समय रहते सीख लें जल प्रबंधन वरना हो जायेंगे केपटाउन

महेश राठी
जल जीवन का ऐसा मूल आधार है कि जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। पीने योग्य उपयुक्त और पर्याप्त जल जिस तरह से भारत में पेयजल की कमी हो रही है, वह आने वाले समय के लिए एक गंभीर खतरे की आहट की तरह है। मौजूदा दौर में यह केवल वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों कंे लिए ही चिंता की बात है। परंतु आने वाले समय में यह प्रत्येक भारतीय के लिए चिंता का विषय होने वाला है। 2001 की जनगणना के अनुसार 25 प्रतिशत ग्रामीण और 65 प्रतिशत शहरी आबादी को ही हमारे देश में पर्याप्त पानी उपलब्ध था। वर्तमान समय में यह स्थितियां और खराब हुई हैं और हालात पहले से भी अधिक चिन्ताजनक होने की तरफ हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि 2050 तक 30 फीसदी प्रति व्यक्ति पानी की कमी होगी। वर्तमान में उपलब्ध प्रति व्यक्ति 1140 क्यूसेक पानी के सापेक्ष तब प्रति व्यक्ति 1000 क्यूसेक पानी प्राप्त हो सकेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शहरी क्षेत्रों में 200 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी की उपलब्धता की सिफारिश की है। इसके विपरीत देश में 140 लीटर पानी ही प्रति व्यक्ति प्रति दिन सप्लाई होता है। पिघलते ग्लेशियर, घटते जंगल और बढ़ती गर्मी के कारण वर्षा का चक्र तो बिगड़ा ही है, वर्षा की मात्रा भी कम हो गई है।

पानी की कमी के चलते भूजल का अनियंत्रित दोहन होने से स्थिति और भी भयावह हो गई है। भारत में गंगोत्री ग्लेशियर अपने मूल स्थान से 27 मीटर पीछे हट चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि गंगोत्री ग्लेश्यिर का जीवन महज 20 से 30 वर्षों में का ही बचा है, अर्थात गंगा का यह उद्गम स्थल आने वाले दो-तीन दशकों में पूरी तरह से पिघल चुका होगा। और यह केवल गंगा के गायब हो जाने के खतरे को ही नही बनायेगा बल्कि इससे भारत, नेपाल और चीन की 7 नदियों का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। इनमें पहले जलस्तर बढ़ेगा और फिर तेजी से घटेगा। केदारनाथ धाम के पीछे लगभग 7 किमी चोरवाड़ी ग्लेशियर 8-10 मीटर पीछे हट गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर 131.4 वर्ग किमी प्रति वर्ष की दर से सिकुड़ते जा रहे हैं। निरन्तर ग्लेशियर पिघलते रहना अच्छे संकेत नहीं है।
इसके लिये बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग को रोकना आवश्यक होगा। बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का भी भीषण खतरा पृथ्वी पर मंडरा रहा है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि 2050 तक विश्व की आधी जनसंख्या भूख, पानी, और बीमारी के कारण नष्ट हो जाएगी। कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है जो जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है। यद्यपि पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाने के लिये कई उपाय किये जा रहे हैं, किन्तु सर्वमान्य विकल्प वृक्षारोपण माना जा रहा है।

