एनडीए के लिए मुश्किल है कुनबा बचाना, कुशवाह ने दिखाई महागठबंधन के प्रति नरमी, दिया आगामी राजनीति का इशारा

आईएनएन भारत डेस्क
अविश्वास प्रस्ताव पर तमाम तरह की चर्चाओ का बाजार गर्म है। मीड़िया सबसे अधिक राहुल के मोदी के गले पड़ने और मोदी के दो घण्टे तक चले भाषण और एनडीए को मिले 325 विश्वास मतों तक ही सारी चर्चाओं को सीमित रखना चाहता है। परंतु इस सबसे अहम सवाल और वो अहम संकेत हैं जो भाजपा की सहयोगी पार्टियों के नेताओ ने अपने भाषणों और तेवरों से दिखलाये हैं। इसमें भी केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह का भाषण और उनकी पार्टी के नेताओं द्वारा पिछले दिनों दिखाये गये तेवर साफ जाहिर करते हैं कि उपेन्द्र कुशवाह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी अघिक दिनों तक एनडीए में टिकने वाली नही हैं।

उपेन्द्र कुशवाह का अविश्वास प्रस्ताव पर दिये गये भाषण में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने अपने पूरे भाषण में कहीं भी अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले विपक्ष पर हमला नही बोला। उन्होंने बेहद सधे अंदाज में बोलते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त करने आये है। साथ ही उनके भाषण में लगातार वह बिहार और बिहारी विकास और साथ ही नीतीश का नाम लिये बगैर नीतीश के विशेष राज्य के दर्जे की मांग पर जोर देते रहे। उन्होंने अपने आप को बेहद आशावान दिखाते हुए बार बार बिहार के विकास को लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री के नेतृत्व के प्रति अपनी आशा बनाये रखने का दम भरा। इसके अलावा विपक्षी महागठबंधन पर हमला तो छोडिये उन्होंने विपक्ष से यह सवाल तक नही उठाया कि वह क्यों बेवजह यह अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया है।

उपेन्द्र कुशवाह बेशक एनडीए का हिस्सा हैं परंतु उनकी नीतीश कुमार से बेरूखी और लालू यादव से करीबी से सभी वाकिफ हैं। ध्यान रहे, राजद सुप्रीमो लालू यादव जब दिल्ली एम्स में इलाज कराने के लिए आये थे तो सबसे पहले जाकर मिलने वालो में रालसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाह ही थे। उसके बाद राजद नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी कुशवाह की खुलकर तारीफ की थी। इसके अलावा भी तेजस्वी कईं अवसरों पर कुशवाह को सार्वजनिक तौर पर महागठबंधन में शामिल होने की पेशकश कर चुके हैं। हालांकि कुशवाह ने इस पेशकश को औपचारिक रूप खारिज ही किया है परंतु उसके बाद भी तेजस्वी उन्हें यह पेशकश गाहे बगाहे देत ही रहते हैं। परंतु अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में उपेन्द्र कुशवाह के भाषण ने साफ कर दिया है कि वह औपचारिक रूप से कुछ भी कहें परंतु उनका रवैया महागठबंधन के प्रति नरमी भरा है।

इसके अलावा पिछले दिनों रालसपा की बिहार ईकाई ने शाह और नीतीश की मुलाकात के बाद जिस प्रकार से जदयू से अधिक लोकसभा सीटों की मांग कर दी है उससे साफ जाहिर है कि बिहार में नीतीश को चुनौती देने और किसी भी सूरत में नीतीश के छोटे भाई बनने के लिए तैयार नही हैं। एक अंग्रेजी दैनिक को दिये गये अपने साक्षात्कार में बिहार में उनकी पार्टी के बड़े नेता और रालोसपा के उपाध्यक्ष जितेन्द्र नाथ ने साफ कहा कि हमें जदयू के मुकाबले अधिक सीटें लोकसभा में लड़ने के लिए चाहिएं। उन्होंने कहा कि जदयू ने पिछले लोकसभा में केवल दो सीटें हासिल की थी जबकि रालोसपा को 3 सीटें हासिल हुई थी। इसके अलावा उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी रालोसपा की लोकप्रियता सूबे की राजनीति में बढ़ी जबकि नीतीश कुमार की लोकप्रियता का ग्राफ ना केवल नीचे गिरा है बल्कि उनकी साख को भी भारी नुकसान पिछले दिनों हुआ है।

ध्यान रहे कि जितेन्द्र नाथ ने पिछले दिनों सूबे में अन्य वंचित तबकों के साथ मिलकर एक वंचित वर्ग मोर्चा का गठन भी किया था। जिसने राज्य में कईं तरह से पिछडा राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास किया है। यह भी गौरतलब तथ्य है कि नीतीश और उपेन्द्र कुशवाह का तमाम राजनीतिक गणित और राजनीतिक आधार एकसमान सामाजिक आधार पर ही टिका हुआ है। उनकी पार्टी का दावा है कि पिछडे वोट में कुर्मी, कहार, कोरी और धानुक जातियों का हिस्सा 20 प्रतिशत है और उनमें उपेन्द्र कुशवाह और उनकी पार्टी ने पिछले दिनों काफी पैठ बनाई है जबकि नीतीश कुमार की विश्वसनीयता को हुए नुकसान के कारण उनका जानधार कुछ कमजोर जरूर पड़ा है। इसके अलावा सूबे के अल्पसंख्यक वोटों से भी नीतीश को अधिक आशा नही रखनी चाहिए माना जा रहा है वह पूरी तरह से महागठबंधन के पक्ष में लामबंद हो रहा है।

अब जहां तक जदयू और भाजपा के सीट बंटवारे को सवाल है तो यह देखना रोचक होगा कि भाजपा अपनी 22 जीती हुई सीटों में से जदयू के लिए कितनी छोड़ने के लिए तैयार होगा। जदयू के सूत्रों का कहना है कि 17 सीटों से कम पर जदयू मानने वाला नही है। इसके अलावा बिहार में जदयू के बडे भाई होने का दावा करने अर्थ है कि उसे एनडीए में सबसे अधिक सीटें लड़ने के लिए चाहिएं। ऐसी स्थिति में पासवान और कुशवाह के हिस्से में से भी कटौती तय है। इसकी भनक लगने के कारण ही कुशवाह ने यह जदयू से अधिक सीटों की मांग करके भाजपा के लिए चुनौती को ना केवल और अधिक गंभीर बल्कि कभी नही सुलझने वाली असंभव पहेली बना दिया है। जिसमें एनडीए से एक या दो दलों का आगामी चुनावों में छिटक जाना तय है। और उपेन्द्र कुशवाह के अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में दिये गये भाषण ने बता दिया है कि उनकी क्या तैयारी है और उनका रूख असल में क्या है। वह बेशक संसद में मोदी के नेतृत्व में विश्वास जताते रहे मग रवह खुद भी जानते हैं कि यह विश्वास अधिक दिनों तक बने रहने वाला नही है।