राजधानी में अवैध बसें दिल्ली पुलिस और बस माफिया की मिलीभगत का कारोबार

आईएनएन भारत डेस्क
हाल ही में दिल्ली पुलिस के एएसआई ओमपाल की हत्या यूपी नंबर की एक अवैध बस ने कर दी थी। दिल्ली पुलिस ऐसा ही दावा कर रही है परंतु वास्तविकता यह है एएसआई की हत्या बस माफिया ने नही बल्कि पुलिसिया भ्रष्टाचार ने की है। नही तो दिल्ली पुलिस बताये कि दिल्ली में सैंकड़ों की संख्या में यह अवैध बसें और उन बसों के अन्तर्राज्य रूट क्यों चल रहे हैं। असल में पुलिस इनसे करोड़ों रूपये की उगाही करती है। यदि इनके खिलाफ शिकायत की जाये तो इन पर कार्रवाई का एक तय माॅडल है और यह तय माॅडल भी एक तरह का भ्रष्टाचार एक नियमित घोटाला है। पिछले दिनों हमने अपने संवाददाताओं और और बस माफिया से जुड़े हमारे संपर्को के माध्यम से इस भ्रष्टाचार के मकडजाल को समझने की कोशिश की।

दिल्ली के विभिन्न इलाकों में इन अवैध बसों का एक पूरा जाल बिछा हुआ है। यह बसें दिल्ली के रिंग रोड से लेकर यमुनापार के विभिन्न इलाकों में अवैध तरीके से दिल्ली से यूपी के विभिन्न रूटों पर चलती हुई मिलेंगी। अब इनके और पुलिस के बीच के संपर्कों को समझते हैं। हमने ऐसी ही एक बस के संचालक से इन बसों के चलने का तरीका पूछा तो उसने साफ कहा कि सारा खेल पुलिस का ही है और पुलिस की मर्जी के बगैर एक दिन भी यह बसें चल नही सकती हैं। उक्त बस संचालक का कहना था कि एक बस पर दिल्ली में महीने का पुलिस खर्च लगभग 25 हजार रूपये है।

दिल्ली में 800 से 1000 बसें अवैध ढंग से चलती हैं और एक बस के 25 हजार खर्च के हिसाब से यह हर महीने दो से ढाई करोड रूपये का कारोबार है। जिसे दिल्ली पुलिस के संरक्षण में चलाया जाता है। अब यह दो करोड रूपये ही एएसआई ओमपाल की हत्या का असली कारण हैं।

बस संचालक के अनुसार मान लें कि शास्त्री पार्क से बस चलती है तो उसे यूपी बार्डर तक यातायात पुलिस के कम से कम चार से पांच प्वाइंटों से होकर गुजरना होता है। एक प्वाइंट माने एक जेडओ का ठिकाना और प्रत्येक प्वाइंट पर 2 हजार रूपये महीने की एन्ट्री फिक्स है। इस प्रकार 4-5 जेडओ का खर्च हुआ कुल आठ से दस हजार रूपये महीने। इसके अलावा जिस थाने के इलाके में बस अवैध तरीके से पार्क होती हैं उनका रेट है 8 से 10 हजार रूपये महीना। इसका उदाहरण हमने कुछ महीने पहले वेलकम थाना इलाके से ऐसी दो बसों के बीच से एक बाइक चोरी होने के मामले में देखा। बाइक मालिक लाख कहता रहा कि इन बसों के बीच से बाइक चोरी हो गयी है। ड्यूटी आॅफिसर ने साफ कहा कि इन बसों का जिक्र एफआईआर में नही किया जायेगा। और उसने ऐसा ही किया भी यहां तक इस बारे में बाइक मालिक ने पुलिस उपायुक्त उतर पूर्वी दिल्ली को शिकायत भी दी परंतु हुआ वही ढाक के तीन पात।

बहरहाल, 5 जेडओ और एक थाने का खर्च मिलाकर कुल खर्च हुआ 20 हजार रूपये महीना। इसके अलावा रास्ते में मिलने वाली पीसीआर का फुटकर खर्च 200 से 300 रूपये प्रति पीसीआर होता है। इसके अलावा नियमित चालान काटने का भी एक बंधा हुआ खर्च है। महीने में एक आध बार इलाके का यातायात इंस्पेक्टर इन बसों के खिलाफ कार्रवाई दिखाने के लिए इनके चालान काटता ही है। उस चालान काटने में भी एक धांधली एक घोटाला है। चालान अवैध रूट अथवा बिना परमिट के रूट चलाने अथवा समानान्तर परिवहन प्रणाली चलाने के नही काटे जाते हैं। उस स्थिति में बसें जब्त हो सकती हैं उनके मौजूदा परमिट रद्द हो सकते हैं और बस मालिकों पर मुकदमें भी हो सकते हैं। चालान काटा जाता है अवैध पार्किंग अथवा मोटर वाहन अधिनियम के तहत छोटा मोटा 500 से हजार रूपये का चालान। यदि गंभीर धाराओं में चालान 10 हजार का बनता है तो 500 या 1000 रूपये सरकार के खाते में जाते हैं और कम से कम 5 हजार रूपये टीआई की जेब में ठूसे जाते हैं। इसे कहते हैं कार्रवाई की कार्रवाई और आमदनी की आमदनी। अब यदि आप ऐसी बसों की शिकायत करें और आरटीआई डालकर अपनी शिकायत पर अमल पूछें तो आपकों का चालानों की पूरी सूची हाथ में आ जायेगी। बल्कि यह भी बता दिया जायेगा कि आपकी शिकायत के उपर कार्रवाई करते हुए अपने पुलिसकर्मी आपके बताये गये प्वाइंट पर तैनात कर दिये गये हैं। जो अवैध बस संचालन को रोकेंगे। जबकि वह पुलिसकर्मी इस अवैध बस संचालन को रोकने की बजाये अपनी कमाई में लगे होते हैं और इन बसों को पूरी सुरक्षा देते हैं।

एसीपी गांधीनगर द्वारा शिकायत पर दी गई जानकारी और सख्त निगरानी एवं पुलिसकर्मी नियुक्त करने की जानकारी का पत्र

ऐसा ही उदाहरण यमुनापार के कांतिनगर और बिहारी कलोनी के चैराहे पर पुलिसकर्मियों की तैनाती का है। एक शिकायत पर एसीपी यातायात, गांधीनगर ने पत्र लिखकर बताया कि उन्होंने उपरोक्त चैराहे पर पुलिसकर्मी तैनात कर दिये हैं। परंतु जब मौके पर जाकर आईएनएन भारत की टीम ने मुआयना किया तो पाया कि पुलिसकर्मी आराम से पुलिस बूथ में बैठे हैं और उनसे सौ मीटर के फासले पर कांतिनगर नाले के उपर से रात 8 बजे से 11 बजे के बीच कम से कम 20 ऐसी बसें रवाना होती हैं। आईएनएन भारत की टीम ने वहां मौजूद एएसआई से इस बाबत बात की तो उसका वही जवाब था कि हम तो नियमित तौर इनके चालान काटते हैं। इसके बाद वह एएसआई अपने दो सिपाहियों और एक होमगार्ड जवान के साथ बूथ से बाहर निकलकर खडा हो गया और कहा कि आज भी जैसे बसें यहां से गुजरेंगी हम चालान काटेंगे। हमने उक्त एएसआई को एसीपी गांधीनगर का पत्र दिखाया तो उसने सहर्ष माना कि उसकी नियुक्ति पत्र में वर्णित काम के लिए ही हुई है।

 

(अगली कड़ी में बस माफिया का खेल)