पेडों की कटाई और घटते जंगल

पेड़ बहुआयामी तरीके से हमारे जीवन के लिए ना केवल लाभदायक हैं बल्कि हमारे जीवन का हिस्सा होने के साथ ही वह हमारे जीवन के लिए आवश्यक भी हैं। पेड़ कार्बन डाइआॅक्साइड को खुद अवशोषित कर जीव-जगत को प्राणवायु प्रदान करते हैं और वर्षा करने में सहायक होते हैं। लेकिन जैसे इस नीले ग्रह से जंगलों का सफाया हो रहा है, वह हमारे लिए अपने हाथों से अपने भविष्य के खत्मे की इबारत लिखने जैसा है। ऐसा मानना है कि पिछले 150 सालों में ग्रीस क्षेत्र के बराबर जंगल हर साल पृथ्वी से गायब हो रहे हैं। इसकी भरपाई के लिए जो पेड़ लगाये जाते हैं वे बहुत कम हैं। अनुमान है कि दुनिया भर में सालाना करीब 60 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही वनों का विकास किया जाता है, लेकिन सालाना 1 करोड़ 30 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र काटा जा रहा है। हमारे देश में 1981 से लेकर 2011 तक 8.30 लाख हेक्टेयर जंगल उद्योग और खनन परियोजनाओं के नाम पर काटे जा चुके हैं। भारत का औद्योगिक क्षेत्र हवा और भूमि में खतरनाक रसायन उड़ेल रहा है जो मानव स्वास्थ्य के लिये बेहद हानिकारक है। टाइम पत्रिका के मुताबिक ओड़िशा का सुकंडा और गुजरात का वापी क्षेत्र विश्व के पाँच सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में से हैं। हालांकि इस अनियंत्रित औद्योगिक विकास से होने वाले प्रदूषण के प्रभाव की कहानियां देश के अधिकतर हिस्सों में बिखरी पडी हैं।

भविष्य के लिए पानी बचाना ही होगा

पानी मानव जीवन के भविष्य के बचे रहने की सबसे बुनियादी जरूरत है। आज अगर पीने के पानी की गुणवत्ता कायम रखने के साथ-साथ उसके स्रोतों को बचाने और उसके समुचित प्रबंधन की कोशिश शुरू की जाती है तभी हम इस बात को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं कि पानी हमारे भविष्य की पीढ़ियों के लिये बचा रहेगा। आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश में 144 करोड़ एकड़ फुट पानी उपलब्ध है जिसमें से हम 14 करोड़ एकड़ फुट पानी के लिये ही बाँध एवं जलाशय बना सकते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर हम मौजूदा पानी का 10 फीसदी अंश ही उपयोग में लाते हैं। शेष व्यर्थ बहा दिया जाता है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर टिकी हुई है। कृषि का देश की जीडीपी में 40 फीसदी योगदान है। कुल निर्यात आमदनी में 60 प्रतिशत हिस्सा कृषि का है। आँकड़ा यह भी है कि देश की 60 फीसदी आबादी कृषि और उससे जुड़े कामों में लगी है। ऐसी स्थिति में देश का जल संकट के दौर से गुजरना भयावह आशंकाओं को जन्म देता है। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय नदी परियोजना बनाई है, जिसका उद्देश्य सभी प्रमुख नदियों को आपस में जोड़ना है। हालांकि उस परियोजना के अपने खतरे और चुनौतियां हैं, जिस पर कईं पर्यावरणविद सवाल उठाते रहे हैं।

देश के पर्वतीय प्रदेशों में भी ना केवल भूजल का स्तर घटता जा रहा है बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों के जल के परंपरागत स्रोत भी लगातार विलुप्त हो रहे हैं और पेयजल के नये संसाधनों का कोई विकल्प अभी तक तैयार नही है। केन्द्रीय जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार जिस तरह से पर्वतीय प्रदेशों में जलस्तर गिरता जा रहा है, ऐसे में वह दिन दूर नहीं जब पानी भी आयात करना पड़े। पिछले कुछ सालों में नदियों के प्रदेश उत्तराखण्ड के कईं जिले सूखे की चपेट में रह चुके हैं। उधम सिंह नगर में भूजल स्तर छः मीटर कम हो गया है। देहरादून में पानी का लेवल 90 सेमी कम हुआ है। यही हाल मैदानी और तराई क्षेत्रों का है। पहाड़ पहले ही बूँद-बूँद के लिये तरस रहे हैं। जलस्रोत सूखते जा रहे हैं। चाल-खाल, गाड़-गदेरों के संरक्षण हेतु स्थानीय स्तर पर कुछ प्रयास हुए भी किन्तु सरकार की इस क्षेत्र में निष्क्रियता बेहद चिंताजनक है। पहाड में पलायन का एक बड़ा कारण पानी भी है।

