जगजीवन राम: बाबू बीट्स बॉबी

जयन्त जिज्ञासु
आज भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री बाबूजी जगजीवन राम (5 अप्रैल 1908 – 6 जुलाई 1986) की 32वीं पुण्यतिथि है। कद्दावर किसान नेता व उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार के प्रणेता चरण सिंह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री, जिन्हें बतौर प्रधानमंत्री कभी सदन जाने और संसद सत्र में हिस्सा लेने का अवसर नहीं मिला, और श्री चंद्रशेखर अकेले ऐसे प्रधानमंत्री, जो कभी लाल क़िले पर झंडा फहराकर राष्ट्र को संबोधित नहीं कर पाए। दोनों पुराने कांग्रेसी होते हुए भी कांग्रेस की चालबाजी समझ नहीं पाए। चरण सिंह को उनकी ख़ूबियों के साथ-साथ इस बात के लिए भी इतिहास में याद रखा जाएगा कि उन्होंने जगजीवन राम के समर्थन में पर्याप्त सांसदों की संख्या होने की जानकारी के बावजूद लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से कर दी। और, इस तरह से सबसे ज़्यादा 32 साल तक कैबिनेट मंत्री रहने वाला देश का एक सामर्थ्यवान दलित नेता, जिनकी सभी वर्गों में राष्ट्रीय​ स्वीकार्यता थी; प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गया।

जिस डॉ. अम्बेडकर के बरक्स जगजीवन राम को खड़ा करने का इल्ज़ाम कांग्रेस पर आता है, वही बाबा साहब ने बाबूजी के लिए कहा था,
‘‘बाबू जगजीवनराम भारत के चोटी के विचारक, भविष्यद्रष्टा और ऋषि राजनेता हैं जो सबके कल्याण की सोचते हैं।”

मैथिलीशरण गुप्त ने उनके प्रति बड़ी उदात्त भावना प्रकट की:
तुल न सके धरती धन धाम
धन्य तुम्हारा पावन नाम
लेकर तुम सा लक्ष्य ललाम
सफल काम जगजीवन राम।

1946 की अंतरिम सरकार में श्रम मंत्रालय, आज़ादी के बाद नेहरू के कार्यकाल में क्रमशः संचार मंत्रालय, परिवहन व रेलवे मंत्रालय और परिवहन व संचार मंत्रालय (उड्डयन भी); इंदिरा गांधी के कार्यकाल में क्रमश: श्रम, रोजगार व पुनर्वास मंत्रालय, खाद्य व कृषि मंत्रालय (हरित क्रांति के प्रणेता), रक्षा मंत्रालय (71 का मुक्ति युद्ध जिताने वाला कुशल रणनीतिकार), कृषि व सिंचाई मंत्रालय एवं मोरारजी देसाई के कार्यकाल में रक्षा मंत्रालय संभालने वाले जगजीवन राम भारत के उपप्रधानमंत्री भी रहे।

कुल मिलाकर यह वह दौर था, जब संपूर्ण क्रांति व व्यवस्था-परिवर्तन के नाम पर बनी सरकार ने कांग्रेस की ज़्यादतियों और संजय गांधी की अतिरिक्त-संवैधानिक शक्तियों के दोहन से आज़िज जनता के उपजे आक्रोश को पलीता लगा दिया था। इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ अभद्रतम भाषा में आग उगलने वाले व रायबरेली से उन्हें शिक़स्त देने वाले राजनारायण उसी कांग्रेस से मिलकर चरण सिंह को पोंगापंथी व ज्योतिष विद्या के मायाजाल में उलझाते चले गए। मोरारजी देसाई के अपने नखरे थे, वे जेपी को भी नहीं गुदानते थे। नेताओं की यह वयोवृद्ध जमात किसी को भी अपने से बड़ा नेता मानने को तैयार नहीं थी, अव्वल हर कोई दूसरे की लकीर को छोटा करने पर तुला हुआ था। लम्बे-चौड़े वादे-दावे व भ्रष्टाचार-विरोध में मुट्ठियां तान कर जनता के बीच विश्वास हासिल करने के बाद जनता का मोहभंग कराने का आज़ाद भारत का इसे पहला एपिसोड माना जाना चाहिए।

यह भी सच है कि जनता सरकार में आंतरिक कलह जब ज़्यादा बढ़ गया, दूसरी तरफ जनसंघ वालों की दोहरी सदस्यता के सवाल पर जब विद्रोह शुरू हुआ, तो सरकार चलाने के लिए स्थिति सहज नहीं रह गई। बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाए जाने के मशवरे को न मोरारजी ने माना न चरण सिंह ने। चरण सिंह ने तो संसद भंग करने की सिफ़ारिश ही कर डाली और संपूर्ण क्रांति का नारा महज नारा बन कर रह गया।

जेपी, मोरार जी, चरण सिंह, जगजीवन राम और कृपलानी की भूमिका और 77 की सरकार के असमय कालकवलित होने का जब सबब ढूंढते हैं तो पता चलता है कि जेपी इनलोगों के आचरण से बहुत क्रुद्ध हो चले थे, उन्होंने कृपलानी से कहा कि आप इन सबके चक्कर में क्यूं पड़ते हैं? ये बड़े बदमाश लोग हैं। ग़लत लोग सत्ता में आ गए हैं, सब चौपट करके रख दिया।

