राजनाथ सिंह के भाषण ने दिया हत्यारी भीड़ को समर्थन का कुतर्क

देश के गृहमंत्री ने अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए मोब लिंचिंग पर सख्त कार्रवाई करने की बात कही और हमेशा की तरह जुमला छोड़ा कोई बख्शा नही जायेगा। वहीं दूसरी तरफ अलवर जिले में जहां पिछले साल पहलू खान का कत्ल हुआ था उसी जिले में अब अकबर की माब लिंचिंग कर दी गई। गृहमंत्री ने शाम के पांच बजे के लगभग मोब लिंचिंग पर सख्ती की बात कही। उसके कुछ ही घण्टों के बाद मोब लिंचिंग में हरियाणा के नूहं जिले का अकबर मारा गया।

अकबर खान मूलरूप से हरियाणा के कोलागांव का रहने वाले थे। वो अलवर जिले के रामगढ़ थानाक्षेत्र के लल्लावंडी गांव से जब गुजर रहे थे तो कुछ लोगों ने उन्हें गौ तस्कर और गाय को मारने वाला कहते हुए घेर लिया और भीड़ ने बर्बरता से उनकी पिटाई शुरू कर दी। भीड़ ने अकबर को इतना मारा कि उनकी मौत हो गई।

असल में भगवा राजनीति जब सख्ती की बात करती है तो उसमें एक ऐसा पेंच जरूर जोड देती है जो मोब लिंचिंग को बढ़ावा देने के लिए काफी होता है। कल भी गृहमंत्री और बाद में एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल ने यही किया। उन्होंने पहले मोब लिंचिंग की निन्दा की और इस पर सख्ती की बात की तो वहीं कहा कि यह सब पहले भी होता रहा है 1984 सबसे बड़ी मोब लिंचिंग थी। गौरक्षा के नाम पर मारे जाने वाले लोगों और मोब लिंचिंग की तुलना 1984 से करने का अर्थ है कि आप कह रहे हैं कि तब आपने मोब लिंचिंग की थी और अब क्यों इस पर सवाल उठा रहो हो। इन तर्को को आगे बढ़ाते हुए वह भूल जाते हैं कि देश की विभिन्न अदालतों में कम से कम चार दर्जन संघ से जुडे लोगों पर 1984 की मोब लिंचिंग के मामले चले थे। इसके अलावा कुछ ऐसे ही तर्क भगवा उन्मादी 2002 के नरसंहार पर भी देते रहे हैं। उसकी तुलना भी वह फौरन 1984 से शुरू कर देते हैं। जिसमें एक छुपा हुआ भाव रहता है कि जब तुमने 1984 में मोब लिंचिंग की थी तो हमारे करने पर क्यों शोर मचाते हो। क्योंकि हिंसा और हत्या की निन्दा के बाद उसे फौरन उसके जैसे किसी काण्ड़ से तुलना का अर्थ है कि आप उसमें से एक हिंसा के साथ खड़े हैं। हिंसा और हत्या की कोई किसी से तुलना ही नही हो सकती है।

नरसंहारों और हत्याकाण्ड़ों की तुलना की अपना एक डायनिमिक्स होता है। यह तुलना बड़े नेता से शुरू होकर उन्मादी राजनीति के नीचले कैडरों तक जाकर उन्हें हत्याकाण्ड़ के लिए प्रेरित करती है। यह हत्याकाण्ड़ों की तुलना हत्याकाण्डों को न्यायोचित ठहराने की पुरानी दक्षिणपंथी प्रतिक्रिवादी विद्या है। जब कहीं भी आपद सार्वजनिक रूप से ऐसे हत्याकाण्ड़ की निन्दा करते हैं अथवा इन नरंसहारों को सार्वजनिक बहस में लाते हैं तो इन नरसंहारों के समर्थक फौरन ऐसे ही उन्मादी कुतर्कों का सहारा लेते हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं अर्जुन मेघवाल जिन्होंने अकबर खान की हत्या पर प्रतिक्रिया देते हुए पहले निन्दा की और फिर गृहमंत्री राजनाथ सिंह के तथाकथित सधे हुए भाषण के दौरान दी गई तुलना को उद्धृत कर दिया। अलवर जिले में हुई इस घटना पर केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि हम मॉब लिंचिंग की निंदा करते हैं, लेकिन यह अकेली घटना नहीं है। आपको इसे इतिहास में वापस ढूंढना होगा। ऐसा क्यों होता है? इसे किसको रोकना चाहिए? 1984 में सिखों के साथ क्या हुआ, इस देश के इतिहास की सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग थी।

अर्जुन मेघवाल कानून की शपथ लेकर बने मंत्री हैं तो उनकी बाध्यता है कि वह इस काण्ड़ की निन्दा करेंगे अन्यथा मामला अदालत में जा सकता है और उन्हें संभवत पद भी गंवाना पड जाये। परंतु जब यही तर्क उन्मादी भगवा राजनीति के राजनाथ सिंह और मेघवाल के कैडरों और समर्थकों तक पहुंचता है तो उसमें से निन्दा करने की बाध्यता खत्म हो जाती है और बचता है उनकी हत्या और हमारी हत्या का कुतर्क। हत्याओं को न्यायोचित ठहराने का तर्क, 1984 वाली हत्यायें उन्होंने की और अब हमारी बारी है। संघी गिरोह ने 1984 को अभी तक 2002 के नरंसंहार को न्यायोचित ठहराने के लिए इस्तेमाल किया अब उसका इस्तेमाल मोब लिंचिंग के बचाव के लिए किया जायेगा।

यह कुतर्क अकेले काम नही करते हैं। इसके पीछे गलत अफवाहें और मनगढ़ंत अवधारणाओं की एक पूरी योजना काम करती है। कईं सालों से जिस प्रकार कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों को मुस्लिमवादी या मुस्लिमपरस्त पार्टियां ठहराने के लिए मोदी से लेकर सभी भाजपाई और संघी लगे हुए हैं, राजनाथ का संसद में दिया गया और मेघवाल द्वारा अकबर की हत्या पर दोहराया गया कुतर्क उसी का हिस्सा है। आने वाले दिनों में संघी कैडर मोब लिंचिंग का बचाव इसी तर्क के साथ करता दिखाई देगा।

मीड़िया के कईं हिस्सों में यहां तक कि सबसे निष्पक्ष और धर्मनिरपेक्ष टीवी चैनल का भ्रम पैदा करने वाले एनडीटीवी पर भी राजनाथ सिंह के भाषण को एक बेहद सधा हुआ भाषण बताया गया। बेशक राजनाथ सिंह का भाषण बेहद सधा हुआ था परंतु उससे मोब लिंचिंग में मारे गये लोगों को न्याय नही उनकी हत्यारी संघी भीड़ को अपने कुकृत्यों को न्यायोचित ठहराने का कुतर्क हासिल हो गया है।