देश में जल संकट का एक बड़ा कारण यह है कि जैसे-जैसे सिंचित भूमि का क्षेत्रफल बढ़ता गया वैसे-वैसे भूगर्भ के जल के स्तर में गिरावट आई है। देश में वर्तमान में 6-8 करोड़ हेक्टेयर भूमि सिंचित हो रही है। सिंचाई क्षेत्र बढ़ने के साथ-साथ जल का उपयोग भी बढ़ा है। इसलिये भूगर्भ में उसका स्तर घटा है। गर्मी आते ही जमीन में पानी का स्तर घटने से बहुत सारे कुंए और तालाब सूख जाते हैं और नलकूप बेकार हो जाते हैं। खेती लायक जमीन को बढ़ाने के लिए पेडों के कटने और लगातार भूजल के दोहन से भूजल के स्तर गिर जाने से होने वाले संकट का सबसे सटीक उदाहरण पंजाब और हरियाणा को एक माॅडल के रूप में लिया जा सकता है।

पानी की कमी के चलते निरन्तर खोदे जा रहे गहरे कुओं और ट्यूबवेलों द्वारा भूमिगत जल का अन्धाधुन्ध दोहन होने से भूजल का स्तर निरन्तर घटता जा रहा है। अधिक भू-जल दोहन से भूजल का स्तर निश्चित रूप से गिरेगा जो भविष्य के लिये हानिकारक होगा। भूजल के अंधाधुंध दोहन के परिणामस्वरूप पानी का स्तर तो नीचे जाता ही है, साथ ही छोटे लोगों के कुंए जो कम गहराई में खुदे होते हैं, सूख जाते हैं। इस प्रकार भूजल के अधिक दोहन से समृद्ध लोगों को लाभ होता है, जबकि कमजोर लोगों को पानी से वंचित होना पड़ता है। पंजाब हरियाणा में पहले लोगों ने भू जल के दोहन के लिए साधारण ट्यूबवेल लगाये और जल स्तर नीचे चले जाने के बाद समर्सिबल का इस्तेमाल शुरू किया। अब पंजाब हरियाणा के कई इलाकों में भूजल खतरनाक स्तर तक नीचे जा चुका है। यहां तक कि कईं इलाके रेगिस्तान बनने की और अग्रसर हैं।

भूजल के अत्यधिक दोहन का दूसरा दुष्परिणाम यह है कि धरती के गर्भ में पड़े रसायन ऊपर आ जाते हैं। धरती में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड जैसे विषैले पदार्थ होते हैं जो भूमिगत तालाब के निचले हिस्से में सुप्त पड़े रहते हैं। गहरे ट्यूबवेल खोदने से गर्भ में पड़े ये रसायन ऊपर आ जाते हैं और पीने के पानी में मिलकर रोगों में बढ़ोत्तरी करते हैं। गुजरात आदि तटीय राज्यों में गहरे कुंए खोदने और उनमें समुद्र का खारा पानी प्रवेश करने से वह पीने के लायक तो दूर सिंचाई के योग्य भी नहीं रह गया है। पानी के अत्यधिक दोहन से नदियाँ भी सूख रही हैं। पहले यमुना का पानी बारह महीने दिल्ली पहुँचता था अब हरियाणा और उत्तर प्रदेश में नदी किनारे गहरे ट्यूबवेल लगने से पर्याप्त पानी दिल्ली नहीं पहुँच पा रहा है। हथिनीकुंड बैराज से पानी छोड़े जाने के बाद 20-25 किमी पर ही पानी पूरी तरह भूमि में समा जाता है। यमुना में पलने वाली मछलियाँ और कछुओं की प्रजातियां विलुप्त होने के कागार पर हैं। तीर्थयात्रियों को स्नान के लिये जल नहीं मिल पा रहा है। नदी तट के वृक्ष मर रहे हैं। सम्र्पूण क्षेत्र की परिस्थितिकी पूरी तरह से बर्बाद हो रही है। देश की बाकी नदियों की भी कमोबेश यही हालत है। विकास धीरे धीरे हमारी जीवन रेखा को लील रहा है।