बहरहाल, चरण सिंह एक सफल मुख्यमंत्री, उल्लेखनीय उपप्रधानमंत्री, गृहमंत्री व वित्त मंत्री ज़रूर रहे, और वक़्त मिलता, तो अच्छे प्रधानमंत्री भी साबित हो सकते थे। पर, प्रधानमंत्री बनने की ओर तीव्रतम गति से अग्रसर जगजीवन राम का रास्ता रोककर उन्होंने महत्वाकांक्षाओं की टकराहट का कुरूपतम नमूना पेश किया। हां, इतिहास उनके दबे-कुचलों के प्रति हमदर्दी और शरद-मुलायम-लालू-रामविलास-नीतीश जैसे नए-नए लोगों की हौसलाअफजाई करने व सियासी मंच मुहैया कराने के लिए ज़रूर याद करेगा। उन्होंने ठीक ही कहा था –
“हिन्दुस्तान की ख़ुशहाली का रास्ता गांवों के खेतों व खलिहानों से होकर गुज़रता है”।

चरण सिंह के स्टैंड पर बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष व 1967 से 2000 तक 7 बार विधायक रहे गजेन्द्र प्रसाद हिमांशु बताते हैं, “सरफ़ेस पर  यह ज़रूर लग सकता है कि चरण सिंह ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया, पर यहाँ चौधरी जी सही थे, वो सैद्धांतिक आदमी थे। उसूल से समझौता नहीं करते थे। जगजीवन राम नेहरू और इंदिरा दोनों के समय में प्रभावशाली आदमी थे, पर बेवकूफ़ी कर बैठे। इंदिरा जी ने उन्हें ही इमरजेंसी का प्रस्तावक बना दिया, तो जो आदमी आपातकाल का प्रस्तावक हो, वो आपातकाल के विरोध में भारी जनसमर्थन से बनी सरकार का मुखिया हो जाए, तो यह मैंडेट का अपमान होता। इसलिए, यहाँ मैं चरण सिंह को ग़लत नहीं मानता”।

वहीं जगजीवन राम ऐसे लड़ाका थे जो आज़ादी की लड़ाई और दबे-कुचले समाज की उन्नति  की लड़ाई साथ-साथ लड़ रहे थे। मतलब सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक सभी मोर्चे पर वे भिड़े हुए थे। उन्होंने खेतिहर मज़दूर सभा एवं भारतीय दलित वर्ग संघ का गठन किया। 1936 में इस संघ के 14 सदस्य बिहार के चुनाव में जीते। वे अंग्रेज़ों की फूट डालो-राज करो की चाल समझ चुके थे। इसलिए, जब उन्हें मोहम्मद युनूस की कठपुतली सरकार में शामिल होने का लालच दिया गया, तो उन्होंने ठुकरा दिया। गाँधी जी कहते थे – “जगजीवन राम तपे कंचन की भांति खरे व सच्चे हैं। मेरा हृदय इनके प्रति आदरपूर्ण प्रशंसा से आपूरित है”।

1942 के आंदोलन में उन्हें गाँधी जी ने बिहार व उत्तर पूर्वी भारत में प्रचार का जिम्मा सौंपा। पर, 10 दिन बाद ही वे गिरफ्तार हो गये। 43 में रिहाई हुई। वे उन 12 राष्ट्रीय नेताओं में थे, जिन्हें लार्ड वावेल ने अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था।

बाबू जगजीवन राम ने भारत सरकार में सभी महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालते हुए न्यूनतम मेहनताना, बोनस, बीमा, भविष्य निधि सहित कई क़ानून बनाये।  देश में डाकघर व रेलवे का जाल बिछा दिया। हरित क्रांति की नींव रखकर देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। विमान सेवा को देशहित में करने के लिए निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके वायु सेना निगम, एयर इंडिया व इंडियन एअरलाइंस की स्थापना की। रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने कहा कि “युद्ध भारत के सूई की नोंक के बराबर भूभाग पर भी नहीं लड़ा जायेगा” व 71 में बांग्लादेश के मुक्तिसंग्राम में ऐतिहासिक रोल निभाया। उन्होंने जनवितरण प्रणाली की नींव रखी।

जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर और रामनरेश यादव पर मनुवादी लोगों द्वारा फब्तियाँ कसी जाती थीं:

दिल्ली से चमरा भेजा संदेश
कर्पूरी केश बनावे भैंस चरावे रामनरेश।

आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव से ठीक पहले उन्होंने इंदिरा से  अपनी​ राहें जुदा कर लीं। 5 मंत्रियों के साथ कैबिनेट से बाहर निकलकर उन्होंने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई। यह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए ज़बरदस्त झटका था। विपक्षी पार्टियों की रामलीला मैदान में होने वाली विशाल जनसभा में जब उन्होंने जाना तय किया, तो उसे फ्लॉप करने के लिए पब्लिक ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन ने उस रोज़ टेलिविज़न पर  बॉबी
फ़िल्म दिखाई ताकि लोग घर से न निकल कर उस दौर की इस मशहूर ब्लॉकबस्टर मूवी का आनंद लें। पर, लोग निकले और ऐतिहासिक सभा हुई। अगले दिन की हेडलाइन थी – “बाबू बीट्स बॉबी”।

1936 से 1986 तक 50 वर्षों का उनका जनहित को समर्पित सार्वजनिक जीवन कुछ अपवादों को छोड़कर शानदार रहा। इस देश में राष्ट्रपति तो कोई दलित-मुसलमान बन जाता है, पर अफ़सोस कि ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर गर्व से भर जाने वाला यह मुल्क आज भी एक दलित या मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की सदाशयता दिखाने को तैयार नज़र नहीं आता। उम्मीद है, स्थितियां बदलेंगी और जो काम अमेरिका के ह्वाइट हाउस में एक ब्लैक को बिठाकर वहाँ के लोगों ने जम्हूरी विवेक व मूल्यों का परिचय देते हुए किया; वो हिन्दुस्तान में भी निकट भविष्य में दिखेगा।

(जयन्त जिज्ञासु, शोधार्थी, जेएनयू, दिल्ली)