बर्ताव ‘‘बाजीगराना‘‘

आईएनएन भारत डेस्क
जिस प्रकार का अंदाज प्रधानमंत्री मोदी ने कल संसद में राहुल गांधी की नकल उतारने में दिखाया वह सचमुच प्रधानमंत्री पद की गरिमा को तार तार कर देने वाला था। राजनीतिक हलकों से लेकर आम जनता के बीच मोदी के इस अंदाज को बर्ताव ‘‘बाजीगराना‘‘ कहकर बुलाया जा रहा है।

जहां राहुल के गले मिलने को लेकर लोकसभाध्यक्ष ने इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा के विपरीत बताया तो वहीं मोदी के व्यवहार पर लोकसभाध्यक्ष हमेशा की तरह खामोश थी। अध्यक्षा के व्यवहार पर भी राजनीतिक हलकों को चर्चाएं गर्म हैं कि या तो लोकसभाध्यक्ष इस पर कुछ बोलने से डरती हैं अथवा उनका राजनीतिक प्रशिक्षण इस बाजीगरपन को जायज मानता है।

इसके अलावा बहस के बाद राहुल गांधी पर हमला बोलते हुए जिस प्रकार भाजपा के युवा सांसद और बीसीसीआई के अध्यक्ष पद से सुप्रीम की कईं फटकार खाने के बाद हटे अनुराग ठाकुर का व्यवहार भी आम लोगों कंे बीच चर्चा में है। जिस प्रकार उन्होंने अपनी सीट छोड़कर आगे निकलकर कहा कि राहुल को बुलाओ यहां पेश करो लगता था कि मोब लिंचिंग करने वाली भीड़ का मुखिया शिकार पर निकल आया था।

बहरहाल, जब टीडीपी के श्रीनिवासन ने प्रधानमंत्री मोदी को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू किया तो लोकसभाध्यक्ष ने फौरन उनका समय खत्म घोषित करके वोटिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी जिससे जाहिर होता है कि ऐसा नही है कि इस भाषा के गुनाह को लोकसभाध्यक्ष समझती नही हैं। बस फर्क इस बात का है कि यह किसके खिलाफ बोली जा रही है। यदि भाजपा के नेता बोलें तो सब ठीक और विपक्ष ने उस भाषा का इस्तेमाल किया तो गरिमा गरिमा का खेल शुरू।

वहीं भारतीय मीड़िया ब्राह्मणवदी गुलामी की सारी हदों को लांघ चुका है। मीड़िया की मौजूदा गुलामी ना केवल सरकारी भोंपू बनने की सारी हदें पार कर रही हैं बल्कि इस देश के लोकतंत्र को दागदार करने वाली है। आज कईं अखबारों ने राहुल गांधी की कुछ तस्वीर छापकर उसे बर्ताव ‘‘बचकाना‘‘ बताया मगर किसी भी समाचार पत्र में इतनी हिम्मत नही थी कि वह संसद में मोदी की बाजीगरी को बर्ताव ‘‘बाजीगराना‘‘ बता सके। यहां के तथाकथित प्रगतिशील मीड़िया को अमेरिकी मीड़िया से सीखना चाहिए कि प्रेस की आजादी क्या है और कैसे राजनीतिक निरंकुशता और अराजकता को बेनकाब किया जाता है।