नोटबंदी के बाद भाजपा अध्यक्ष ने बैंक में जमा की सबसे ज्यादा रकम

कृष्णा झा

यह नोटबंदी की घोषणा के केवल पांच दिन बाद हुआ। अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक ने सबसे अधिक पुराने नोटों को बदलने के लिए इनाम जीता, यह सारे पांच सौ और एक हजार के नोट थे जिन्हें जिन्हें सबसे कम दिनों में नये नोटों में बदला गया। बदले गये नोट 750 करोड रूपये थे और इन्हें महज पांच दिनों में ही बदल दिया गया। यह रकम भाजपा के अध्यक्ष और उक्त सहकारी बैंक के चैयरमेन अमित शाह द्वारा जमा कराई गई थी। जैसा एक जाने माने अर्थशास्त्री का मानना है कि काला धन स्टाॅक में नही होता है यह लगातार अर्थव्यवस्था में प्रवाहित होता रहता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा के पांच दिनों के भीतर ही यह 750 करोड की रकम जमा हुई और नये नोटों में बदल दी गई। नरेन्द्र मोदी ने दावा किया था कि यह कदम कालेधन को खत्म करने के लिए उठाया गया है हालांकि इसका सार है कि इसने प्रवाह में चल रहे कालेधन को आजादी के बाद के सबसे बड़े घोटाले में तब्दील कर दिया था।

यह माना जा रहा है कि देश के किसी एक जिला सहकारी बैंक में बदली गयी यह सबसे बड़ी रकम है। देश में 370 जिला सहकारी बैंक हैं। परंतु यह इस विवाद का जवाब नही है। सभी सहकारी बैंकों पर नोटबंदी के पांच दिनों बाद यानि 14 नवंबर 2016 से पुराने नोटों को लेने पर रोक लगा दी गई थी, इस डर से की इस रूट के द्वारा मनी लांड्रिंग हो सकती है। परंतु क्या वास्तव में यह एक डर था? तब यह पांच दिनों का अंतराल क्यों दिया गया? हर बीतते सप्ताह के साथ यह दिन बढ़ते गये।

कहानी यहीं खत्म नही होती है। केवल भाजपा अध्यक्ष अकेले नही थे, उनका बेटा जय शाह और भाजपा का फैला हुआ परिवार भ्रष्टाचार से लड़ने के मुखौटे के पीछे स्वयं इस गंदगी में शामिल था।

मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद के साल में और अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष के रूप में उदय होने के बाद अमित शाह के बेटे जयअमित शाह के स्वामित्व वाली कंपनी का टर्नओवर कंपनी पंजीकरण रजिस्ट्रार के आंकडों के अनुसार 16 हजार गुणा बढ़ गया था।

कंपनी रजिस्ट्रार से हासिल रिपोर्टें बताती हैं कि 2013 से 2014 में शाह की कंपनी टेंपल इंटरप्राजेज प्राइवेट लिमिटेड घाटे के काम में लिप्त थी और रिकार्ड के अनुसार उनका घाटा दोनों साल में 6230 और 1724 रूपये था। 2014-15 में इसने 18,728 करोड रूपये का लाभ दिखाया और उसके बाद 2015-16 में महज 50 हजार की कंपनी छलांग लगाकर 80.5 करोड की कंपनी बन गयी।

