फासीवाद का औजार झूठ और अफवाहें

महेश राठी
फासीवाद एक आधुनिक विचारधारा है जो पुरातनपन्थी और आधुनिकता-विरोधी, जनवाद और समानता विरोधी विचारों का अवसरवादी इस्तेमाल करते हुए एक नयी किस्म की राजसत्ता की स्थापना का प्रयास करता है और सफल होने पर सबसे नग्न किस्म की तानाशाही को लागू करके पूंजीवादी हितों की रक्षा करता है। अपने प्रचार प्रसार में वह झूठ और अफवाहों को अपना प्रमुख औजार बनाता है।
भारतीय समाज पिछले कईं सालों से या कहें कुछ दशक से विशेषकर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के शुरू होने के बाद से फासीवाद के झूठ और अफवाहों के शिकार एक समाज में परिवर्तित हो रहा है। फासीवाद का भारतीय संस्करण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) देश में फैलाई जाने वाली इन अफवाहों का कारखाना है। इस संघी कारखाने में समाजिक वैमस्य का आधार तैयार करने वाली और सांप्रदायिक धु्रवीकरण को तेज करने वाले झूठ और अफवाहों का निर्माण होता है उनके फैलाये जाने की रणनीतियां बनती हैं। सूचना क्रान्ति के वर्तमान समय में इन अफवाहों और झूठ को प्रभावी ढ़ंग से फैलाना बेहद आसान बन गया है। पिछले दशक के शुरू में और नब्बे के दशक के अंत में काले बंदर की अफवाह उत्तरी भारत के कईं हिस्सों में बेहद प्रभावी तरीके से फैलायी गई थी और इसे फैलाने में उस समय के मीड़िया माध्यमों की बेहद प्रभावी भूमिका भी रही थी। संभवत वह अफवाहों के संघी कारखाने का एक प्रयोग था जिससे वह अफवाह फैलाने की अपनी क्षमता और भारतीय समाज के अंधविश्वासी मानस का पता लेना चाहता था जिससे कि आने वाले समय में अपनी आगामी रणनीति को तैयार और कार्यान्वित कर सके। उसके बाद इस कारखाने ने गणेश के दूध पीने की अफवाह का सफल प्रयोग किया जिसकी चपेट में आकर पूरा उत्तर गणेश को दूध पिलाने के लिए आतुर दिखाई दिया।
दरअसल, यह ऐसे प्रयोग थे जिससे अफवाह की संघी प्रयोगशाला अपने अफवाह फैलाने के नेटवर्क का परीक्षण कर लेना चाहती थी। इन बड़ी कामयाबियों के बाद और राजनीतिक दबदबे एवं प्रशासन में संघी घुसपैठ ने अफवाहों की संघी राजनीति को और प्रभावी एवं व्यापक बना दिया है। वर्तमान समय में जहां संघ और संघ नियंत्रित भाजपा को अपना जनाधार निर्णायक और मजबूत करना होता है तो वहीं वह अपना झूठी खबरों और अफवाहों का कारखाना खोल लेते हैं। 2013 का मुजफ्फरनगर इसका एक बड़ा उदाहरण है कि किस प्रकार छेड़खानी की घटना के साथ झूठ और अफवाहों का सम्मिश्रण करके एक बड़े दंगे का आधार तैयार किया गया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूरे उत्तर प्रदेश में हमेशा हाशिये की पार्टी रही भाजपा इस इलाके की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन बैठी। मुजफ्फरनगर के जानसठ कस्बे के पास हुई छेडखानी की घटना को भाजपा के नेताओं और संघी कार्यकर्ताओं ने ऐसा रंग दिया कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा सांप्रदायिक दंगा बन गया जिसने पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र में सांप्रदायिक विभाजन कर दिया। छेड़खानी की घटना के बाद दंगा भडकाने की नीयत से भाजपा के वर्तमान समय में मेरठ जिले से एक विधायक संगीत सोम ने पाकिस्तान की घटना का एक फर्जी वीडियों अपलोड करके इसे जानसठ में हुई घटना की तरह पेश किया गया जिसमें एक युवक को कुछ लोग मिलकर बुरी तरह मार रहे थे। इस वीडियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूरी तरह से आग में झोंकने का काम किया।
