मोदी के लिए बोफोर्स बन जायेगा राफेल?

आईएनएन भारत डेस्क
28 मार्च 2015 को अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस पंजीकृत होती है। दो हफ्ते के भीतर उसे मोदी 600 करोड़ रुपये में एक राफेल विमान की पुरानी डील को रद्द कर नई डील करते हैं कि 1500 करोड़ में एक राफेल विमान खरीदेंगे। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को हटाकर रिलायंस डिफेंस कंपनी को इस डील का साझीदार बना दिया जाता है। इसमें घोटाला है।

भारत की राजनीति में राफेल घोटाला नया तूफान लेकर आने वाला है और किसी जमाने में बोफोर्स घोटाले के सहारे अपनी राजनीति चमकाने वाली भाजपा के लिए राफेल इस दौर का बोफोर्स सिद्ध होने की राह पर है। भाजपा ने जिस प्रकार संसद में आक्रामक तेवर दिखाने की कोशिश राफेल के मामले पर की उससे भाजपा यह सिद्ध कर पाने में नाकाम रही है कि राफेल में सब कुछ पाक साफ ही है।

दरअसल, भाजपा ने पुरानी रणनीति आक्रमण ही सुरक्षा को अजमाया परंतु हर मोर्चे पर जरूरी नही है कि आक्रमण ही बचाव बन सके। वास्तविकता और तथ्यों की सच्चाई ही आखिरी सच्चाई होती है। अब कांग्रेस ने विपक्ष के साथ मिलकर इस मामले पर सरकार को निर्णायक रूप से घेरने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। जिस रणनीति के तहत उसने पूर्व रक्षामंत्री ए के एंटोनी को मैदान उतारा है और उनके कार्यकाल में हुई राफेल डील के तथ्यों का खुलासा भी किया है। फ्रेंच कंपनी दसों की बोली सबसे कम थी और साथ ही भारत के लिए कई अन्य लाभ से भरी हुई थी, क्योंकि दसों दिवालिएपन की कगार पर थी और इस सौदे के बिना एक रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में फ्रांस का भविष्य खतरे में था। ब्राजील और संयुक्त अरब अमीरात में राफेल का निर्यात करने के असफल प्रयासों के बाद दसों ने यह सौदा किया। यहां तक कि इससे चीन भी नर्वस था।

एंटोनी के बताये गये तथ्यों और राजनीतिक हलकों में चर्चाओं और सोशल मीड़िया और कुछ समाचार पत्रों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि मोदी ने पूरी तरह से मूल सौदे को बदल दिया और घोषणा कर दी कि वह 36 रेडी-टू-फ्लाई विमान मूल सौदे की कीमत से लगभग 3 गुना ज्यादा दामो में फ्रांस से खरीदेंगे। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत को दसों द्वारा दिये जाने वाले अन्य लाभ जिनकी बदौलत दसों ने ये बोली जीती थी वह सब अब इस सौदे का हिस्सा ही नही थे।

आप खुद ही सोचे कि लगभग डालर 8.9 बिलियन में 36 विमान वह भी सिर्फ 5 साल के रखरखाव के साथ लिए, बिना तकनीकी हस्तांतरण के जब कि लगभग उतने ही रुपयों में 126 जेट 40 साल के रखरखाव के साथ मिलने थे, तकनीकी हस्तांतरण के साथ। ये घोटाला नहीं तो क्या है?

अगर भारत की वायु श्रेष्ठता कम होना मुद्दा था तो एक कंपनी (दसों) के साथ जाने के बजाय भारत यूरोफाइटर टाइफून के लिए भी बातचीत कर सकता था क्योंकि एआईएफ ने केवल वित्तीय बोली-प्रक्रिया में फायदे के आधार पर राफेल को फाइनल किया था जबकि वह फायदा अब नही हो रहा था।