भाजपा के लिए भी स्वयं सहकारी बैंकों के कारोबार पर रोक लगाने के निर्णय से पहले इस सूची में राजकोट जिला सहकारी बैंक भी था जिसने 693.19 करोड के पुराने नोट पा्रप्त किये थे। इसके चैयरमेन जयेशभाई रडाडिया गुजरात सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उनके पिता विट्ठलभाई रडाडिया भाजपा के जाने माने नेता और पारेबंदर से पूर्व सांसद भी इस बैंक के एक निदेशक हैं।
सूरत जिला सहकारी बैंक ने भी पुराने नोटों में 369.85 करोड रूपये की रकम प्राप्त की। इसके निदेशक भाजपा के बरदोली से सांसद प्रभूभाई वासवा हैं जबकि इसके चैयरमेन भाजपा के जाने माने नेता नरेश भाई पटेल हैं।
साबरकंठा जिला सेन्ट्रल बैंक को 328. 50 करोड प्राप्त हुए। भाजपा नेता महेशभाई पटेल बैंक के चैयरमेन हैं। भाजपा के विधायक राजेन्द्रसिंह चावडा और पूर्व मंत्री प्रफुल खोडा पटेल इसमें निदेशक हैं।

सहकारी बैंकों पर रोक की घोषणा से पहले ही पुराने नोटों को नये नोटों में बदल दिया गया था

कहानी का दूसरा पहलू यह है कि सहकारी बैंकों पर रोक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को धक्का था और इसने कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल और गुजरात की कृषि पट्टी को प्रमुख रूप से प्रभावित किया।

वेतन देने के लिए नकदी नही थी जिसने कंगाल होने की सीमा तक पहुंचा दिया। ग्रामीण संस्थानों यथा पंचायत के पास कोई धन नही था, खेत मजदूर और मनरेगा के मजदूर भी बेरोजगार हो गये थे। संकट पूरी तरह से खत्म नही हुआ है और उसका असर अभी तक भी जारी है। कालेधन का संभावित निशाना अमीर और मध्य वर्गीय लोग होने चाहिए थे, परंतु इसके शिकार वह वंचित तबके थे जिन्होंने इसके बाद के कहर के असर को झेला। जबकि कालेधन को पनामा के बैंकों में जमा करा दिया गया था।
देश के अंदर नवंबर 2016 से पहले और नोटबंदी के फौरन बाद बैंकों में जमा हुए पैसे पर श्वेत पत्र लाने और एक संयुक्त संसदीय कमेटी की जांच करवाने के लिए मांग उठी।

राष्ट्रीय ग्रामीण और कृषि विकास बैंक (नाबार्ड) ने कहा है कि केवल गुजरात के ही 11 जिला सहकारी बैंकों में जिनके मुखिया भाजपा के नेता हैं में नोटबंदी के बाद के पांच दिनों में 3118 करोड रूपये के पुराने नोट जमा किये गये थे।
वास्तव में इसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की है जोकि ‘‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा‘‘ के वादे पर चुने गये थे। उन्हें देश को इस पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।

एक आरटीआई से अमित शाह और उनकी जमा के खुलासे होने के फौरन बाद यह खबर वायरल हो गयी और इसे टाइम्स नाॅव, न्यूज 18, First Post और इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट ने 21 जून को प्रकाशित कर दिया, उसके बाद बगैर किसी स्पष्टीकरण के इस खबर को हटा लिया गया।

खबर हटाने का कारण बताने इन खबरिया वेबसाइटों का कोई संपादक सामने नही आया। यह रिलायंस समूह है जो न्यूज 18 और First Post दोनोें का संचालन करता है।

बैंक की वेबसाइट के अनुसार अमित शाह जोकि बैंक का चैयरमेन था और उसके बाद निदेशक के पद पर थे जो अभी तक भी अपने पद हैं। यह खबर नाबार्ड के महाप्रबंधक और आरटीआई के अपीलीय अधिकारी एस. सर्वानावेल ने मनोरंजन एस. राय की अपील पर उपलब्ध करायी थी।