रोकना होगा अनियंत्रित भूजल दोहन

भूजल के अत्यधिक दोहन से निपटने के लिये हर क्षेत्र में अधिकतम गहराई अर्थात भूजल दोहन की गहराई की सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। इस सीमा से गहरे खुदे ट्यूबवेल भर दिये जाएं। जिससे तय हो सके की इससे नीचे पानी का जलस्तर नहीं गिरेगा। इसके अलावा जहाँ कम पानी है वहाँ कम पानी खपत करने वाली फसलें उगाई जानी चाहिए और जहाँ पानी की अधिकता हो वहाँ पानी की अधिक खपत वाली फसलें उठाई जानी चाहिए। हर क्षेत्र में पानी की उपलब्धता को देखते हुए फसलों को उगाने की छूट दी जानी चाहिए। जैसे जोधपुर में मिर्च, गुलबर्गा में अंगूर, कोटा में नहर के हैड पर धान आदि उगाया जाता है। इसी प्रकार ख्ेाती का प्रबधन बुंदेलख.ड और मराठवाडा के सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी किया जा सकता है। अधिक पानी की मांग करने वाली जो फसलें इन स्थानों के लिये उपयुक्त नहीं है, उन फसलों के उन इलाकों में उगाने को रोकने के प्रयास किये जाने चाहिए। ऐसी फसलों को जल परिर्पूण क्षेत्रों के लिये सीमित किया जाना चाहिए।

इस प्रकार फसल चक्र के निर्धारण से भी भूजल संरक्षित किया जा सकता है। साथ ही प्रत्येक राज्य में भूजल केन्द्र स्थापित किये जाने चाहिए। भूजल के अवैध दोहन पर रोक लगाई जानी चाहिए। जमीन के भीतरी जल का दोहन बगैर किसी जानकारी के निजी उपयोग के लिये करने से भविष्य में परेशानी खड़ी हो सकती है। अन्धाधुन्ध जल दोहन से पानी की समस्या उत्पन्न होगी। पेयजल के साथ ही सिंचाई, उद्योग, विद्युत उत्पादन आदि के लिये भी पानी की जरूरत है। इसके लिये उपलब्ध जल संसाधनों का समुचित उपयोग करने के साथ ही उनका संरक्षण और संवर्धन भी जरूरी है।

भारत में जल प्रबंधन की आवश्यकता

भारत में जल संसाधन मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून द्वारा सम्भव है। उत्तर-पूर्वी मानसून से भी कुछ पानी उपलब्ध होता है। दक्षिण-पूर्वी मानसून म्यांमार, थाइलैंड आदि की ओर चला जाता है। कभी-कभी इस मानसून के कुछ बादल हिमालय की ओर मुड़कर भारत के उत्तर में वर्षा करते हैं। भारत में वर्षा से हर साल 30 अरब एकड़ फुट पानी मिलता है पर इसका अधिकांश जलवाष्प बनकर उड़ जाता है तथा नाले, नालियों में बहकर व्यर्थ चला जाता है। भारत में बड़ी नदियाँ लगभग 14 हैं, जिनका तटबन्ध क्षेत्रों 20 हजार किमी या इससे ऊपर है। दो हजार से बीस हजार किमी तटबन्ध वाली 44 नदियाँ हैं। फिर अनेक छोटी नदियाँ हैं। भारत को 90 प्रतिशत पानी बड़ी या मध्यम नदियों से प्राप्त होता है। कुछ पानी जमीन में जाकर एकत्र हो जाता है।

