीढ़ी का आपसी समन्वय और अपसी विश्वास नये दौर की नयी राजनीति की आहट है, जो देश की राजनीति में आयी मौजूदा दक्षिणपंथी करवट को खत्म करके एक नयी धर्मनिरपेक्ष, जनवादी और उदार राजनीति की पटकथा लिखने में सक्षम है। बेशक अजीत सिंह एक क्षेत्रीय और जातीय नेता माने जाते हों परंतु अजीत सिंह की इस पार्टी बैठक में की गई घोषणा के बड़े राजनीतिक अर्थ हैं।