उनकी जुमलेबाजी और झूठ की कोई थाह नही

देश के प्रधानमंत्री ने पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का शिलान्यास करते हुए फिर एकबार मुस्लिम महिलाओं और तीन तलाक का राग छेडा और कांग्रेस को निशाना बनाते हुए स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाली पार्टी को केवल पुरूषों और वह भी मुस्लिम पुरूषों की पार्टी बताने का प्रयास किया। जाहिर है देश में उनके भक्तों की अच्छी खासी संख्या है और वह उनके किसी भी जुमले पर विश्वास करने को आतुर रहते हैं। परंतु क्या उनकी यह जुमलेबाजी देश के सबसे प्रतिष्ठित पद पर विराजमान एक व्यक्ति की गरिमा के अनुकूल है। चलिए गरिमा को उनसे जोडकर देखना छोड देते हैं। परंतु क्या उनका बयान तथ्यात्मक रूप से ठीक है। उसकी थोडी पडताल करना यहां जरूरी है।

पहला, तथ्य तो उनसे एक संघ प्रचाारक होने के नाते पूछा जाना चाहिए कि आजतक संघ की शाखाओं में महिलाओं को शामिल होने और प्रचारक या संघ प्रमुख अथवा सह प्रमुख बनने की छूट क्यों नही है। क्या उनके मातृ संगठन के सारे निर्णय अथवा उनके आदर्श मनुवादी समाज के सारे निर्णय करने का ठेका अनंतकाल तक पुरूषों का ही रहेगा। थोडा बराबरी का अधिकार महिलाओं को वहां भी होना चाहिए कि नही कभी एक दो जुमले माननीय प्रधानमंत्री इस पर भी छोड़ दे ंतो भारतीय समाज के समावेशी विकास के लिए यह ठीक होगा।

दूसरा, देश में छोडी गयी महिलाओं की संख्या एक आंकडे के अनुसार पच्चीस लाख के आसपास हो चुकी है। ऐसी महिलाएं जिनके पति बगैर किसी कारण के और बगैर तलाक दिये अपनी पत्नियों को छोड़कर भाग गये और ऐसी मांए जिनकी औलादों ने उन्हें बेघर कर दिया अथवा ऐसी विधवा औरतें जिनकी जिम्मदारी ना यह हिंदू समाज लेना चाहता है ना ही उनका परिवार। इन परित्यक्ता औरतों की संख्या और इनके शोषण के रूप लगातार बढ़ ही रहे हैं कम नही हो रहे हैं। राम नाम की राजनीति करने वाले भगवा नेताओं के लिए तो यह अधिक शर्म की बात इसलिए भी है कि जिस राम की जन्मभूमि के नाम पर उन्होंने अपनी भगवा पार्टी का इतना विस्तार और विकास किया केवल उसी अयोध्या में ऐसी परित्यक्ता औरतों के दर्जन भर से अधिक ठिकाने हैं। लेकिन राम नाम को बेचने वालों की आंख कभी उन बेसहारा औरतों की तरफ खुलती नही है।