रिलायंस और दसों का ये संयुक्त उद्यम पहले चरण में विमान के स्पेयर पार्ट्स बनाएगा और द्वितीय चरण में दसों एयरक्राफ्ट का निर्माण शुरू करेगा। अभी यह अंत नहीं है, रिलायंस भारतीय वायु सेना के लिए मिसाइलें भी बनाएगा। आइए हम रॉफेल सौदे की ऑफसेट रकम के निवेश पर वापस ध्यान दे। कुल मूल्य का 50 प्रतिशत लगभग 30,000 करोड़ है। रिपोर्टस के मुताबिक रिलायंस को 30,000 करोड़ रुपये में से 21,000 करोड़ मिलेंगे।

मेक इन इंडिया के तहत इतनी बड़ी निवेश योजना में इतनी गोपनीयता क्यों रखी गयी? दसों को पूरी राशि का निवेश करने के लिए क्या समय सीमा दी गयी है? सच यह है की रिलायंस इस सौदे से लगभग 1. 9 अरब यूरो कमाएगा (भारतीय रुपये के अनुसार लगभग 1,42,97,50,00,000 रुपये) कुछ ज्यादा नही है।

दसों-अम्बानी की साझेदारी ने सब कुछ बदल दिया, जो दसों 126 राफेल लगभग 10 से 12 अरब अमेरिकी डॉलर में देने को तैयार था जिसमे 18 उड़ान भरने के लिए तैयार हालत में और 108 एचएएल द्वारा भारत में तैयार किये जाने थे। उसने अब टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और हथियार सिस्टम के लिए अतरिक्त पैसे की मांग की और सौदे को 18-22 अरब डॉलर तक ले गए। उन्होंने एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा बनाये गए विमानों की कोई गारंटी देने से भी इनकार कर दिया। संक्षेप में, उन्होंने मूल कॉन्ट्रैक्ट के प्रत्येक खंड को तोड़ दिया। अंबानी-जो कि शायद भाजपा के सबसे अधिक नेताओं के मालिक है, और इसलिए कहा जाता है की वह सरकार का स्वामित्व भी करते है, अब वो दसों के पार्टनर थे। अब दसों-अंबानी ने सौदे से अधिक लाभ लेने के लिए भारतीय सरकार में दबाव डालना शुरू कर दिया।

ऐसा क्यों किया? लालच, जाहिर है! जब दसों ने बोली में हिस्सा लिया था तब वह फायदे में नहीं था और अगर उसे कॉन्ट्रैक्ट नही मिलता तब भी उसके पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था। दसों निराश था, अपने व्यापार में गैर-पारदर्शी होने के कारण ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा एफसीएसएएम (सबसे खराब रेटिंग) दी गयी थी।

असल में यह राफेल डील यदि इतनी सीधी और सच्ची है तो मोदी सरकार इस पूरे सौदे की शर्तों पर बात करने और पूरे सौदे के खुलासे से बच क्यों रही है। इस डील के हो जाने के बाद में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार इस डील के विवरण का खुलासा करने को तैयार है। परंतु बाद में वह अपनी बात से यू टर्न ले गयी और इस डील के विवरण को सार्वजनिक करने से सुरक्षा को खतरा बताने लगी। इस डील का विवरण सार्वजनिक करना देश की सुरक्षा के लिए इतना बड़ा खतरा है कि सरकार इस विवरण को रक्षा मामलों की संसदीय समिति के साथ भी साझा करना नही चाहती है। वहीं इस डील के हिस्सेदार रिलायंस डिफेंस के साथ डील का विवरण साझा करने में देश की सुरक्षा को कोई खतरा नही है। जाहिर है अंबानी परिवार देश के चुने हुए सांसदों और संसद से अधिक विश्वसनीय और देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं। वह जानेंगे डील क्या परंतु पूरा देश अंधेरे में रहेगा। यह ऐसे सवाल हैं जिनका सरकार को आने वाले दिनों में सामना करना है और जो मोदी सरकार की विश्वसनीयता पा केवल सवाल खड़े करेगा बल्कि मोदी के राजनीतिक भविष्य एक नया और बड़ा बोफोर्स मामला सिद्ध होगा। क्योंकि यह मामला प्रधानमंत्री द्वारा किसी रक्षा मामलों की फाइल को क्लियरेंस देने अथवा डील को हरी झण्ड़ी दिखाने का नही बल्कि खुद दूसरे देश जाकर सक्रियता से डील करवाने और सीधे डील में शामिल होने का है।