कितने राष्ट्रवादी और देशभक्त थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी

महेश राठी
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को हुआ था, जाहिर है आज भाजपा और संघ के लिए उन्हें याद करने का अवसर है। परंतु यहां सवाल यह है कि क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी किसी भी दृष्टि से राष्ट्रवादी अथवा देशभक्त कहे जा सकते हैं। यदि देश का अर्थ केवल ब्राह्मणवाद का संसाधनों और सत्ता पर कब्जा है तो जाहिर है श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ब्राह्मणवादी राष्ट्रवादी कहा जाना चाहिए और देश का अर्थ भारत की बहुमत आबादी और उनका हित और उनकी समानता और उन्हें विकास के समान अवसर दिया जाना है तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रद्रोही ब्राह्मणवादी कहलाने से अधिक कुछ भी कहलाने के हकदार नही है। असल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का पूरा जीवन ही एक कट्टर ब्राह्मणवादी सांप्रदायिक अवसरवादी व्यक्ति की जीवनगाथा भर है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और उनके कृत्यों का विश्लेषण करें तो वह ना केवल अंग्रेजों की तरफ झुकाव वाला बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की राह में गतिरोध खडा करने वाला दिखाई देता है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत कांग्रेस से की थी। वह कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार बंगाल प्रांतीय परिषद के सदस्य चुने गये थे। उसके बाद वह आगे चलकर 1939 में सावरकर के प्रभाव में आकर हिंदू महासभा के साथ जुड गये। हिंदू महासभा के साथ जुडने की भी एक अलग ही कहानी है। यह कहानी शुरू होती है 1932 में ब्रिटिश राज द्वारा एसेंबली सीटों के लिए जारी नये आदेष के बाद जिसमें मुस्लिमों को उनकी संख्या के अनुपात में अधिक सीटें हासिल हो गयी थी। ध्यान रहे कम संख्या होने के बाद भी अभी हिंदू सीटों की संख्या अधिक थी। इसके अलावा राज ने दलितों को भी अल्पसंख्यक मानकर उनके लिए भी अलग सीटों का प्रावधान किया था। जिसके बाद हिंदू सीटें कम हो गयी। इसे कम्युनल अवार्ड कहा गया। अब हिंदू सीटे कम हो जाने से हिंदुओं के नाम पर हमेशा सत्ता में बने रहने वाले ब्राहमणों के वर्चस्व पर खतरा मंडराने लगा और ब्राह्मणों के विधायिकाओं में अल्पमत में आ जाने का खतरा पैदा हो गया था। इसे बंगाली ब्राह्मणवादियों के लिए और भी खराब गांधी और अंबेडकर के बीच हुए पुणे पेक्ट ने बना दिया था। यहीं से श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ब्राहमणवादी मन विचलित होना शुरू हो गया था। जो बाद में अंग्रेजों के लिए काम करने वाले मराठी ब्राह्मण सावरकर के साथ चले गये।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भाजपा और संघ के नेता महान राष्ट्रवादी नेता के तौर पर पेश करते हैं। परंतु उनकी भूमिका आजादी की लड़ाई से लेकर देश आजाद होने तक काफी विवादास्पद और सत्ता में बने रहने के लिए प्रयास करने वाले व्यक्ति की ही दिखाई देती है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का उन्होंने जमकर विरोध किया यहां तक बंगाल के गवर्नर जाॅन हरबर्ट को 26 जुलाई 1942 को एक पत्र लिखा और उसमें गांधी और कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करते हुए उसे विफल बनाने के लिए भरपूर सहयोग देने का वादा भी किया था। उन्होंने अपने पत्र में साफ लिखा था कि आपके मंत्री हाने के नाते हम भारत छोड़ों आंदोलन को विफल करने के लिए पूरा सक्रिय सहयोग करेंगे।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल इतने पर ही नही ठहरे बल्कि जब गांधी और कांग्रेस करो या मरो के नारे के तहत अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन चला रहे थे उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी सावरकर के साथ मिलकर अंग्रेजों का सहयोग कर रहे थे। कांग्रेस और गांधी ने अंग्रेजों द्वारा भारत को दूसरे विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा का विरोध किया तो वहीं सावरकर पूरे भारत में घूमकर अंग्रेजी फौज में भारतीयों को भर्ती होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जाहिर है बंगाल के वित्तमंत्री और भाजपा और संघ के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी इसमें शामिल थे। वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत छोड़ों आंदोलन के विरोध का कारण सावरकर द्वारा सभी हिंदू महासभा सदस्यों को लिखे गये पत्र का जवाब था जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा पद त्याग का विरोध करते हुए लिखा था कि अपने पद पर बने रहो। सावरकार का यह प्रसिद्ध पत्र “स्टिक टू दि पोस्ट” नाम से मशहूर है।

इस से भी शर्मनाक स्थिति वह थी कि जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस देश को आजाद करवाने के लिए आजाद हिंद फौज के साथ जान की बाजी लगा रहे थे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी मुस्लिम लीग के नेतृत्व में बंगाल में बनी सरकार के उप प्रधानमंत्री (उप मुख्यमंत्री) थे। वहीं दूसरी तरफ नेताजी देश को नारा दे रहे थे कि तुम मुझे खुन दो और मैं तुम्हे आजादी दूंगा तो दूसरी तरफ मुस्लिम लीग और संघ-हिंदू महासभा मिलकर ब्रिटिश फौज के लिए भर्ती कैंप चला रहे थे।