तीसरा, जब 12 अप्रैल 1948 को हिंदू कोड बिल बाबासाहेब तैयार करके संविधान सभा में लेकर आये तब आरएसएस और उससे जुडे संगठनों की क्या प्रतिक्रिया थी। बाबसाहेब हिंदू औरतों को गुलामी से आजाद कराने के लिए जब हिंदू कोड बिल लेकर सामने आये तो माननीय प्रधानमंत्री के मातृ संगठन की उस पर क्या राय थी कभी देश को वह भी बताने की कृपा करें। असल में हिंदू कोड बिल हिंदू औरतों के पक्ष में एक क्रान्तिकारी कदम था जिसका आरएसएस ने जमकर विरोध किया था। हिंदू कोड बिल बहु विवाह प्रथा को गैर कानूनी ठहराने का प्रावधान करता था तो वहीं हिंदू महिलाओं को तलाक और संपति में हिस्सेदारी का अधिकार भी देता था। जिसका विरोध करने के लिए आरएसएस ने अपनी पूरी ताकत झौक दी थी। ध्यान रहे प्रधानमंत्री के मातृ संगठन के समर्थन से ही मार्च 1949 को एक एन्टी हिंदू कोड बिल कमेटी का निर्माण किया गया था। देश में हजारों जनसभाएं इस कानून के खिलाफ की गई। दिसंबर 1949 को इस बिल के विरोध में दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली का आयोजन भी आरएसएस ने इस दिन किया था। उस समय भी आरएसएस ने तमाम साधुओं को हिंदू औरतों को मिलने वाली बराबरी के खिलाफ सड़कों पर उतार दिया था। हिंदू औरतों को बराबरी का अधिकार दिलवाने वाले बिल का विरोध करने वालों को धर्मवीर

और हिंदू औरतों को बराबरी से महरूम रखने वाली इस छद्म लडाई को धर्मयुद्ध का नाम दिया गया था।
इसके अलावा एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि उस समय आरएसएस के मुखपत्रों पाचजन्य और आर्गेनाइजर ने खुलकर इस हिंदू औरतों को बराबरी देने वाले कानून का विरोध किया था। यहां तक कि इसे हिंदू धर्म पर कुठाराघात तक बताया गया, इसे परिवार संस्था को तोड देने वाला कानून कहा गया। ध्यान रहे उस समय पाचजन्य के संपादक अटल बिहारी वाजपेयी और आर्गेनाइजर के संपादक दूसरे संघ प्रचारक के आर मलकानी थे। यहां यह इसलिए बता देना आवश्यक है कि संघ की कार्यशैली रही है कि मुखपत्र से लेकर व्यक्तियों से संबंध होने से इंकार कर देने की। गोडसे से लेकर उसके तथाकथित मुखपत्रों तक संघ कभी भी किसी से संबंध होने से मुकर सकता है। परंतु अटल बिहारी वाजपेयी और मलकानी तो ऐसे नाम है जिनसे संबंध होने से संघ इंकार नही कर सकता है। यहां तक कि संघ से जुडे हुए धर्मवीरों ने इस कानून की तुलना एटम बम्ब तक से कर डाली थी। यहां तक कि इसे नेहरू की सरकार के चले जाने का संकेत बताने के अलावा बाबासाहेब की जाति पर भी सवाल उठाये गये थे। हिंदू औरतो को बराबरी दिलवाने के कानून का विरोध करने वाले कृपात्री जी महाराज ने तो यहां तक कह डाला था कि एक पूर्व अछूत कैसे ब्राह्मणों के लिए संरक्षित काम को कर सकता है। हिंदू धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने अपने कुतर्कों के साथ बाबासाहेब को बहस के लिए भी ललकारने की कोशिश की थी। परंतु उनके पुरूषवादी तर्क भी उनके शास्त्रों की ही तरह झूठे और खोखले थे। दिल्ली की सड़कों पर आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की और औरतों की बाराबरी के लिए बने कानून के खिलाफ गिरफ्तारियां दी।

बहरहाल, माननीय प्रधानमंत्री जी को कभी दो चार जुमले अपने धर्म की औरतों के अधिकारों, परित्यक्ता औरतों के जीवन पर भी कस ही देने चाहिए। या वह चाहते हैं कि हिंदू औरते उनके तथाकथित धर्मशास्त्रों द्वारा गढ़े गये नियमों का शिकार होकर हमेशा दोयम दर्जें की नागरिक और मर्दों की गुलाम बनी रहें और उनका संघ हिंदू समाज की तरह खालिस मर्दों का संगठन बनकर औरतों और वंचित तबकों की गुलामी के नियम और साजिशें रचने वाला ब्राह्मणवादी मनुवादी संगठन बना रहे।