झूठ गढ़ने और अफवाहें फैलाने में संघी अफवाह कारखाने की संलिप्तता इससे भी जाहिर होती है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इन घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यह भाजपा के सत्ता में आने के बाद अफवाह फैलाकर भीड़ हिंसा करने वाले संघी नेटवर्क के बेखौफ और निरंकुश हो जाने को परिलक्षित करता है और इन घटनाओं में संघी संलिप्तता को जाहिर करने वाला एक तथ्य यह है भी है कि यह अफवाहें केवल उन्हीं मुद्दों से जुड़ी हैं जिन पर संघ और उससे जुडे संगठन राजनीति करते हैं यथा, गौरक्षा, लव जेहाद, बंग्लादेशी घुसपैठ, बच्चा उठाने को लेकर अफवाहें। इन अफवाहों का शिकार अधिकतर अल्पसंख्सयक अथवा आदिवासी और दलित हो रहे हैं। यदि गौरक्षा की अफवाहों और उनसे होने वाली मोब लिंचिंग के आंकड़ों को देखें तो उससे संघी अफवाह कारखाने की रणनीति का पता चल जाता है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद से पिछले चार सालों में गौरक्षा के नाम पर अभी तक कुल 78 मोब लिंचिंग की घटनाएं हुई हैं जिसमें 29 लोगों को अपनी जान गंवानी पडी और 273 लोग घायल हुए। इन गौरक्षा की मोब लिंचिंग का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू जो इसमें संघी संगठनों की और सत्ताधारी पार्टी की संलिप्तता को जाहिर करता है वह मारने वालों के साथ साथ मरने वाले लोगों पर भी मुकदमा दर्ज करना है। अखलाक से लेकर पहलू खान तक सभी मामलों में पीड़ित पक्ष पर भी सरकार ने एफआईआर दर्ज की है।
मोब लिंचिंग की ताजा घटनाएं बच्चा चोरी के नाम अंजाम दी जा रही हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के धुले की घटना संघी अफवाहों से होने वाली मोब लिंचिग का एक ताजा और भयावह उदाहरण है। यह घटना बच्चा चोरी की अफवाह के कारण हुई और भीड़ ने अफवाह के कारण पांच लोगों को बच्चा चोर मानकर जान से मार डाला। यह एक खास तरह के उन्मादी और हिंसक राजनीति के द्वारा मौजूदा दौर में बन रहे भयानक हिंस कसमाज का नमूना है। जो ना कानून की परवाह करता है और ना ही संविधान में उसकी आस्था और केवल एक अफवाह के कारण ही एक हत्यारी भीड में परिवर्तित हो जाता है। यहां तक कि हत्या के बाद कार से निकाल कर शवों को देखकर पुष्टि कर लेना चाहता है कि उसके शिकार अभी कहीं जिंदा तो नही हैं। इस मोब लिचिंग में मारे गये पांचों व्यक्ति एक आदिवासी समुदाय के बताये जाते हैं जो खाने की तलाश में आये थे। उनमें कोई एक बच्चे से बात करने लगा तो तभी यह अफवाह उड़ा दी गई कि यह बच्चा चोरों का गिरोह है। यह केवल महाराष्ट्र की एक घटना नही है। पिछले दिनों असम के गोवाहटी में एक महिला को बच्चा चोर कहकर एक पोल के साथ बांधकर पीट पीटकर मार डाला गया। इसी प्रकार त्रिपुरा में राजधानी अगरतला के पास एक गांव में बच्चा चोरी के शक में यूपी के एक फेरी लगाने वाले आदमी को पीटकर मार डाला गया। ठीक उसी दिन अफवाहों के खिलाफ जागरूकता फैलाने वाले एक 33 वर्षीय व्यक्ति को भी त्रिपुरा में पीटकर मार डाला गया।