देश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा कारपेट के नीचे दबे कंकालों के बाहर आ जाने की छूट को लेकर अति सतर्क है, हालांकि अब यह कोई रहस्य भी नही रह गया है कि ऐसे कंकाल कारपेट के नीचे मौजूद हैं। और ऐसी कहानियों पर रोशनी डाले जाने के इंतजाम होते रहे हैं बेशक वह दबाये जाने से पहले कुछ घंटों के लिए ही हों। हाल ही में भाजपा नेताओं की आलोचनाआंें की भी ऐसी ही कहानियां अचानक से खबरिया वेबसाइटों से गायब हो गयी। जुलाई 2017 में टाइम्स आॅफ इण्डिया के अहमदाबाद संस्करण अमित शाह की संपति में 300 गुणा इजाफे की कहानी प्रकाशित की थी, जिसे उसके पेज से कुछ ही घण्टों में हटा लिया गया। ठीक इसी तरह की कहानी डीएनए के प्रिटं संस्करण और आउटलुक हिंदी की वेबसाइट पर सामने आयी जिसे बगैर किसी स्पष्टीकरण के वेबसाइट से हटा दिया गया था।

14 सितंबर 2017 को नरेन्द्र मोदी सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की आलोचना टाइम्स आॅफ इण्डिया के जयपुर संस्करण ने प्रकाशित करने के कुछ ही घण्टों बाद हटा ली थी। फिर भी प्रेस की आजादी का दिखावा लगातार किया जाता है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत के निचले पायदान पर जाने की रिपोर्ट टाइम्स आॅफ इण्डिया और इकोनोमिक्स टाइम्स ने हटा ली और फिर उसमें मीड़िया घराने के अधिकार का तर्क दिया गया।

यहां यह रेखांकित किया जा सकता है कि भाजपा की गतिविधियों का केन्द्र राजकोट रहा है जहां से मोदी को 2001 में विधायक चुना गया था। अहमदाबाद-राजकोट डीसीसीबी के आंकड़ों में इसका सार दिखाई देता है जोकि गुजरात राज्य सहकारी बैंक से अधिक है और उसके पास कुल 1.11 करोड रूपये ही जमा हुए थे। राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड और जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक ;डीसीसीबीद्ध को प्राप्त जमा के आरटीआई से हुए खुलासे हैरान करने वाले हैं।

देशभर के केवल सात सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, 32 राज्य सहकारी बैंकों, 370 जिला सहकारी बैंकों और तीन दर्जन से थोडे से ज्यादा डाकघरों ने 7.91 लाख करोड रूपये जमा किये-यह देश में बंद की गई प्रचलित करेंसी 15.28 लाख करोड का 52 प्रतिशत है जिसे रिजर्व बैंक में जमा किया गया था।

आरटीआई में प्राप्त जानकारी के अनुसार जमा किये गये नोटों की रकम को अलग अलग देखने पर सार्वजनिक क्षेत्र के सात बैंकों में 7.57 लाख करोड़ रूपये जमा हुए, 32 राज्य सहकारी बैंकों ने दिये 6407 करोड रूपये, 370 जिला सहकारी बैंकों में आये 22,271 करोड रूपये। 39 डाकघरों में जमा पुराने नोटों की कुल रकम 4408 करोड रूपये थी।

पूरे देश के राज्य सहकारी बैंकों और जिला सहकारी बैंकों से प्राप्त जानकारी इस आरटीआई उत्तर से मिली। इसमें भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित आंकडों से 21 सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों की कुल 92500 शाखाओं में से सात सार्वजनिक क्षेत्र की 29000 शाखाओं की सूचनाएं प्राप्त हुई। 14 अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने किसी एक या दूसरे कारणों से सूचना देने से इंकार कर दिया। देशभर में डाकघरों की संख्या 155000 है।

नोटबंदी के 15 महीने बीत जाने के बाद सरकार ने घोषणा की थी कि कुल बंद की गई करंेंसी का 99 प्रतिशत-15.28 लाख करोड रूपये भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने में आये हैं। घोषणा में एक समस्या आई। राज्य सहकारी बैंकों और जिला केन्द्रीय सहकारी बैंकों के अलावा, केवल कुछ ही बैंकों और उनकी शाखाओं और कुछ मुट्ठी भर डाकघरों के खातों में ही पुराने करेंसी नोट जमा हुए हैं?