इसके अलावा जिन्ना, सावरकर और श्यामा प्रसाद की दोस्ती और सहयोग का सबसे अनौखा उदाहरण 1939 में दिखाई देता है। अंग्रेजों द्वारा भारत को दूसरे विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा पर 1939 में गांधी के आहवान पर कांग्रेस के विधायकों ओर मन्त्रियों ने अंतरिम सरकार के अपने पदों से इस्तीफा दे दिया तो जिन्ना ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए इसे मुक्ति का दिन बताया और इस मुक्ति के दिन में मुखर्जी ने मंत्री पद छोडने की अपेक्षा कांग्रेस छोड़कर जिन्ना की खुशी में शामिल होकर मुस्लिम लीग सरकार में साझेदारी करना बेहतर माना था। ध्यान रहे कि जहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस मुक्ति के दिन का समारोह मनाते हुए मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हो रहे थे तो वहीं अब्दुर रहमान सिदद्की नामक एक ऐसे लीगी मुस्लिम नेता भी थे जिन्होंने जिन्ना की घोषण का विरोध करते हुए लीग की वर्किंग कमेटी से इस्तीफा दे दिया था और जिन्ना की घोषणा को राष्ट्रीय गरिमा का अपमान और अंग्रेजों की चाकरी बताया था। परंतु राष्ट्रवादी नेता मुखर्जी को इसी चाकरी में राष्ट्रवाद दिखाई पड़ रहा था।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकार एवं उनकी हिंदू महासभा और बाद में मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ जोकि बाद में चलकर भाजपा के गठन का आधार बनी हमेशा कांग्रेस और गांधी एवं नेहरू पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते रहे। परंतु सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत के बंटवारे और पाकिस्तान की मांग करने वाली मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भाजपा के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी सत्ता का आनन्द लेते हैं। बंगाल में बनी मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के गठजोड़ वाली सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्तमंत्री, उप मुख्यमंत्री रहे। इस सरकार के मुख्यमंत्री फजुल हक थे जो बाद में भारत के बंटवारे और पाकिस्तान निर्माण की लड़ाई का एक हिस्सा थे, जो बाद में चलकर एक समय में पाकिस्तान के गृहमंत्री भी रहे। इसके अलावा भारत के बंटवारे के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को लेकर भी सबसे अधिक उत्साहित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर ही थे। ध्यान रहे वह सावरकर ही थे जिन्होंने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत दिया था। यहां तक कि मुखर्जी ने तो 1944 में कलकता की एक रैली में सार्वजनिक तौर पर भारत के विभाजन का समर्थन कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने 2 मई 1947 को लार्ड माउंटबेटन को एक गुप्त पत्र लिखते हुए यहां तक कह दिया था कि भारत का विभाजन अगर नही भी हो पाता है तो बंगाल का विभाजन तो होना ही चाहिए। इसके अलावा श्यामा प्रसाद, सावरकर की हिंदू मुस्लिम महासभा सिंध प्रांत की गुलाम हुसैन हिदायतुल्ला के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग सरकार में शामिल थी और देश में सबसे पहले इसी सरकार ने अपनी असेंबली में पाकिस्तान के निर्माण का प्रस्ताव पारित करवाया था और इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद भी राष्ट्रवादी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर की हिंदू महासभा सरकार में बनी रही थी।

वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय बहुलतावादी संस्कृति के विपरीत एक जातिवादी, सांप्रदायिक और पक्के ब्राहमणवादी नेता थे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय संविधान निर्माण के समय हिंदू कोड़ बिल का विरोध किया था। हालंकि वे जब तक नेहरू सरकार में मंत्री रहे उन्होंने इसके बारे में कुछ नही कहा था परंतु 1951 में मन्त्रिमण्डल छोडने के बाद उन्होंने हिंदू कोड़ बिल को हिंदू समाज को छिन्न भिन्न करने वाला बताकर इसका विरोध किया। उनका कहना था कि यह हिंदू समाज की बुनियाद और उसकी विवाह संस्था को खत्म कर देगा। साथ ही यह हमारे धर्म के स्वाभाविक स्रोत को नष्ट कर देगा।
इसके अलावा भाजपा और संघ के श्यामा प्रसाद भक्त कह रहे हैं कि 1951 में उन्होंने जनसंघ बनाते हुए कहा था कि देश का बंटवारा एक बेहद गलत फैसला था। इससे शर्मनाक कात क्या होगी कि वह व्यक्ति जो बंटवारे का समर्थन करते हुए लार्ड माउंटबेटन को गुप्त पत्र लिखता है वह बंटवारे के चार साल बाद अचानक बंटवारे का विरोधी हो जाता है। ध्यान रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के सबसे बड़े पैरोकार थे। इतने बड़े की जिन्ना भी कभी कभार उनसे छोटे पड जाते थे।

इस प्रकार के ब्राहमणवादी, सांप्रदायिक, जातिवादी और अंग्रेजों की चाकरी करने वाले नेता को आज भारतीय समाज के आदर्श के रूप पेश किया जा रहा है। अंग्रेजो की चाकरी का श्यामा प्रसाद मुखर्जी का एक और गजब का उदाहरण तब का है जब वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के उप कुलपति थे। उन्होंने उस समय कुछ छात्रों को विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया था। और भाजपा-संघ के राष्ट्रवादी नेता ने यह इसलिए किया क्योंकि उन छात्रों ने ब्रिटिश झण्ड़े यूनियन जैक को सम्मान नही देने का गुनाह किया था। अब श्यामा प्रसाद मुखर्जी कैसे सहन कर सकते थे कि उनके मालिकों के झण्ड़े को कुछ गुस्ताख लड़के सम्मान ना दें। आखिरकार वह अंग्रेजो के खास और सम्मान प्राप्त बाप ‘‘सर‘‘ आशुतोष मुखर्जी के बेटे जो थे।