इसके अलावा सत्ता हथियाने के लिए संघी गिरोह किस प्रकार काम करता है उसका एक उदाहरण भाजपा और संघ की हाल में पश्चिमी बंगाल में बढ़ी सक्रियता है। 2014 के पिछले आम चुनावों में संघ ने भाजपा की जीत के लिए पैसा और मानव संसाधन तक अपनी पूरी ताकत लगा दी थी और उसने कईं सीटें जीतने का दावा भी किया था। परंतु उसके बाद भी उसे केवल दो ही सीटें हासिल हो पायी। जिसमें से एक सीट उसे गोरखा मुक्ति आंदोलन से गठजोड के कारण मिली थी। उसके बाद विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने जीत के बड़े बड़े दावे किये परंतु हार का मुंह देखना पड़ा। ऐसे हालात में संघ ने बंगाल में अपनी पुरानी झूठ और अफवाहों और दंगे की राजनीति को प्रभावी तरीके से फैलाने का काम किया। पिछले दिनों एक किशोर के द्वारा लिखे फेसबुक पोस्ट ने बंगाल में सांप्रदायिक तनाव और दंगों को हवा दे दी। जिससे सांप्रदायिक विभाजन बढ़ा और ध्रुवीकरण की जमीन तैयर हुई। अभी यह पता नही चल पाया है कि उक्त किशोर को ऐसा पोस्ट लिखने के लिए किसने उकसाया था।
बहरहाल, झूठ गढ़ना, अफवाह फैलाना यह फासीवाद का मूल चरित्र है। जर्मनी और इटली की तरह यहां पर भी फासीवाद जिन तौर-तरीकों का उपयोग कर रहा है, वे हैं सड़क पर की जाने वाली भीड हिंसाएं ;मोब लिंचिगद्ध पुलिस, नौकरशाही, सेना और मीडिया का फासीवादीकरण, कानून और संविधान का खुलेआम मखौल उड़ाते हुए अपनी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देना और इस पर उदारवादी पूँजीवादी नेताओं की चुप्पी, शुरुआत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना और फिर अपने हमले के दायरे में हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को ले आना, शाखाओं, शिशु मन्दिरों, सांस्कृतिक केन्द्रों और धार्मिक त्योहारों का उपयोग करते हुए मिथकों को समाज के ‘सामान्य बोध’ के तौर पर स्थापित कर देना, जैसे, आज उदारवादी हिन्दुओं में भी यह धारणा प्रचलित है कि मुसलमान बहुविवाह करते हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं, शातिर होते हैं, हिन्दू राष्ट्र को निगल जाना चाहते हैं, गन्दे रहते हैं, आदि-आदि। जिनका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। झूठा प्रचार और अफवाहे फैलाना यह दुनिया भर के फासीवादियों की साझा रणनीति रही है। फासीवादी हमले का निशाना संस्थाएँ नहीं बल्कि व्यक्ति हुआ करते हैं और भारत में भी विरोधियों को आतंकित करने की यही नीति फासीवादियों द्वारा अपनायी गयी, अफवाहों का शातिर तरीके से इस्तेमाल करना ही भारतीय फासीवादियों के संगठन संघ की एक प्रमुख निशानी रही है। जर्मनी और इटली की तरह ही एक ही साथ कई बातें बोलना भी भारतीय फासीवादियों ने खूब लागू किया है। उनका एक नर्म चेहरा होता है, एक उग्र चेहरा, एक मध्žयवर्ती चेहरा और भारतीय संदर्भों में तो उनके पास अल्पसंख्यक चेहरों के भी विकल्प हैं। जब जिस चेहरे की जरूरत पड़ती है उसे आगे कर दिया जाता है। भारत में भी संघ का कोई एक स्थायी संविधान नहीं रहा है। ये जब जैसी जरूरत वैसा चाल-चेहरा-चरित्र अपनाने के हामी होते हैं। क्योंकि सभी फासीवादी अवसरवादी होते हैं और अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए वे किसी भी हद तक झूठ बोल सकते हैं अफवाहे फैला सकते हैं।