इसमें जो पानी उपयोग में लाया जा सकता है उसकी मात्रा 25 खरब 50 क्यूबिक मीटर है। भारत में कुल पानी 190 खरब क्यूबिक मीटर है, लेकिन इसमें वह पानी सम्मिलित नहीें है जो नेपाल और बांग्लादेश में चला जाता है। प्रयोग में लाया जाने वाला पानी अधिक नहीं है। इसमें भी हमें कुछ पानी इकट्ठा करके रखना पड़ता है। वर्तमान में 15 प्रतिशत पानी संचय करने की व्यवस्था है। सिंचाई के अभाव में हमारा कृषि उत्पादन बढ़ नहीं पा रहा है। भारत का कृषि क्षेत्र अमरीका से दोगुना है, लेकिन उत्पादन आधा है। हमारे यहाँ बोई गई भूमि में मुश्किल से 25 प्रतिशत क्षेत्र ही पानी प्राप्त करता है। इसमें भी अधिकांश भाग तालाब आदि के अस्थायी पानी से सींचा जाता है। भविष्य में सिंचाई के अलावा बिजली बनाने तथा उद्योगों के कामों के लिये भी पानी की और आवश्यकता होगी। विश्व के कई देशों में एक नदी के पानी को दूसरी ओर मोड़कर पानी की समस्या हल की गई। भारत में इस दिशा में कुछ काम हुआ है। तमिलनाडु में पूर्वी भागों का पानी पेरियार की ओर मोड़ा गया है। यमुना का पानी भी पश्चिमी भाग की ओर मोड़ा गया है। सिन्धु को राजस्थान की ओर प्रवाहित किया गया है। लेकिन हमारी ये योजनाएं लघु स्तर की हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में ठोस कदम उठा, जाने की आवश्यकता है।

इसके अलावा भारत में वर्षा के दिनों में काफी जल प्राप्त होता है। इस जल को छोटे-छोटे बाँधों और जलाशयों द्वारा एकत्र किया जा सकता है। बाद में इस जल का उपयोग सिंचाई और बिजली के कामों में किया जा सकता है। इसके लिये सबसे पहले उन क्षेत्रों की सूची तैयार की जानी चाहिए जहाँ गर्मी शुरू होते ही ताल-तलैया और कुएँ सूख जाते हैं और भूगर्भ में भी जलस्तर घटने लगता है। ऐसे क्षेत्रों में कुछ बड़े-बड़े जलाशय बनाकर भूजल के स्तर को घटने से तो रोका जा सकता है साथ ही सिंचाई के लिये भी जल उपलब्ध कराया जा सकता है।

इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में भवन निर्माण के लिए वाटर हारवेस्टिंग प्रणाली विकसित करने को भी अनिवार्य किया जाना चाहिए और शहरों के लिए इस प्रकार से जल प्रबंान किया जाये कि शहर अपने जरूरत के लिए आवश्यक जल संग्रहण सीखकर आत्मनिर्भर बन सकें। शहरों की नदियों पर निर्भरता भी देश में बढ़ते जल संकट का एक बड़ा कारण बन रही है। यदि हम देश की राजधानी को देखें तो इस समस्या को समझना आसान भी होगा और इसके निवारण के तरीके भी खोजे जा सकेंगे। दिल्ली पहले केवल यमुना नदी अथवा अनने भूजल और अन्य स्रोतों से ही अपने जल की आवश्यकता को पूरा कर लेता था। परंतु शहर के फैलते जाने से यहां के अनियंत्रित फैलाव ने बिल्डर माफिया के साथ मिलकर शहर के सारे तालाब, बावडिया और झीलें निगल ली और उसके दिल्ली की प्यास ने यमुना को सूख दिया और रूख गंगा की तरफ कर लिया। गंग नहर से आधी दिल्ली को पानी की आपूर्ति होती है परंतु उससे भी दिल्ली का गुजारा मुश्किल हो रहा है और अब सूखने को कागार पर खडी गंगोत्री पर दिल्ली की निगाह है। और कारण केवल एक है दिल्ली का कोई अपना समुचित जल प्रबंधन नही होना। अब खतरा हमारे जीवन के अस्तित्व का है अभी भी समय है हमें बिना समय गंवाये समुचित जल प्रबंधन प्रणाली का विकास करना होगा वरना वह दिन दूर नही है कि हमारे देश का हर शहर केपटाउन बन जायेगा और सबको पानी कमी और पानी की राशनिंग का सामना करना होगा।